क्या शिक्षा का व्यवसायीकरण राष्ट्रद्रोह.......?

व्ही.एस.भुल्ले। 4 मई 2015 विलेज टाईम्स। कहते है कि जिस राष्ट्र में राष्ट्रीय शिक्षा का आभाव हो, वह राष्ट्र कभी शक्तिशाली,खुशहाल, स पन्न एवं सुरक्षित नहीं रहता, क्योंकि ऐसे राष्ट्र में इन सबका स्थान स्वार्थ ले लेता है। किसी भी स पन्न, शक्तिशाली, खुशहाल राष्ट्र के निर्माण में उसकी शिक्षा नीति का अहम योगदान होता है।
बशर्ते वह राष्ट्र को सामने रख तैयार की गई हो, जिसका क्रियान्वयन भी राष्ट्रीय विद्यालयों से हो, न कि निजि विद्यालयों से जिस भी राष्ट्र में शिक्षा का व्यवसायी करण हो, उसे उस राष्ट्र की सत्ता का संरक्षण प्राप्त हो, उस राष्ट्र में उसकी संस्कृति, संस्कार और चरित्र उस वैश्या के समान हो जाते है जो अपने धर्म और कर्म का तो पूरी निष्ठा के साथ पालन करती है। मगर उसमें नैतिकता का निधन हर रोज होता है वह भी चन्द रुपयों की खातिर जहां मूल्य और सिद्धान्त हाकते नजर आते है।

आखिर किसी भी राष्ट्र में सतत सत्ता में बने रहने की इतनी अन्धी दौड़ क्यों ? क्या यह उस राष्ट्र के साथ गद्दारी नहीं जहां की करोड़ों जनता ने सत्तासीनो को देश के बेहतर भविष्य और स्वयं की सुरक्षा, स पन्नता, खुशहाली केे लिये उन्हें चुना हो, और वह सही शिक्षा नीति के आभाव में अपना भूत वर्तमान गवा बेहतर भविष्य के आभाव में कलफने मजबूर हो, मगर हो सकता है, कि सत्ता या सत्ता से जुड़े संस्थान और धन लालचियों की जमात भले ही यह मानने तैयार न हो कि जो विश्वासघात राष्ट्र या राज्य की जनता के साथ राष्ट्रीय शिक्षा नीति के आभाव मेें करते आये है, या कर रहे है वह राष्ट्रद्रोह है, या फिर उस राज्य के साथ गद्दारी, जिसमें वह मौजूद है।

बात भले ही कड़वी हो, मगर सच भी यहीं है जिस राष्ट्र के हर व्यक्ति के वोट की ताकत बराबर हो, जिन वोटो की सं या बल से सरकारे बनती, बिगड़ती हो, उस राष्ट्र में समान शिक्षा क्यों नहीं। भाषाऐं बोलियाँ, संस्कृति अलग-अलग हो सकती है। मगर विषय वस्तु अलग-अलग नहीं।

देश के हर नागरिक को शिक्षित बनाना उस राष्ट्र का धर्म ही नहीं कत्र्तव्य भी होता है। जिनसे मिलकर राष्ट्र का निर्माण होता है। और उच्च मूल्य आधारित शिक्षा, राजकीय संरक्षण में प्राप्त कर वह, एक खुशहाल, शक्ति स पन्न राष्ट्र का निर्माण करते है कोई भी नीति राजनीति के लिये नहीं, राजनीति, नीति के क्रियान्वयन के लिये होती है।

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