दिल्ली के दिल पर, अन्नदाता की आत्महत्या

विलेज टाईम्स 25 अप्रैल 2015। काश एन.डी.ए. सरकार के दौरान देश की संसद में तीन हजार से अधिक किसानों की मौतों पर सोनिया गांधी द्वारा की गई...

विलेज टाईम्स 25 अप्रैल 2015। काश एन.डी.ए. सरकार के दौरान देश की संसद में तीन हजार से अधिक किसानों की मौतों पर सोनिया गांधी द्वारा की गई ल बी बहस को संज्ञान में लिया होता, स्वयं एनडीए सरकार या बाद में 10 वर्ष तक दिल्ली की सत्ता में रही यू.पी.ए सरकार द्वारा किसानों के हित में कुछ कारगार कदम उठाया होता, तो शायद देश को ये दिन नहीं देखना पढ़ता।


राजस्थान के दोसा के गांव से अपनी पीढ़ा प्रगत करने दिल्ली पहुंचा अन्नदाता देखते ही देखते हजारों पथराई आंखों के बीच फांसी पर झूल आत्महत्या कर लेता है। अब किन्तु, परन्तु कारण जो भी जांच के बाद सामने आये, मगर दिल्ली के दिल पर बैठ की गई अन्नदाता द्वारा यह आत्महत्या हमारे नेता, सरकारों, नौकरशाहों के दिलो को कितना झंझकोर पाई है यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर सबसे अफसोस जनक यह है कि जो भी देश के सामने हुआ वह महान भारत के लिये बहुत ही शर्मनाक है इसे देखकर हम कह सकते है कि हम आज भी कितने बैवस और हमारे अन्नदाता कितने लाचार है। कि वह मौत को भी सरेयाम गले लगाने से नहीं चूक रहे है।

दिल्ली में हुई देश के अन्नदाता की फांसी पर झूलने की घटना कोई नई हो ऐसा भी नहीं दूसरी ओर कुछ दिन पूर्व भी म.प्र., उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र में भी इस तरह की घटनाओं को अन्नदाताओं की बैवसी के रुप में देखा गया है। कोई खेत के पेड़ पर ही फन्दे पर झूल गया, तो कोई फसल की बर्बादी देख सदमे में दम तोड़ गया। 
मगर हद तो तब है जब हम शोक, संवदेनाओं के बीच सदनो में बैठ पीढ़ाये तो व्यक्त करते है, उनकी माली हालत पर अफसोस तो जाहिर करते है, मगर यह संकल्प नहीं ले पाते, कि जिस 60 फीसदी आबादी पर 80 फीसदी देश के लेागोंं का भविष्य टिका है। और जिस 80 फीसदी आबादी पर यह देश और देश का लेाकतंत्र टिका है। विगत 67 वर्षो में उन 60 फीसद लेागों में अपनी नीतियों के माध्ययम से ये विश्वास नहीं पैदा कर पाये कि यह वृहत भारत हमारा आपका है। यहा कि सरकारें हमारी है जिनके बीच हम रह रहे है, वे हमारे अपने है। 
कारण टॉप टू वॉटम स्वार्थो से सने संस्कारों, ा्रष्टाचार और सतत सत्ता में बने रहने का वह अंहकार है। जो हमें सोचने ही नहीं देता कि इन्सान क्या होता है, परिवार किसे कहते है, समाज क्या होता और राष्ट्र का अस्तित्व किन पर टिका रहता है। 

अब इससे बड़ा दुर्भाग्य हमारा और क्या होगा जिस देश की आधे से अधिक आबादी आज भी खेती किसानी पर आधारित है उस देश में खेती किसानी के स बन्ध में कोई ऐसी स्पष्ट पारदर्शी नीति नहीं है, जिससे आम गरीब किसान, मजदूर के अन्दर आर्थिक या सामाजिक सुरक्षा का भाव हो और वह अपने भविष्य को खुशहाली या स पन्नता के रुप में दे ा सके। 

सच तो यह है कि देश का आम मजदूर और किसान आज भी सुरक्षा के नाम निढाल खड़ा हुआ है। फिर चाहे वह आर्थिक हो या सामाजिक हालात ये है कि उसे देश के प्रति अपना धर्म निभाने भी कड़ा संघर्ष करना पढ़ रहा, इन आत्महत्याओं को देख या सदमे से मरने वाले हमारे अन्नदाताओं को देख अब यह लगता है कि संघर्ष के इस मार्ग पर कड़े संघर्ष के बावजूद जीने का कोई चाब लेागों में नहीं बचा है। तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। 
परिणाम देश के सामने है किसी प्राकृतिक आपदा बस प्रकृति से स पन्न भू-भाग पर उन लेागों द्वारा आत्महत्या जो इस देश की रीढ़ कहे जाते है। 
इससे ज्यादा शर्मनाक और कोई व्यवस्था नहीं हो सकती है। जिनके कन्धों पर इनका बेहतर भविष्य गढऩे का भार हो। 

यह दुर्भाग्य ही है इस देश का कि जिसकी प्रमुख या मु य सत्ता गांवों तक पंचायत के रुप स्थापित हो देश का अरबो, खरबो रुपया इन्हीं संस्थाओं के माध्ययम से संचालित हो जिन्हें स्थापित करने हर 5 वर्ष में चुनावों पर करोड़ो अरबो खर्च होते हो, ऐसे में गांव, गरीब, किसान की ऐसी दुर्दशा समझ से परे है। 
आखिर कब तक हम वोट की राजनीति और इस भ्रष्ट व्यवस्था को ढोते रहेगेंं। कब तक सत्ता का खेल हमारी स पन्नता ,आर्थिक खुशहाली में बाधक बना रहेगा। 

आखिर किसी को तो सामने आना ही होगा। उन नीतियों कानूनों को तो तिलांजली देनी ही होगी। उस भ्रष्ट व्यवस्था को तो कुचलना ही पढ़ेगा जिसने अब व्यवस्था ही नहीं समाज तक में गहरी पैठ बना रखी है। 
उन लेागों को भी सक्षम बना वह विश्वास पैदा करना होगा जिसके आभाव में वोट, और चोट की भ्रष्ट राजनीति फल फूल रही है। क्यों कोई भी सरकार कभी आम गरीब किसान के नाम सिहर पाती है। क्यों कोई सरकार उघोगपतियों को सहुलियत देने से मुंह छिपाती है। देश आम गांव गरीब किसान से तो चलेगा ही, मगर उसमें सहयोग उघोगपतियों का भी लगेगा। 
इसलिये सर्वमान्य, पारदर्शी उघोग नीति के साथ ही कृषि नीति भी होना चाहिए जिसमें दोनो ही वर्गो में आर्थिक सुरक्षा का भाव बना रहे। और फिर कभी कोई किसान जीवोत्पार्जन के संकट में न तो दम तोड़ न ही आत्महत्या जैसे घातक कदम उठाये सके। 
यह हमारा सौभाग्य है, कि हम एक ऐसे भू-भाग पर रहते है जहां पाने बहुत कुछ है, गबाने कुछ भी नहीं। जरुरत है स्वयं के स्वार्थ छोड़ एक ईमानदार कोशिस की देश में अच्छा सोच ईमानदारी से कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले बहुत है जरुरत पानी की तरह कुये तलाश प्यासों की प्यास बुझाने की। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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दिल्ली के दिल पर, अन्नदाता की आत्महत्या
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