काफुर हुई खुशहाली...?

व्ही.एस.भुल्ले तीरंदाज भैया- कै दहशत, ही अब हम गरीबों की खुशहाली का मर्म बचा है। आखिर हम गरीब ही नहीं, हारे देश के भले लेागों का क्या ...

व्ही.एस.भुल्ले तीरंदाज
भैया- कै दहशत, ही अब हम गरीबों की खुशहाली का मर्म बचा है। आखिर हम गरीब ही नहीं, हारे देश के भले लेागों का क्या गुनाह है जो हमें हमारे ही द्वारा चुनी गई सरकारोंं के बीच दहशत भरा जीवन जीना पढ़ रहा है। ऐसी दशहत तो भाया मने भाई लेागों के क्षेत्रों में भी न देखी, जो हमें हमारी ही व्यवस्था की सर परस्ती में, महसूस हो रही है।
आखिर कै करुं कहां छाती कूटू, जो हारे शेष बचे जीवन को जीने, भयमुक्त वातावरण नसीब हो जाये। बरना हारा जीवन तो किसी नरक से कम नाये, पहला रोजी रोटी का संघर्ष, फिर पूरी कीमत चुकाने के बाद भी सेवा सुविधाओं और शुद्ध वस्तुऐं हासिल करने संघर्ष, मगर भाया अब तो ऐसे माहौल में हारे जैसे गरीब के जान के लाले है। आखिर कै करुं हारी जान तो बैसे भी बेजान हो,उस लेाकतंत्र के हवाले है। जिसका अर्थ ही समूह में मौजूद नव सामंतवाद और, साम्राज्यवादियों ने बदल, हारे जैसे लेाकतंत्र समर्थकों का लेाकतंत्र की आड़ में भावनाओं का भुर्ता बना डाला है।

भैये- कै तने बावला शै जो हारे महान लेाकतंत्र की आस्था का प्रतिबि ब, हारी सरकारों और प्रशासन के त्याग पर अर्र-बर्र बोल रहा है। कै थारे को मालूम कोणी हारी सरकार और प्रशासन का थारे जैसे नंगे भू ाों की काठी ढोते ढोते दम निकल रहा है। और दिन व दिन बढ़ती सब्सिटी और सेवाओं पर बढऩे वाला खर्च दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है।

भैया- मैं जाड़ू थारे जैसे चिन्दी पन्ने वालो की मशखरी और माल मुल बत सो अलग, अब ऐसे में थारे जैसे चित्रकार पत्रकारों का दोष कहां ? गलती तो हारे जैसे आम गरीब की है। जो चन्द दुकड़ों पर मेाहित हो अपने बहुमूल्य वोट को लुटा आते है। और फिर कभी बिजली सड़क, पानी तो कभी संचार, स्वास्थ जैसी सेवाओं को पूरा दाम चुका पूरी सेवायें प्राप्त करने आये दिन दर व दर के धक्के खाते है। मगर मुये वोट कबाड़ू कही नजर नहीं आते है। मने तो आये दिन के दशहत भरे माहौल में कुछ नजर नहीं आता है। बैचारे हारे किसान कहीं सदमे से मरे रहे है, तो कहीं फांसी पर झूल रहे है। और हारे जैसे निक मे खुली आंखों से पेड़ों से लटकी अन्नदाताओं की लाशो को बड़ी ही बेशर्मी से घूर रहे है। कै यहीं हारा महान लेाकतंत्र है, जहां मातहत मजे में और अन्नदाता आत्महत्या कर रहे है।

भैये- अगर तने थारा भला चावे तो हारे माई बापों को मत कोस, माननीयों को छोड़ जिन्हें थारे जैसे लेागों ने ताली बचा बचा कर इसी चौराहे पर माला पहनाई थी। मगर हारे श्रीमानो की शान में अब तू एक शब्द भी न बोल, बरना थारी हालत भी उस अखबार वाले की तरह हो जायेगी। जिसकी भोपाल में बनी आलीशान इमारत की तरह थारी झोपड़ी भी हमारे महान भू-भाग पर पलक झपकते ही जमी दोष हो जायेगी। सो मने तो बोल्यू तू चुप ही कर। और 100-200 से लेकर 2000 रुपये तक के बटने वाले मुआवजे के नाम बटौने को झटकने की व्यवस्था कर बरना आफत के बीच चैक तो दूर चबन्नी भी थारे को नहीं मिल पायेगी, मने तो लागे गर थारा हाल ऐसा ही रहा, तो थारी काठी भी किसी पेड़ पर लटकी नजर आयेगी।

भैया- मने समझ लिया थारा इसारा अगर लेाकतंत्र के नाम मची लूट-पाट और दशहत का खेल कुछ दिन यू ही चलता रहा तो मने भी किसी खेत पर लगे वृक्ष की डाली पर नजर आऊंगा। अगर इतने पर भी बात न बनी तो भाया मने भी दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर अन्ना की तरह त बू गाढ़ मोर्चा लगाऊंगा और थारे जैसे मीडिया वालो के सामने ढकरा ढकरा कर चिल्ला, समुचे देश को बताऊंगा कि क्यों है, देश में दहशत और क्यों फांसी पर झूल रहे है, लेाग। बोल भैया कैसी रही।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: काफुर हुई खुशहाली...?
काफुर हुई खुशहाली...?
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