सत्ता के लिये षडय़ंत्र, खतरनाक

जिस तरह के षडय़ंत्र सतत सत्ता में बने रहने लेाकतंत्र की आढ़ में देश में चल रहे, या चलते रहे है, वह उस महान राष्ट्र और उसके नागरिक के लिये...

जिस तरह के षडय़ंत्र सतत सत्ता में बने रहने लेाकतंत्र की आढ़ में देश में चल रहे, या चलते रहे है, वह उस महान राष्ट्र और उसके नागरिक के लिये खतरनाक है। जो अपना बहुमूल्य मत दे अपने जनप्रतिनिधियों और उनके बहुमत से बनने वाली सरकारों से एक शक्तिशाली, सुरक्षित, खुशहाल, स पन्न राष्ट्र निर्माण की अपेक्षा रखते है।


देखा जाये तो नीति आज सत्ता में सतत बने रहने के लिये बन रही है। न कि राजनीति नीति क्रियान्वयन के लिये हो रही है। जिससे देश व देश के नागरिकों का कल्याण हो सके जिससे एक खुशहाल, सम्पन्न राष्ट्र बन सके।

मगर वर्तमान राजनीति में जिस तरह से व्यक्तिगत जीवन की, चरित्र की आड़ मेें छीछा लेदर हो रही है वह बड़ी ही शर्मनाक और लेाकतंत्र के लिये खतरनाक है।

ये सही है कि हमारा राष्ट्र उच्च आदर्श, मूल्य सिद्धान्तो की धरोहर है जिसकी संस्कृति, संस्कार और चरित्र उच्च कोटि के रहे है।

मगर राष्ट्रीय नीति के आभाव में कचरा हो चुकी हमारी संस्कृति, संस्कार और चरित्र से आज की राजनीति में अपेक्षा उस दिवास्वन के समान है जिसे पूरा होने में एक ल बा समय लगने वाला है।
मगर उससे पूर्व व्यक्तिगत आचरण को लेकर राजनीति में एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ ने आज समुचे लेाकतंत्र को ही खतरे में डाल दिया है। क्योंकि लक्ष्य जो सतत सत्ता में बने रहने का है न कि प्राप्त सत्ता से जन कल्याण, राष्ट्र कल्याण करने का रहा है।
इसलिये राजनीति का तीसरा नेत्र सारी उपलब्धियों खामियों को छोड़ व्यक्ति के अन्तिम लक्ष्य पर जा टिका है। फिर चाहे वह जो भी हो।

इसी अन्तिम लक्ष्य को मोहरा बना सतत सत्ता में बने रहने का मंसूबा पालने वालो को यह मतव्य साफ करता है कि हम आज कैसी राजनीति से घिर गये है।

बहरहॉल जो भी हो लेाकतंत्र की आढ़ में जब षडय़ंत्रकारियों का मंसूबा उच्च आदर्श, मूल्य सिद्धान्त, संस्कार, चरित्र को बिगाड़ और व्यक्ति के त्याग को नकार उसके व्यक्तिगत जीवन में झांक उसका फालूदा बनना हो, उससे किसी का भी भला होने वाला नहीं, उल्टे किसी भी व्यक्ति की नैसर्गिक क्रिया पर खुलासा प्रकृति के विपरीत है। मगर लगता है सतत सत्ता में बने रहने सत्तासीनो या सत्ता लालचियों के लिये अन्तिम अस्त्र अब यहीं बचा है जिसका लेाकतंत्र की आढ़ में खुला उपयोग चल रहा है। जो अपने आप में स्वत: ही खतरनाक है।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: सत्ता के लिये षडय़ंत्र, खतरनाक
सत्ता के लिये षडय़ंत्र, खतरनाक
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