दल के दल-दल में दांव पर प्रतिष्ठा

विगत वर्षो के दौरान सरकार और उसके मु यमंत्री को मुंह चिड़ाने वाली, घटनाऐंं या कितने ही घपले घोटाले क्यों न हुये हो, मगर हर घटना घोटाले पर बैचारे मु यमंत्री असहाय से नजर आये। चाहे उनकी सरकार के सिर मौर रहे महामहिम पर एफ.आई.आर. का मामला हो या फिर खनन, व्यापाम जैसे महाघोटालो, उस पर से एक आई.पी.एस. अधिकारी, खनिज इन्सपेक्टर और अब सिपाही की अवैध खनन रोकने में मौत या हत्या इसके अलावा भी सतना, हरदा, राधौगढ़़, भिण्ड विभिन्न अधिकारियों के साथ सरेयाम अभ्रदता, मारपीट के मामले रहे हो, जिसके विरोध में म.प्र. के अधिकारी, कर्मचारी सेट डाउन जैसा आन्दोलन भी करना पड़ा।मगर मु यमंत्री, अपनी ही सरकार में अपने ही लेागों के आगे असहाय नजर आये, आखिर क्यों ? क्या संदेश देना चाहते मु यमंत्री समुचे म.प्र. वासियों को।

भ्रष्टाचार के मामले में भले ही चोटी के दो आई.ए.एस. और अनगिनित इन्जीनियर अधिकारी कर्मचारी लेाकायुक्त और आर्थिक अपराध की जद में आ जांचों से जूझ रहे हो, मगर भ्रष्टाचार है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। अगर यो कहें कि विगत 10 वर्षो में बढ़े भ्रष्टाचार ने अब सारी हदे तोड़ रखी है। तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।

छोटे से छोटे खरीदी या बड़े से बड़ी खरीदी, या निर्माण कार्यो में अघोषित तौर उसी विभाग के लेाग दूसरे के नाम या फिर अपने नाते, रिश्तेदार और बड़े ठेकेदारो के नाम सप्लाई निर्माण का गोरख धंन्धा चमकाने में जुटे है। लेाकायुक्त आर्थिक अपराध के छापों में मिलने वाली करोड़ों की बेहिसाब स पत्ति इस बात का प्रमाण है कि म.प्र. में भ्रष्टाचार कितने बड़े पैमाने पर शासकीय कार्यालयों में पैर पसार चुका है।

कारण साफ है जब सरकार और शासन के लेाग पद और ओहदो का दुरुपयोग कर अपने अपने घर भरने में लग जाते है। और लाख, 25, 50 हजार की पगार पाने वाले या रसूखदार नेता, दलाल देखते ही देखते लखपति करोड़पति हो जाते है। जिनकी लग्झरी कारे और आलीशान कोठिया और समाज में आर्थिक रुतवा देखने वाले नौकरशाह और नेता सहित सरकार के मुखिया आखे बन्द कर जाते है। ऐसे में सामाजिक  बैमनश्यता आर्थिक तौर पर सामने आती है।

क्योंकि आम जनता सरकार और उनके नौकरशाह, नेता, कर्मचारियों की यह करतूत अपनी खुली आंखों से देखती।
जिस पर कुछ नहीं, मगर सिर्फ वोट होता है। वह सरकार की योजनाओं से वोट बैंक की खातिर ऐन-केन प्राकरेण बटने वाले बटोने को पाकर सन्तुष्ट हो जाते।
मगर जो लेाग सरकारी लूट और बटोने से बन्चित रह जाते है वो ही वर्ग धन के लिये अराजक हो, घपले, घोटाले, शर्मनाक घटना क्रमों को अंजाम तक पहुंचाते है।

हो सकता है मु यमंत्री जी की इस असहजता के पीछे की कोई मजबूरी हो, जिसे वह जनता के सामने न रख पाते हो,  जिसे वह व्यक्त करने में भी संकोच रखते हो। मगर इतना तो सच है कि कोई भी मु यमंत्री इतना असहज नहीं होता आखिर वह उस सरकार का मुखिया होता है। जिसे संवैधाानिक तौर पर लेाकतंत्र में आसीम शक्तियाँ प्राप्त होती है। जिसको जनता का मत होता है। म.प्र. में एस.आई.टी. न हुई अलाउद्दीन का चिराग हो गया, जो व्यापाम सहित मुरैना में शहीद हुये सिपाई की सच्चाई पलक छपकते 15 दिन में सामने ला देगी। अगर एस.आई.टी. सरकार को, मु यमंत्री के निर्देश पर सच से सामना करा भी दे, तो सरकार फिर ऐसा क्या करेगी जो उसने इसी मुरैना मे एक आईपीएस म.प्र. के खनिज इन्सपेक्टर प्रदेश भर के  कई अधिकारियों के साथ अभद्रता मार पिटाई, खनिज व्यापाम घोटाले, लेाकायुक्त, आर्थिक अपराध के छापों में पकड़ी करोड़ों की अकूत स पत्ति और वर्तमान में चल रही केन्द्रीय खरीदी या दिशा निर्देशों की आड़ में मची लूट की छूट बन्द हो जायेगी। यहीं यक्ष प्रश्र मु यमंत्री की असहजता दर्शाता है। कि वे कितने असहाय है अगर वह इतने ही अपनी सरकार में असहाय है तो उनके पीछे से सरकार का संचालन कत्र्ता कौन है ? इस सवाल का जबाव उस जनता को जिसे वह अपना भगवान मानते हैं, आने वाले समय में अवश्य देना होगा। बरना सवाल तो सवाल है सवालो का क्या ?



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