सियासी सैलाब और दम तोड़ता लेाकतंत्र, भ्रष्टाचार से लडऩा, कठिन, मगर ना मुमकिन नहीं

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तेजी से देश में विकास और परिवर्तन हो रहे है उन्हें सही दिशा में ले जाना बहुत जरुरी हैैै। क्योंकि व्यवस्था और समाज से भ्रष्टाचार का समूल खात्मा अब आज की जरुरत है, यह काम कठिन हो सकता है मगर न मुमकिन नहीं।


भ्रष्टाचार रुपी महामारी से निवटने जरुरी है कि इसकी शुरुआत ऊपर से हो अर्थात सर्वशक्तिमान सत्ता सौपान से हो, जिसे हमारी लेाकतांत्रिक व्यवस्था में असीम संवैधानिक शक्तियाँ प्राप्त है।
ये सही है कि लेाकतंात्रिक व्यवस्था में सत्ता सौपानो की अपनी मजबूरियाँ होती है मगर सच यह भी है कि बहुत हद तक समाज और व्यवस्था को दिशा भी यही से मिलती है।

अब जबकि स्वयं देश के प्रधानमंत्री भी यह मानते है कि सरकार में रहकर भ्रष्टाचार से लडऩा कठिन जरुर है, मगर इस काम को हम पूरी ताकत से पूरा करेगें। वहीं म.प्र. के मु यमंत्री भी 10 वर्ष पूर्व कह चुके है। कि वह भ्रष्टाचार के खात्मे की शुरुआत ऊपर से करेगें। हालाकि उनके रहते कुछ बड़ी कार्यवाही हुई और निचले स्तर पर आय दिन होती भी रहती है। जिनसे ये प्रमाण भी मिल रहे है कि व्यवस्था में भ्रष्टाचार कितने बड़े पैमाने पर व्याप्त है।

मगर सवाल फिर वहीं उठता है कि जिस भ्रष्टाचार की अवैध सन्ताने सत्ता प्राप्ति का माध्ययम और समाज में रसू ा बनाने का एक मात्र कारण बन चुकी हो ऐसे में प्रधानमंत्री जी का दर्द समझा जा सकता है।

जिस ईमानदारी के साथ केन्द्र की सत्ता में बैठते ही प्रधानमंत्री ने सत्ता सौपनो के बिगड़े ढर्रे का सुधार कार्य विगत 9 माहों मेंं पूरी निष्ठा ईमानदारी से किया है वह काबिले गौर है। मगर जो रचनात्मक रवैया गुण दोषो के साथ विपक्ष का होना चाहिए, वह देखने नहीं मिल रहा।

सत्ता और विपक्ष को देश व देश वासियों की खातिर चाहिए कि जिस उ मीद के साथ आम गरीब, मजदूर, किसान ने उन्हें चुन कर सदन तक अपने प्रतिनिधि बतौर पहुंचाया है वहां बैठकर वह उन कानूनों की समीक्षा करे, जो अब औचित्यहीन हो गये है। ऐसे कानून बनाये, जो जबावदेह हो जिससे भ्रष्टाचार जैसी महामारी से प्राकृतिक रुप से लड़ उसे खत्म किया जा सके। और यह कोई बहुत बड़ा कार्य नहीं इसे हर सरकार, नागरिक बगैर किसी को कष्ट पहुंचाये बगैर थाने दारी किये भी कर सकती है।

बशर्ते सत्ता सौपान दो कार्य कर ले पहला दाम बाधना दूसरा जबावदेही निर्धारित करना। और यह तभी स भव है जब किसी भी सरकार के मुखियाओं की दृढ़ इच्छा शक्ति मजबूत और भ्रष्टाचार खात्मे का जुनून उनमें हो।
सबसे बड़ी दिक्कत व्यवस्था की यह है कि उसका तरीका भ्रष्टाचार खत्म करने को लेकर हिंसक व अव्यवहारिक रहता है। चाहे वह कानून के माध्ययम से हो या फिर व्यवहारिक तौर पर। अगर यहीं तरीका अहिंसात्मक और व्यवहारिक हो, तो कोई कारण नहीं जो समुचे समाज ही नहीं,व्यवस्था को भी भ्रष्टाचार मुक्त बनाया जा सकता है।

और यह कोई बहुत कठिन काम नहीं मगर हमेशा होता इससे उलट है क्येांकि जो लेाग ा्रष्टाचार में रच बस, स्वयं स्वार्थी हो चुके है। वह यह नहीं चाहते है कि भ्रष्टाचार खत्म हो। इसलिये वह अघोषित रुप में संगठित हो, लेाकतंत्र के नाम भ्रष्टाचार की मुहिम की ही हवा निकाल देते है।
या फिर भ्रष्टाचार से लडऩे वाले को ही भ्रष्टाचार की नई परिभाषा गढ़ उसे भ्रष्ट साबित कर देते है। क्योंकि अब भ्रष्टाचारियों का सं या बल टॉप टू वॉटम ज्यादा हो चुका है।

उदाहरण स्वरुप कुछ दिन पहले तक तो लेाकसभा विधानसभा चुनावों में ही शराब, पैसा बांट चुनाव जीतने के किस्से सुने जाते थे। तब न तो देने वाले, न ही लेने वाले ही बताते थे। मगर अब तो खरीदा बैची का खेल नगर निकाय, पंचायती चुनावों में गली, मोहल्लों तक ही नहीं, गांव चौपालो तक पहुंच चुका है। कोई शराब पैसा बांट कर जीत चुका है तो कोई शराब, पैसा पाकर खुश हो रहा है।
ऐसी ही हालत गैर सत्ता सौपानो से जुड़ी है कमीशन सत्ता सौपान तक नहीं, आम गरीब, मजदूर, श्रमिक तक पहुंच चुका है। उपहारो, फ्री की यात्राओं के उपहार छोटे-छोटे दुकानदारो से लेकर होल सेलर तक पहुंच रहे है हालत ये है कि जिसको जहां जैसा मिल रहा है। मसक के समेट रहा है और खुद के लुटने पर सामने वाले को भ्रष्ट तो सरकारों को कोस रहा है। भ्रष्टाचार का व्यवहारिक सच तो फिलहॉल यही है।

रहा सवाल सत्ता सौपानो का तो भ्रष्टाचार रोकने हर 10 कदम पर स्पीट ब्रेकर बना है। मगर भ्रष्टाचार नहीं रुक रहा है।
बहरहॉल जो भी हो, हालत ये है कि लेाकतंत्र की आढ़ में भ्रष्टाचार को जिन्दा रखने की होड़ मची हुई है। वह बड़ी ही खतरनाक है। जिसका परिणाम भूमि, अधिग्रहण बिल पर बैवजह का बवाल मचा है। वह काबिले गौर है अन्दर का सच क्या है ये सरकार और विपक्ष ही जाने मगर व्यवहारिक सच यह है कि जब तक कोई भी सरकार जबावदेही और दाम बाधने की दिशा तय कर बैवजह के स्पीट ब्रेकरो का खात्मा नहीं करती तब तक भ्रष्टाचार से लडऩे की बात बैमानी है।

अगर सड़क, बांध, उघोगों को जमीन चाहिए तो देना ही पड़ेगी चाहे, अडऩानी या अ बानी हो इसमें गलत क्या ? किसी भी सरकार का पहला धर्म, राजधर्म होता है। विपक्ष का काम अगर राजधर्म पालन में कोई तृटि या सुझाव हो, तो बेझिझक सरकार के सामने रखना चाहिए। बात सदन में न सुनी जाये तो सड़क तक जाना चाहिए। क्योंकि सही गलत का फैसला तो जन अदालत करती है जो हर 5 वर्ष में लगती है।

फिर हाय तौबा क्यों ? अगर इसी तरह आरोप-प्रत्यारोप के बीच भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरु हुई यह मुहिम अधर में लटकी तो कोई कारण नहीं जो दिल्ली की गंगोत्री से शुरु हो, 2015 में गांव, गली, मोहल्ले चौपालो तक जा पहुंची भ्रष्टाचार की गंगा कभी भी रुद्र रुप धारण कर देश के सत्ता सौपानो और समाज में तबाही मचा दे तब न तो हमारे पास कुछ कहने होगा, न ही सुनने जैसी स्थति होगी, और आने वाली पीढ़ी हमें इस दुष्कृत्य के लिये कभी क्षमा करेगी।

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