खाद्य के नाम खुलेआम जहर...?

व्ही.एस.भुल्ले@ तीरंदाज | 
भैया- म्हारा तो बेड़ा गरग हो लिया, भाई लेागों ने तो म्हारी नस्ल ही नष्ट करने का बीड़ा उठा लिया शै। कै अनाज, तेल, दूध, दही, घी अब तो फल सब्जियों को भी अपनी गिरफत में ले लिया है। प्रतिबन्धित टोक्सीन से लेकर न जाने कैसे-कैसे खाद पेस्टीसाइज, हमारे खाने पीने की वस्तुओं में खुलेयाम चल रहे है, और राष्ट्रद्रोही मिलावट की महा मण्डी में करोड़ों, अरबों, लूट रहे है। अब भाया बात भाई लेागों तक की नहींं, अब बात पूरे माफिया राज की तरह टॉप टू वॉटम तक जा पहुंची है। 

मोटा मुनाफा, कमीशन और विदेशों की सैर के लालच ने खाद्य के नाम जहर परोसने का काम हमारे आपके बीच की मण्डलियों को ही सौंप रखा है।  
काडू बौल्या 36-38 साइज की जीन्स अब बन्द हो चुकी है, क्योंकि युवाओं के बीच अब जीन्स की डिमांण्ड 26 से 32 रह गई है। अब तू ही बता मने कै करुं ?
भैये- बात साफ है, कलयुग के समय यह आर्थिक दौर चल रहा है। ऐसे में हर एक लालची का पैसा ही, अब माई बाप बन रहा है। जिसके चलते म्हारे देश में सब कुछ चल रहा है। सो भैये रातों रात करोड़पति, अरबपति बन सबकुछ हाथों हाथ मुट्ठी में बन्द करने बिलसिता की होड़ मची है। और न समझ लेागों की फौज अपने माई बाप, माननीय, श्रीमानों के भरोसे निढाल खड़ी है। 
फिर तुझे क्या थारे जैसे नंगे भूखों को तो बैसे भी माननीयों ने श्रीमानों के भरोसे जितने साल में दिन नहीं उतनी जनकल्याणकारी, विकास उन्मुख योजनाऐं खोल रखी है। जिनके प्रचार-प्रचार पर लाखों, करोड़ों नहीं हर वर्ष अरबों रुपये लुटाये जा रहे है। जो तू भी कॉग्रेस बिग्रेड की तरह म्हारे माननीयों को कोसे जा रहा है। कै थारे को इतनी सी बात के लिये कभी न दिखने वाला खादय, ड्रग, कृषि, इन्सपेक्टर नजर नहीं आ रहा है। सो तू स्वच्छ भारत की सुनहरी संध्या पर शौचालय बनवाने के बजाये, गला फाड़ चिल्ला रहा है। 
भैया- कै थारे को म्हारा जैसा महान किसान कोई चारु, भाट लागे। म्हारे को तो इन मिलावट खोरों, मुनाफाखोरों, जिन्दा लाशों के सौदागरों के बीच, म्हारी मौजूद ही नहीं, आने वाली नस्ल की चिन्ता खाये जावे, न कद रहा, न मजबूत काठी, साइज ऐसा कि मने तो कलेजा मुंह को आवे। आखिर कहा गई वह भारतीय नस्ल जो किंव्टलभर अनाज पीठ पर उठा छत तक बोरा चढ़ा देती थी कई खण्डरों में लगी खण्डों की कतार, युद्ध के औजार हथियार चलाने वाले किस कद काठी के रहे होगें। मगर आज टोक्सीन सहित पेस्टीसाइजों एवं नये-नये खादों ने सब स्वाहा कर दिया। आज गांव भर को दूध के रुप में अमृत देने वाला पशु स्लाटर हाउस का चारा, तो स्लाटर हाउस फूड इन्डस्ट्रीज बन गया। टोक्सीन ऐसा कि उससे प्रकृति की गन्दगी निगल प्रकृति को स्वच्छ रखने वाले गिद्ध कौआ सहित न जाने कितने पक्षियों को निगल लिया। कहने को देश में टॉक्सीन पर बन्दिस है। फिर भी न जाने कहा मिल रहा है। म्हारा तो यह सोच-सोच कर दम निकल रहा है। 
भैये- चुपकर मुये ज्यादा बोला तो आज नहीं तो कल थारी सिपारी किसी न किसी को मिल जायेगी, या फिर थारे खेत में ही थारी काठी लटकी नजर आयेगी। बेहतर हो कि देश के काम में हाथ बटा और आज से ही स्वच्छता अभियान के तहत गांव, नगर, स्कूलों में स्वच्छ भारत अभियान में शौचालय बनवा मौका मिले तो, बैंक में खाता खुलवा, प्रधानमंत्री सुरक्षा जीवन ज्योति बीमा और अटल पेन्शन लेने और देने का अभियान चला तब तो बात बन जायेगी,बरना थारे साथ म्हारी भी वेभाव मिट्टी कुट जायेगी। 
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा मने तो लागे घोर कलयुग चल रहा है। इसलिये ऊपर वाले ने भी सारा हिसाब किताब मय डेविड, क्रेडिट के म्हारे महान बैंकों की तरह ऑन लाइन कर दिया है। सो हाथों हाथ मने सबसे पहले खुद के ही घर शौचालय बनाऊगां, जरुरत पड़ी तो गांव, वालो के भी बन बाऊंगा, साथ ही किसी कैफे वाले को 50 की पत्ती पकड़ा अपना खाता बैंक में खुला, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा, अटल पेन्शन योजना का लाभ उठाऊंगा गर लाभ नसीब हुआ तो ठीक, बरना मने भी विरोधियों में शामिल हो इसी चौराहे पर डकराऊंगा, क्या आ गये अच्छे दिन ?

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