कॉग्रेस: कहने सुनने के बजाये, कुछ करने का वक्त

व्ही.एस.भुल्ले। राहुल की समझ या न समझ पर उठते सवाल और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कॉग्रेस की विगत वर्षो तक रही कार्यप्रणाली तथा वो रणन...

व्ही.एस.भुल्ले। राहुल की समझ या न समझ पर उठते सवाल और सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कॉग्रेस की विगत वर्षो तक रही कार्यप्रणाली तथा वो रणनीतिकार जो विगत वर्षो से इस कॉग्रेस को सोनिया के नाम चलाते आ रहे कि समझ के परिणाम समुचे देश ही नहीं, आज कॉग्रेस के सामने है। 

अगर यो कहें कि उस काकस की रणनीति को देश ने नकार दिया, जो सोनिया गांधी के नाम यूपीए 2 और उस दौरान कॉग्रेस को चलाते रहे है। क्योंकि इस दौरान वह युवा तुर्क इन्हीं दलीलो के चलते खुलकर काम ही नहीं कर सका। कि उसे समझ नहीं है, जब तब उस युवा ने राष्ट्र हित जनहित में उन रणनीतिकारों की नीतियो के विरुद्ध बगावत का विगुल फूंका भी तो उन्ही समझदारों ने उसे बचकाना कदम या न समझ होने पर चुप करा दिया। और कॉग्रेस को उन्हीं समझदार रणनीतिकारों द्वारा मन माफिक ढंग से चलाया गया।

आज जब समुचे देश में इन्हीं रणनीतिकारों की नीतियों के चलते समुचे देश से कॉगे्रस का सूपड़ा साफ होता जा रहा है उसके बावजूद भी उस युवा शक्ति को रोकने का असफल प्रयास येन-केन प्राकेरण किया जा रहा है। जो राहुल के नेतृत्व में कॉग्रेस के लिये कार्य करना चाहती है। अब बात हो रही है कि कॉग्रेस सेानिया गांधी के नेतृत्व में ही चले और तब तक राहुल भारत भ्रमण कर देश और देश के लेागों के समझे।

यह कटु सत्य है। कि कॉग्रेस जैसे पवित्र महान संगठन और गांधी परिवार की प्रतिष्ठा स हालने से पूर्व यह अग्नि परीक्षा भी होना चाहिए हो सकता है स पूर्ण सत्य भी यही हो, तो इसमें हर्ज ही क्या ?

निश्चित ही कॉग्रेस के लिये यह वक्त कहा सुनी से अधिक कुछ काम करने का है। तो फिर राहुल के नाम या फिर उनकी काबलियत को लेकर बार-बार कोहराम क्यो ? जबकि प्रतिद्वन्दी दल कॉग्रेस मुक्त भारत का सपना देख, सतत सत्ता सुख भोगने उतावला है।

बेहतर हो कि कॉग्रेस अब भी व्यक्तिगत अहम और स्वार्थ छोड़ कॉग्रेस के लिये कुछ करने की दिशा में कूच करे, न कि टी.व्ही. घरों में बैठ इस बात पर बहस करे कि राहुल को कितनी समझ है या कितनी नहीं।

यह बात वह राहुल के भविष्य पर छोड़ दे। क्योंकि कॉग्रेस एक विचार धारा है। अगर राहुल में काबलियत है तो कॉग्रेस को राहुल और राहुल को कॉग्रेस को आत्मसात कर लेगी।

मगर निस्तनाबूत हो चुके संगठन को खड़ा करने की शुरुआत तो, होनी ही चाहिए। जिसके लिये कॉग्रेस के पास राहुल से बेहतर चमकदार नेतृत्व फिलहॉल कोई दूसरा नहीं, उनके महा अभियान में उनके पीछे, उनके पारिवारिक सदस्यों के अलावा कॉग्रेस के युवा तुर्को की ल बी चौड़ी फौज है। और देश भर में फैले उनके मार्गदर्शक शुभचिन्तकों की ल बी-चौड़ी कतार जो राहुल को करीब से देख समझ कर साथ देने तैयार बैठे है।
मगर फिलहॉल आर्थिक और संगठनात्मक तौर पर अक्षम कॉग्रेस को भाई लेाग अपनी आर्थिक सक्षमता और अपनी लेाकप्रियता के आधार पर अपने-अपने हिसाब से चला रहे है।

क्योंकि संगठन चलाने कई प्रदेशों में कॉग्रेस के पास न तो कोई आर्थिक श्रेात है। और न ही कोई संगठनात्मक ढांचा हालात ये है कि कॉग्रेस को मजबूत करने की मंशा लिये, लेाग इधर-उधर धक्के खाते घूम रहे है। और भाई लेाग अपने स्तर पर ही अपने-अपने ओहदो का लाभ उठा, कॉग्रेस को ठिये ठिकाने लगा अपनी अपनी फिल्म चमका रहे है। न तो किसी को सोनिया, राहुल की परवाह है और न हीं, संगठन की। जिसके चलते एक महान विचार धारा वाली पार्टी की न तो कोई दिशा है न ही संगठनात्मक ढांचा अर्थ के आभाव से जूझती कॉग्रेस की शायद यहीं बेवसी है। जिसका परिणाम कि सेानिया गांधी के त्याग भरे चमकदार नेतृत्व और राहुल गांधी की कड़ी मेहनत के बावजूद देश के सर्वोच्च सदन में विपक्ष का रुतवा तक हासिल नहीं हो सका। और कॉग्रेस विगत लेाकसभा चुनावों में 44 सीटो पर सिमट गई।

कारण साफ है। आज देश भर में अर्थ विहीन, संगठन विहीन कॉग्रेस बेवस हो, संघर्ष तो दूर कोणी, उसमें ठीक ढंग से खड़े रहने की क्षमता तक नहीं दिखती। जिन क्षेत्रों और प्रदेशों में कॉगे्रस की करारी हार हुई है। उन क्षेत्रों, प्रदेशों के मठाधीसों ने संगठन और धन का इस्तमाल स्वयं के स्वार्थ और नफा नुकसान को देखकर किया।

कहते है इस दुनिया में किसी का कोई धनी धोरी न हो, उसे अनाथ कहते है। यहीं हालत कॉग्रेस की देश भर में हुई, न तो जि मेदार पिता के रुप में संगठन ही रहा, न ही जबावदेह माँ के रुप में धन लक्ष्मी, और निरअपराध होने के बावजूद भी कॉग्रेस को 44 सीटों पर सिमट कर, अनाथों की लाइन में खड़ा होना पढ़ा। अब अगर हर तरफ से अनाथ हो चुकी कॉग्रेस को राहुल नाम देने तैयार है। वह भी उस महान महिला के नेतृत्व संरक्षण में जिसने विपरीत संस्कृति, स यता, संसकरों के बावजूद इस देश की बहु मां, मुखिया होने का उत्तरदायित्व पूरी निष्ठा ईमानदारी से निभाया, भले ही उस महान महिला को कॉग्रेस बचाने कीमत जो भी चुकानी पड़ी हो, मगर इस देश के एक महान संगठन व देश के प्रतिष्ठित परिवार को कभी शर्मिंन्दा नहीं होने दिया।

आज आम कॉग्रेसी या कॉग्रेसी विचार धारा से जुड़े लेागों को यह नही भूलना चाहिए कि जो युवा अपनी मां की बातों का अक्षरश: पालन करता हो, अगर देश व देश के गरीब आम किसान के खिलाफ कुछ होता हैं तब वह उनके लिये समस्त सीमाऐं तोड़ राष्ट्र हित में कुछ बैबाक कहता हो। ऐसे में उस युवा तुर्क के नेतृत्व को नकारना बैमानी है। फिर यह कहावत भी है कि आम के पेड़ में आम और जामफल में जामफल उगते है जो राहुल, स्व. पंण्डित नेहरु, स्व. इन्दिरा, स्व. राजीव का अंश है उसकी काबलियत या समझ पर किसी प्रकार की शंका, सुबाह, स्वयं के स्वार्थ, अंहकार को जिन्दा रखने, एक असफल और अन्तिम लड़ाई के अलावा और कुछ भी नहीं।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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कॉग्रेस: कहने सुनने के बजाये, कुछ करने का वक्त
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