माननीय, श्रीमानो हम बैहाल है, क्या अपराध है हमारा

व्ही.एस.भुल्ले। हमारे पास सब कुछ है फिर भी हम नैसर्गिक सुविधाओं से मोहताज है, क्योंकि, माननीय, श्रीमानों आपका अमला हमारी नहीं सुनता। कु...

व्ही.एस.भुल्ले। हमारे पास सब कुछ है फिर भी हम नैसर्गिक सुविधाओं से मोहताज है, क्योंकि, माननीय, श्रीमानों आपका अमला हमारी नहीं सुनता। कुछ तो करो, बड़ी उम्मीद है आपसे, हम मानते है कि आपकी मेहनत और कोशिशों में कोई कमी नहीं, फिर भी हम कलफ रहे है।
कोई तो है आप लेागों के बीच जो आपकी 18-18 घन्टे की कड़ी मेहनत पर कालिख पोत रहा है। अब यह उसकी मजबूरी या कमजोरी हो सकती है, सुरक्षा और सहूलियत के आभाव में, मगर माननीय, श्री मानो हमने अपनी सारी शक्तियां कानूनी तौर पर आपको सौप रखी है। सारी सुविधायें अपना पेट काट कर आपको दे रखी है। फिर ऐसा क्या अपराध है हम लेागों का जो आप जैसे, समर्पित मेहनत कश सेवको के रहते, हम कलफ रहे है।

अब देखिये न, प्रकृति प्रदत्त पर्याप्त पेयजल है जो मानव जीवन, या जीव-जन्तु और जीवों के जीवन के लिये अहम है मगर वह भी हमें कड़े सहर्ष और पूरी कीमत चुकाने पर सहर्ष उपलब्ध नहीं, जिन्दा रहने ऐसी कई विधाये मौजूद है। मगर हमें नसीब नहीं है। व्यवस्थागत, सुविधाओं की हालत ऐसी कि उनका अड बर भरा शौर भले ही हो, मगर विश्वसनीय तौर पर उनकी कोई अहमीयत नहीं।

हम स्वस्थ, शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार पेयजल के लिये वर्षो से चिल्ला ही नहीं, डकरा रहे है मगर सुनने वाले तो बहुत है मगर करने वाला कोई नहीं।
माननीय श्रीमानों आपकी कड़ी मेहनत और 18-18 घन्टे काम करने के बावजूद भी हमें यह सब नसीब नहीं है।

आखिर कहां जाये हम, किसके दरवाजे डकराये हम, कोई सुनने वाला नहीं। बदलिये आपकी सोच को, बड़ा विश्वास है आप पर और हमारी देश की महान व्यवस्था पर, कहते है विष दे दो मगर विश्वास मत तोड़ो।

आज विश्वास टूट रहा है। लेागों ने बड़ी उ मीद से माननीयो आपको चुना है बड़े विश्वास से श्रीमानो आपकी ओर देश के आम गरीबों ने देखा है। कि आप उनके खुशहाल जीवन के मार्गदर्शक और सहभागी बनेगें।

अगर आपकी कोई मजबूरी, बैवसी, सार्थक सोच के आभाव में जबाव दे रही है व्यवस्थागत, तो हमारा मशविरा है, आपको, आप वह दरवाजा खोलो जिसके लिये हमारे संविधान निर्माताओं ने आपको असीम अधिकार और कानूनी शक्तियाँ दी है, क्योंकि आज जरुरत लेाकप्रिय सत्ता की नहीं बल्कि सोच बदलने की है।

जिसे बदलने मैकाले को 150 वर्ष लगे।
हम मात्र 5 से 15 वर्षो में अपने देश व देश वासियों की सोच बदल सकते है।
इसके लिये जरुरी हे कि हम राष्ट्र और इन्सानियत को सर्वोपरि, रख इस महान अभियान की शुरुआत करे, हम न तो हताश है, न ही निराश, क्योंकि तपो भूमि के रहवासी है हम, जहां न तो कोई चोर-भिखारी था हमारे देश में इतनी अकूत दौलत, ऊंचे चरित्रिक आदर्श और गुण हुआ करते थे, हमारी आध्यात्मिक और संस्कारिक विरासत ऐसी थी कि इसे बदलने वाले भी, तब भी और अब भी मुरीद थे और है। जहां कि इन्सानियत का परचम सारे विश्व में लहराता हों, जरुरत बस इतनी है कि हम अपनी सोच बदले।

जिसके लिये नई स्वस्थ शिक्षा नीति की जरुरत है और यह तभी स भव है जब हम स्वार्थ, सत्ता और लाभ को इन्सानियत के लिये नकार उन बन्द दरवाजों को इन्सानियत की सेवा के लिये खोले। जिनकी कमी न तो हमारे देश में और न ही हमारी लेाकतांत्रिक व्यवस्था में है, ऐसे दरवाजे हमारे पास कम नहीं है। राज्य सभा से लेकर मंत्री परिषद निगम मण्डल, संस्थाऐं जिसके लिये माननीय मु यमंत्री, प्रधानमत्री को असीम शक्तियाँ प्राप्त है। जिसकी व्यवस्था भी हमारे महान संविधान निर्माताओं ने रख छोड़ी है। अगर कोई सक्षम देश भक्त है तो उसके लिये भी रास्ता साफ है, मगर शुरुआत तो हो, यहीं दर्द है हमारा माननीयों, श्रीमानों देश कुछ करना चाहता है, देश में मौजूद, देश भक्तों की फौज, युवा तरुणाई टकटकी लगा आपकी ओर पथराई आंखों से देख रही है। जो जहां भी है जैसी भी है, मगर आप लेाग कुछ तो करो ? इस दुनिया में अस भव कुछ भी नहीं। जरुरत है सटीक शुरुआत की, कहीं ऐसा न हो कि बहुत देर हो जाये, देखा जाये तो वैसे भी बहुत देर हो चुकी है। मगर एक उ मीद कि किरण अवश्य बाकी है। अच्छे में न सही, बुरे वक्त में तो इन्सानियम का गुण हमारे बीच आज भी जिन्दा है। यहीं हमारी शेष बची महान स यता, संस्कृति का संस्कार है, जो हमारा मार्ग दर्शक बन हमें हमारे मुकाम तक पहुंचा सकता है। इसलिये कुछ तो करो, माननीय, श्रीमानों, कभी आपको भी उस व्यवस्था से निकल हमारे बीचे आना है जहां आज हम निढाल खड़े डकरा रहे है।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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माननीय, श्रीमानो हम बैहाल है, क्या अपराध है हमारा
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