विकृत होते समाज में, विश्वास का संकट : कैसे बने खुशहॉल भारत

व्ही.एस.भुल्ले। कहते है वहीं भी किसी भी क्षेत्र में अविश्वास घर कर जाये तो, वहां विनाश सुनिश्चित होता है। ऐसा ही कुछ आज हमारे महान लेाक...

व्ही.एस.भुल्ले। कहते है वहीं भी किसी भी क्षेत्र में अविश्वास घर कर जाये तो, वहां विनाश सुनिश्चित होता है। ऐसा ही कुछ आज हमारे महान लेाकतंत्र में देखने सुनने मिल रहा है। सरकारे बना देश चलाने वाले संगठन जहां वोटर पर विश्वास नहीं कर पा रहे तो दूसरी ओर वोटर भी उन दलो और जनप्रतिनिधियों पर विश्वास नहीं बना पा रहे। जिन पर जनता से वोट ले, सरकार बना उनका जीवन खुशहाल बनाने की जबावदेही है। जो चुनने के बाद, वह अपनी शपथ के दौरान भी दोहराते है।

बात अगर सत्ता और राजनीति तक होती तो कुछ सुधार की स भावना थी। मगर बात अब आम समाज तक जा पहुंची है। जहां अविश्वसनीयता का डंका जमकर बोल रहा है।

देखा जाये तो किसी भी स य संस्कारिक समाज की पहली सीढ़ी अर्थात पाठशाला परिवार ही होता है। जिसके संगठित स्वरुप को समाज कहा जाता है। फिर चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, बोली, भाषा या क्षेत्र से हो। कई समाज मिल कर ही किसी राष्ट्र की रचना करते है। जिसे चलाने संवैधानिक व्यवस्था होती है। जिसे औपचारिक अनौपचारिक तौर पर अंगीकार करना होता है।

सौभाग्य से हम भारत वासियो ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को अंगीकार किया है, जिसमें हर भारत वासी के कुछ मौलिक अधिकार है तो कुछ कर्तव्य भी है।

लेाकतंत्र ठीक ढंग से चले इसके लिये संवैधानिक संरक्षण प्राप्त तीन संस्थाऐं भी है। पहली विधायिका, दूसरी कार्यपालिका, तीसरी न्याय पालिका, विधायिका का कार्य लेागो के जीवन व देश को खुशहाल बनाने नई नीतियाँ और कानून बनाने का अधिकार है तो कार्यपालिका का कार्य विधायिका द्वारा बनाई नीतियों कानूनों का पालन करना है और न्याय पालिका का कार्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिये कानूनों की सही व्या या कर न्याय मुहैया कराना है।

वहीं अभिव्यक्ति की आजादी के तहत मीडिया का कार्य समाज व व्यवस्था में व्याप्त बुराईयों को देश के सामने लाना और अपने अध्ययन और अनुभव के आधार पर उसको सही रास्ता दिखाना है।

मगर अविश्वास के बवन्डर के बीच हमारे महान लेाकतंत्र में सबकुछ स्वाहा हुआ जा रहा है।
अविश्वास का दंश ऐसा कि जिसने परिवार, समाज, संगठन, सत्ता संस्थाऐं सभी को अपने आगोस में ले रखा है। जिसके चलते धीर-धीरे एक ऐसे विकृत समाज का निर्माण होता जा रहा है। जहां न तो अब स्थापित सिद्धान्त, स यता, संस्कार और न ही आपसी विश्वास भाई चारा बचा है। परिणाम कि विधायिकाये राष्ट्रहित जनहित की नीति कानून बनाने में असफल हो रही है। जो मौजूद है उनके पालन में कार्यपालिकाऐं नकारा साबित हो रही है। हालात ये है कि आम नागरिकों को सरकार और नौकरशाहों से काम लेने दण्ड दिलवाने न्यायालयो की शरण में जाना पढ़ रहा है।

माननीय न्यायालयों को सरकारों कार्यपालिका के नौकरशाहो को आदेश दे, बार-बार बताना पड़ रहा है। कि वह क्या करे क्या न करे। सामाजिक हालात ऐसे है कि अभिव्यक्ति के नाम, व्यवस्था, सामाजिक सरोकारों का मजाक उड़ रहा है। जिस तरह से अंहकार या फिर ईश्र्या बस कीचड़ उछालने का क्रम विभिन्न माध्ययमों से समाज में चल रहा है। उसने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है।

बहरहॉल समय रहते, परिवार समाज, संस्थाओं को सोचना होगा और बेहतर समन्वय के लिये संवैधानिक संस्थाओं को आगे आना होगा तथा संगठनों को अंहकार स्वार्थ व साम्राज्यवादी प्रवृति छोड़ राष्ट्र के लिये आगे आना होगा तभी हम खुशहाल राष्ट्र बना पायेगें। बरना कम से कम वर्तमान हालात तो खुशहाल राष्ट्र निर्माण के नहीं दिखते।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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विकृत होते समाज में, विश्वास का संकट : कैसे बने खुशहॉल भारत
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