ये कंपनियाँ है या खून पीने वाली, मशीनें

व्ही.एस.भुल्ले. सरकारे अपनी खाल बचाने, इस हद तक उनके सर प्रायवेटाइजेशन का भूत सवार क्या हुआ ? कि सेवा सुविधा के नाम देश में सरेयाम शोषण, और जनधन की लूट शुरु हो गई है। जनता की मजबूरी ये है, कि सारा कुछ क यूटरीकृत है।
जिस देश में आधे से अधिक लेाग अपनी मातृ-भाषा में ही पढ़ें लिखे नहीं है न ही बहुत ज्यादा शिक्षित उन्हें अंग्रेजी के आवेदन थमा अंगूठा लगवा क प्यूटर महासय की आड़ में जन धन की लूट का लायसन्स थमा दिया गया है। यूं तो निशाये जनता स्वयं की होती लूट पर चुप ही रहती है जो बोलना जानते है उनका कचूमर निकालने संवेदनहीन मानसिकता की वह ल बी-चौड़ी सर्वसुविधा युक्त फौज तैयार है। जो संवेदनशीलता से इतर तर्क-कुतर्क सहित कानून की धमकी दे, स्वयं अस य और ढीट होने के बाद स यता सिखाने तैयार बैठी है।

हकीकत तो यह है कि सरकार से इन क पनियों को मिले कानूनी संरक्षण की आड़ में अब यह क पनियाँ स्वयं को सेवा दाता क पनियाँ या फिर सेवा प्रदाता कम शोषक ज्यादा नजर आती है। और यह क्रम विगत 8 वर्षो से देश में निरन्तर जारी है।

कहने को देश व देश के कानून के अन्दर यह सेवा और सुविधा प्रदाता क पनियाँ है। और आम नागरिक जो इनसे इनकी शर्तो पर सेवा सुविधा का पूरा मूल्य मय समय से बिल न मिलने पर लेट फीस के रुप में चुकाता है, जिन शर्तो के आधार पर जो अंग्रेजी में लिखित होती है और इन्हीं क पनियों को सरकारों पर विश्वास कर वह अंग्रेजी में टंकित आवेदनो पर आंख बन्द कर हस्ताक्षर कर देता है। कि उसके द्वारा चुनी सरकारे व जनप्रतिनिधि इन क पनियों को लायसन्स देते वक्त  उनके हितो को सर्वोपरि रखेगें। न कि अंग्रेजी में लिखी शर्तो और माननीय क प्यूटर द्वारा टंकित गलत सलत बिलो के आधार पर ठीक तरीके से सेवा सुविधा मुहैया न होने के बावजूद भी चौत बसूली की अनुमति देंगी। 

देश में नाम जर्द प्रतिष्ठित प्रतिष्ठानो की आड़ में जिस तरह से सेवा, सुविधा के नाम पर अब ये नामी ग्रामी संस्थाऐं ही नहीं संस्थागत संगठन भी निरीह जनता के लिये लूटपाट के गिरोह बन गये है। जिसमें कुछ तो शासन की आड़ मेंं खुलेयाम लूट-पाट पर तुले है तो कुछ अघोषित लूटपाट में लगे है। 
परिणाम ये है कि जनता के वोट से सत्ता सुख भोग रहे सरकार के जनप्रतिनिधियों को अब उनके मातहत उनके शुभचिन्तक तो गरीब जनता उन्हें दर्शक या फिर दुश्मन नजर आने लगी है। बैचारी जनता इस संवैधानिक व्यवस्था में आखिर कहा जाये कोई सुनने वाला नहीं। 

ऐसे में यहां उन नैसर्गिक सुविधाओं और सेवाओं का उल्लेख करना उचित होगा। जिनके नाम पर जबरदस्त सुनियोजित ढंग से देश मेें लूट मची है। 

सूत्रों की माने तो सबसे पहला क्षेत्र शिक्षा है, जहां देश की जनता को बच्चों के माध्ययम से इमोशनली ब्लकमैल कर कभी फीस, डोनेशन, एडमीशन, कॉफी-किताब, ड्र्रैस, परिवहन, प्रोजक्ट, टूशन और न जाने किन-किन तरीको से लूटा जाता है यहां तक अब प्रायवेट संस्थान सरकारों के खिलाफ भी कानूनी लड़ाई लड़ उसे अंगूठा दिखाने से नहीं चूक रहे। 
दूसरा क्षेत्र स्वास्थ्य, सेवाओं और सुविधाओं से जुड़ा है। जहां चिकित्सकों को प्रायवेट प्रक्टीस या प्रायवेट होस्पीटल खोल जिन्दगी बांटने या शारीरिक रुप से स्वस्थ करने के नाम वेहिसाब लूट मची है। और सरकारें मानवता के पुजारियों के लूट का धन्धा और चौथ बूसली का नंगा नाच सरेयाम देख रही है। 
तीसरा क्षेत्र प्रकृति प्रदत्त शुद्ध पेयजल का है, तो देश में 75 फीसदी आबादी को पता ही नहीं कि वह शुद्ध पेयजल पी रही है या अशुद्ध जल क्योंकि जिसके पास पानी के लिये पैसे ही नहीं उन्हें तो पहले से ही पेजयल के लाले है शुद्धता तो दूर की कोणी। मगर किसी के नलो में पानी आये या न आये मगर बिल बराबर थमाये जा रहे है। 
चौथा क्षेत्र ऊर्जा या बिजली का है जो सारी सुविधाओं, सेवाओं की नींव माना जाता है। जब से इस क्षेत्र में भी क पनियों में कदम रखा है तब से न तो बिजली आने और न ही बिजली जाने का कोई समय देश के अन्दर रहा है। इसकी भी हालत ऐसी भी है कि बिजली आये या न आये कोई बिल चुकाये या न चुकाये मगर नियमित बिल जमा करने वालों बिल के बराबर मनमाने ढंग से माननीय क प्यूटर जी की के नाम अनाप-सनाप आते रहते है। और शासन की मदद से बिल न चुकाने वालो के खिलाफ कानून की आड़ में उपभोक्ता को चोर मान पठानी बसूली चलती रहती है। 
पांचवा क्षेत्र संचार सुविधाओं का है कभी भारत सरकार की आय का नवरत्न रहे बीएसएनएल की हालत तो अब सेवाओं के मामले में किसी प्रायवेट क पनी से भी गई गुजरी हालत में है। हालात ये है कि अगर आप जागरुक नहीं है और आप लापरवाह हो अगर आपने कोई भी योजना का फिक्सड प्लान ले रखा है तो समझों हर महीने मानसिक पीढ़ा मनमानी बसूली और सेवा समय से मिले न मिले कोई सुनने वाला भी नहीं मिलेगा सिवाऐ आपको डाटने या मीठी बातों से बेबाकूप बनाने के अभी हालिया एक उदाहरण शिवपुरी म.प्र. का है जहां लाइन मैन से लेकर जेटीओ, एसडीओ, टीडीएम, जीएम, सीजीएम, सीएमडी तक के दूरभासो पर स पर्क करने के बावजूद भी कभी इन लेागों से सीधे बात नहीं हो सकी, केवल इनके पीए इत्यादि ही झूठे आश्वासन या कभी कभी सहयोग के अलावा कुछ भी नहीं कर पाये। जब यह हालत ला ाों की पगार उड़ाने वाले उन अधिकारियों की है जिनके वेतन भत्ते आम उपभोक्ता के पैसे से मिल पाते है ऐसे समय में इन महानुभावों की कार्यप्रणाली बताती है कि यह जिस ढाल पर बैठे है उस पेड़ की हरयाली के बीच अहंकार में डूब किस बेरहमी से काटने पर तुले है, अन्दाजा लगाया जा सकता है। 
छठवा क्षेत्र आता है आदमी की आर्थिक सुरक्षा का अर्थात बीमा क्षेत्र जिसमें वर्ष-2007 से लेकर वर्ष-2012-13 तक जिस तरह से बीमा के नाम पर देश भर में गरीब जनता के धन की लूट प्रायवेट बीमा क पनियों ने देश के युवाओं को ल बे-चौड़े लालच और ऐजेन्टो को 40 फीसदी पहली किस्त पर कमीशन बांट लाखों करोड़ रुपये की है। वह जगजाहिर है। देश भर में कई क पनियों द्वारा पढ़े लिखे युवाओं को ल बे-चौड़े सबज बाग दिखा पूरे सुनियोजित तरीके से देश के हर जिले में ऑफिस खोल बेरोजगार युवाओं को मोटे कमीशन और अच्छी पोस्ट क पनी में मिलने का सपना दिखा शहर कस्बा ही नहीं गांव तक के भोले भाले लेागों को दोस्त यारी, रिस्तेदारी, पहचान का वास्ता दिलवा पॉलसियां बिचबाई और अंग्रेजी न जानने के बावजूद भी दिलासा दे अंग्रेजी में छपे आवेदनों पर हस्ताक्षर और अंग्रेंजी में लिखित पॉल्सियाँ थमाई। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 5 लाख करोड़ के करीब उगाही बीमा के नाम पर इस देश के आम गरीब मध्यम वर्ग गरीबों से की गई और साल दो साल बाद कईयों की पॉल्सी खत्म तो कईयों की पॉल्सियाँ खत्म करा दी गई। शायद ही इस कदर की लूट कानून की आड़ में क पनियाँ अन्य किसी देश में करती हो, जैसी जनधन की लूट हमारे देश में आज भी हो रही है। जबकि ये सरकारे और इनके जनप्रतिनिधि इसी जनता के वोट से चुने जाते है। मगर लगता नहीं कि बहुत जल्द जनता को राहत देने बहुत कुछ हो पायेगा। क्योंकि जब तक देश में सेवा के नाम निरन्तर सत्ता में बने रहने की होड़ दलो के बीच मची रहेगी और जनता दो वक्त की रोटी और शुद्ध पेयजल हासिल करने दिन-रात जुटी रहेगी, तब तक राजनीति से दूर इस देश की जनता अपनी ही सरकारों के बीच इसी तरह लुटती-पिटती रहेगी। 

SHARE
    Your Comment

0 comments:

Post a Comment