विकास के नाम जनाकांक्षाओं से खिलबाड़ खतरनाक

अब यह हमारा सौभाग्य है या दुर्भाग्य कि हम आधे से अधिक भारत वंशी जो देश में बनने वाली सरकारों का निर्धारण करते है। जिनके कल्याण की दुहाई दे कोई न कोई दल बहुमत हासिल कर सरकार में काबिज हो जाते है। फिर शुरुआत होती है विकास के नाम जनाकांक्षाओं से खिलबाड़ की।
और परिणाम कि अपनी अनन्त समस्याओं के समाधान के प्रतिबि ब के रुप में मौजूद सरकारों की कार्यप्रणाली देख वह आवाम ठगी सी रह जाती है। कारण कि चुनाव से पूर्व दलो की प्राथमिकता कुछ और चुनाव पश्चात प्राथमिकताऐं कुछ और हो जाती है। जहां जन भावनाओं का सरेयाम बलात्कार ही नहीं उन्हें नंगा घुमा, उन्हें कुचल रौंदा जाता है। जो स य मानव समाज के लिये किसी भी अभिशाप से कम नहीं है।

उदाहरण सामने है जिस भूमि अधिग्रहण बिल को दल का विपक्ष और आज का सत्ता धारी दल मिल कर पास करता है। और वहीं विपक्ष सत्ता में आते ही नया भूमि अधिग्रहण बिल ले आता है। और कल का सत्ता धारी दल आज का विपक्ष न सही विपक्ष में सबसे बड़ा विरोधी दल नये भूमि अधिग्रहण बिल को गरीब किसान विरोधी बताता है।

यह तो मात्र एक उदाहरण भर है। देश में कई मामले है जिनका जनभावनाओं और जनअपेक्षाओं से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं मगर फिर भी हमेशा से पक्ष-विपक्ष दोनों के लिये सत्ता में आते ही अहम मुद्दे बन जाते है।

क्योकि देश की जनता भोली है। वह समस्या ग्रस्त ही नही,आभाव ग्रस्त भी है। जिसे यह सोचने की फुरसत ही नहीं कि सही कौन और गलत कौन है ? ऐसे में मिथ्या, भड़काई भाषणों पर सारी ताकत लग जाती है। ऐसे में भ्रमित जनता कभी सही तो कभी गलत फैसले ले जाती है। जिसके परिणाम उसे जनाकाक्षांओं के विपरीत एवं विकास के नाम जनउपेक्षाओं के रुप में देखने होते है। मजबूरी यह कि अब राजनेता, नौकरशाहों के गठजोड़ में हमारा कलमकार नहीं, बल्कि कलम के सुपारी किलर भी, लेाकतंत्र के नाम जनकाक्षांओं की अभिव्यक्ति करने वाला बड़ा वर्ग भी जमात में शामिल हो अपने कत्र्तव्यों से विमुख हो, धनार्जन में जुट गया है।

अगर यो कहे कि अब देश में नौकरशाह, नेता, गुन्डो, और जनता की आवाज बुलन्द करने वालो का गठजोड़ बन गया है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।
शायद एक कहावत सही ही है कि अमन बैच देगें, चमन बैच देगें, गर सो गया कलम का सिपाही तो वतन...................वतन बैंच देगें।

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