क्या बढ़ते पाप, प्रकृति से खिलबाड़, तबाही का कारण......?

व्ही.एस.भुल्ले विलेज टाईम्स 26 अप्रैल 2015 - हो सकता है इस प्रकार के तर्को को विज्ञान नकार दे, मगर जिन सवालों के जबाव विज्ञान के पास न...

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाईम्स 26 अप्रैल 2015 - हो सकता है इस प्रकार के तर्को को विज्ञान नकार दे, मगर जिन सवालों के जबाव विज्ञान के पास नहीं। उन सवालो पर सोच रखने वालो के लिये यह सार्थक साबित हो सकते, या एक कोई कपोल कल्पना। मगर वैचारिक तौर पर कोई भी द्रष्टि कोण अपनी अहमियत समय परिस्थिति अनुसार अवश्य रखता है।

निश्चित ही पृथ्वी का भू्र-भाग बहुत बड़ा है और प्रकृति अनुसार उसका संचालन निर्धारित इस बीच अगर विज्ञान और विचारों की तर्को के आधार पर अगर कोई सहमति है, तो वह पृथ्वी पर जीवन बसर करने वालो के लिये एक मार्ग हो सकता है। बात सिर्फ इतनी है, कि जिस प्रकृति के अंश केे रुप में इस पृथ्वी पर जो भी जीव जिन्दा है, वह उसी की देन है। स यता का विकास कितना ही क्यों न हुआ हो, मगर जब-जब जिस-जिस स यता ने प्रकृति के विरुद्ध आचरण किया है वहा तबाही अवश्य हुई है। मानव जाति में प्रकृति विरुद्ध कार्यो को पाप की संज्ञा दी गई है। फिर वह कार्य मानव जीवन के लिये स्थापित स यता के रुप में हो, या फिर वैज्ञानिक खोज के रुप में।
मानव जीवन में जिस तरह से स यता की परिभाषा नये रुप में गढऩे का कार्य विगत सेकड़ों वर्षो में होता रहा है और जितना विकास विज्ञान ने कई क्षेत्रों में किया है। उन सबका अन्तिम लक्ष्य मानव जाति की सहुलियते और सेवाओं के इर्द-गिर्द रहा। मगर मानव के व्यक्तिगत स्वार्थ और अंहकार पूर्ण सोचने मानव जाति को आज ऐसे मुकाम पर ला खड़ा किया है, कि आज की मानव जाति अपने आपको कितनी ही स य और वैज्ञानिक खोजो से प्राप्त अर्थो से परिपूर्ण समझे। मगर कुछ घटनाऐं मानव जगत के बीच वो अनसुलझी पहेलियों की तरह है जिनका जबाव न तो आज के स यता में मिलता है, और न ही वैज्ञानिक खोजो में।
कहीं बारिस से तबाही, तो कहीं जमीन या समुद्र जल के अन्दर जल जले, तो कहीं तूफानो की मारा-मारी, दिन व दिन इस तरह की प्राकृतिक आपदाऐं सारे भू-भाग पर बढ़ती जा रही है। मगर सारी स यता और वैज्ञानिक द्रष्टि कोण इसी दरवाजे पर आकर नतमष्तक है। किसी के पास इस तबाही को रोकने का कोई पूर्व अनुमान नहीं। तबाही पृथ्वी के किसी भी भू-भाग पर हो, मानव जाति और जीव अवश्य प्रभावित होते है। कारण साफ है कि प्रकृति से बाहर कुछ भी नहीं अगर प्रकृति अनुकूल स यता और विज्ञान का विकास हो तो कोई कारण नहीं, जो इस तरह की होने वाली तबाहियों से किसी भी जीव या मानव को दो-चार होना पड़े।
मगर हमारा अंहकार और हमारे स्वार्थ आज जिस चरम पर पहुंच प्रकृति को नकार विज्ञान की सेवा में जुट अपनी सतत सत्ता बनाये रखने आतुर है, उसके चलते इस तरह की विनाश लीलाऐं अनवरत चलती रहेंगी। फिर चाहे वह सुनामी हो या फिर भूक प और तूफान तथा बारिस। इनका प्रकोप इसी तरह हमें अन्य बेजुबान जीवो की तरह ही झेलना पड़ेगा। क्योंकि आज हमारे अंहकार, स्वार्थ, वैज्ञानिक खोजो से प्राप्त सहुलियते वे लगाम है। जिस भारत की सीमा से सटे नेपाल उससे पूर्व पाकिस्तान, काश्मीर, गुजरात, लातुर, तमिलनायडू, मध्यप्रदेश में जिस तरह की प्राकृतिक आपदाओं में मानव जाति की तबाही हुई है वह काफी हृदय विदारक रही है। मगर ये तबाहियाँ ही हमारा हृदय परिवर्तन नहीं कर सके। आज भी हम प्रकृति को धता-बता वे हिसाब प्रकृति विरुद्ध दोहन में लगे हुये है। न तो विकास निर्माण से पूर्व कोई वैज्ञानिक सोच है, न ही प्रकृति प्रदत्त आध्यात्म का ज्ञान। सब कुछ विकास और सुविधा के नाम अंधा-धुंध चल रहा है। स्वयं के स्वार्थ इतने सर्वोपरि है कि मानव उन पर सब कुछ न्यौछावर कर सुख सुविधाओं के साथ जिन्दा रह अपनी आने वाली सात पुस्तो का इन्तजाम करना चाहता है। जो न समझ है, वह अपने आराध्य देवों की कृपा या कुद्रष्टि समझ ऐसी तबाहियों को झेल लेते है। जो समझदार वह अपने रुतवे और धन के बदले सब कुछ अपना कर लेना चाहते है। न तो उन्हें किसी आराध्य की जरुरत और न ही किसी की कृपा की। क्योंकि वह यह मान लेते है, कि उनसे बड़ा कौन आराध्य है जो उन्हें उनकी मन-मानी से रोक सकता है। शायद मानव जाति का यहीं भ्रम उसके विनाश का एक मात्र कारण होगा। क्योंकि प्रकृति तो अजर-अमर उसकी खोद में तो बड़े-बड़े बलशाली, यस्वी सभी ने जन्म ले दम तोड़ा है किसी ने कई पीढिय़ों किसी ने पूरी पीढ़ी दर पीढ़ी प्रकृति का सुख लिया है। मगर ये हमारी स्वार्थ और अंहकार पूर्ण स यता ही है, कि इतनी सुख सुविधाओं के बावजूद भी मानव सामान्य रुप से निर्धारित 100 वर्ष की आयु भी पूरी नहीं कर रहा है। सोचना होगा हमें हमारी मानव जाति को कि वो कौन सी खामिया रही कि 56 इंच की छाती और 42 इंच की कमर से घटकर नई नस्ल की छाती 36 और कमर 26 से लेकर 36 पर सिमट गई। स यता को भी विचारणीय विषय यही होना चाहिए और विज्ञान की खोज भी इसी दिशा में चलनी चाहिए तभी हम प्राकृतिक आपदाओं से इतर एक खुशहाल, स पन्न और विश्वसनीय मानव जीवन देख पायेगें। 

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