67 वर्ष, सड़ांध मारती व्यवस्था

व्ही.एस.भुल्ले। विलेज टाईम्स 19 अप्रैल 2015। २ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटेन की संसद में मैकाले की भारत के प्रति विचार और योजना मैकाले के शब्दों में-


" मैं भारत के कोने कोने में घुमा हूँ..मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया, जो भिखारी हो ,जो चोर हो, इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है,इतने ऊँचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं,की मैं नहीं समझता की हम कभी भी इस देश को जीत पाएँगे,जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो
इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है और इसलिए मैं ये प्रस्ताव रखता हूँ की हम इसकी पुराणी और पुरातन शिक्षा व्यवस्था,उसकी संस्कृति को बदल डालें,क्युकी अगर भारतीय सोचने लग गए की जो भी बिदेशी और अंग्रेजी है वह अच्छा है,और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है ,तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी ही संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बनजाएंगे जैसा हम चाहते हैं.एक पूर्णरूप से गुलाम भारत "

निश्चित ही आज से 150 वर्ष पूर्व शसक्त पूंजीवाद साम्राज्य स्थापित करने मैकाले की नीति अस्तित्व में आई हो, क्योंकि वह नीति मैकाले के राष्ट्र हित में थी। इतिहास गवाह है कि हर राष्ट्र स्वयं को शसक्त स पन्न बनाने, कोई न कोई नीति अवश्य बनाता है। सो मैकाले ने भी अपने राष्ट्र हित में भारत भ्रमण पश्चात इस तर्क के साथ ही मैंने विश्व में कई भू-भाग देखे है मगर भारत जैसा खुशहाल, स पन्न, भू-भाग राष्ट्र नहीं देखा। अगर इसे अपने अनुकूल बनाना है तो इसकी शिक्षा नीति में परिवर्तन जरुरी है।

मगर हम आजाद भारत वासी नीतियों के मामले में शायद मैकाले को भी पीछे छोड़ चुके है। मैकाले की नीति से तो हमारे देश में गुलाम और नौकर ही निकलते रहे। मगर आजाद भारत में तो हम हमारे लेाकतंत्र की छत्र-छाया में शोषक और पौषको के समूह में बट, जिन्दा रहने अपने स्वार्थो अंहकार के चलते गला काट प्रतिस्पर्धा में जुट गये। जहां जो भी है उसे इन्सानियत से कोई सरोकार नहीं रह गया। स्वयं स्वार्थ, स्वयं की सुखसुविधाऐं जुटाने हम स्वयं में इतना डूब चुके है। कि वहां से हमारी स यता, संस्कृति, संस्कार, सरोकार कोसो दूर तक, नजर नहीं आते है।

कारण हमारी शिक्षा नीति, जिसे आजादी के 67 वर्ष बाद भी हम न तो उसे राष्ट्र उन्मुखी बना सके, न ही स पन्नता, खुशयाली उन्मुखी, अब्बल हम स्पष्ट शिक्षा नीति के आभाव में आज भी वही,के वहीं खड़े है, जहां से देश के आम नागरिक की सुरक्षा, स पन्नता और खुशहाली का रास्ता बन्द होता है।

वोटो की मजबूरी ने हमें इतना अन्धा कर दिया कि आज हमारी महान शिक्षा, स यता, संस्कृति, संस्कार, सरोकार सभी दम तोड़ चुके है। हालात से है कि आर्यभट्ट और होमी जाहांगीर भावा के बाद, एक भी ऐसा नाम प्रस्तुत नहीं कर सके, विश्व में जिसे हम विश्व बिरादरी में गर्व से ले सके।

क्योंकि हमारी शिक्षा नीति ही ऐसी रही और जिससे आज भी या तो गुलाम, या फिर नौकर ही निकलते है या फिर शोषक, और पोषक की श्रेणी में बटे लोग, बस इन्हीं को लेकर आज राज सत्ता और कई समूह संघर्षशील है। जिसके चलतेे भारत आज एक बड़ा बाजार एवं प्राकृतिक, वौद्धिक, आध्यातमिक एवं शारीरिक रुप से स पन्न होने के बावजूद भी शोषित और पोषित की मण्डी बन, गुलाम, नौकर तैयार करने का हब बना हुआ है।

कहते है कि जिस राष्ट्र की राज सत्ता अपनी स यता, संस्कृति, संस्कार बचाने में अक्षम हो। और उस राष्ट्र के नागरिक अन्याय सहने के आदि। तो ऐसे राष्ट्र के लिये स पन्नता खुशहाली उस दिवा स्वप्न के सामने होती है। जिसे देखते देखते पीढिय़ाँ निकल जाती है। मगर वह स्वप्न कभी साकार नहीं हो पाता।


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