सत्ता, ऐ जंग में, खत्म हुये, सरोकार...?

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज/  भैया- सत्ता को लेकर छिड़ी जंग और ओलो की आफत के बीच जिस तरह से आर-पार की जंग शान्त पूर्ण तरीके से सियासत के गल...

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज/ 
भैया- सत्ता को लेकर छिड़ी जंग और ओलो की आफत के बीच जिस तरह से आर-पार की जंग शान्त पूर्ण तरीके से सियासत के गलियारों में चल रही है उसके परिणाम जो भी हो मगर सरोकार बैवजह ही खत्म होने के कगार पर है।

मने तो बोल्यू भाया परिणाम जो भी हो, अब तो भाई पीछे भी हटने वाला नहीं।
क्योंकि व्यापाम को लेकर इस मर्तवा हमला सत्ता, सियासत पर नहीं बल्कि इज्जत और स्वाभिमान पर हुआ है। जिसे कोई भी नेक दिल इन्सान किसी भी कीमत पर बर्दास्त नहीं कर सकता है। भले ही वह सत्ता के लिये ही क्यों न हो ?
मगर भाया मने कै करुं ओलों के रुप में हारे तो अरमानो पर गाज गिरी है। थारी भाभी तो आज तक खेतो में बेसुध पड़ी है कैसे चलेगा घर और कैसे होगी बिटिया की शादी कर्ज में डूबी हारी काठी भी तो बैंक वालो के यहां रखी है।
भैये-तने तो बावला शै, भाई ने ओलो की बरबादी दे ा हाथों हाथ एक रुपये किलो चावल, 1 रुपये किलो गेंहू के अलावा बिटिया की शादी में कन्यादान योजना के अलावा 25 हजार रुपये और प्रति हेक्टयर 15 हजार रुपये तथा अगली फसल के लिये बगैर व्याज के ही बीज, खाद को पैसा देने की घोषणा जो की है।
भैया- मगर मने काड़ू का कै करुं जो भाई को ही व्यापाम की विपदा की घड़ी में घोषणा वीर के तमगे से नवाजे जा रहा है। वहीं आम किसान पिछले वर्ष हुई ओला वृष्टि में राहत आज तक न मिलने पर खुलयाम डकरा रहा है।
भैये- मुये चुप कर, सत्ता होती ही ऐसी चीज है और हो भी क्यों न जिन बिचारों के बल जब सत्ता मिलती है और जो लोग जब मेहनत कर अन्धे भक्त हो, सरकार की जय-जय कार में लग जाते हो, तो पुरुस्कार के हकदार भी तो वहीं होगें या थारे जैसे चिन्दी पन्ने वाले और फिर यह अकबर का दरबार थोड़े ही न जहां नवरत्नों को ही उनकी प्रतिभा अनुसार पुरुस्कार से नवाजा जाता हो। कै थारे को मालूम कोणी कि 60 का दशक पार कर चुके, तो कुछ 60 के नजदीक जा पहुंचे, हारे जैसे पत्रकारों को आंचलिक पुरुस्कार मिल गया तो कौन सी जागीर सरकार ने लुटा दी। सच बोल्यू तो भैये देर से ही सही कम से कम हम कलम रगड़ुओं की इज्जत तो बना दी।
भैया- बात पुरुषकारों की नहीं बात तो मान, स मान, स्वा िामान है। मुई माटी पढ़े उन मूड़धन्यो पर जिन्होंने हमारे जैसे चिन्दी पन्ने वाले को न सही हारे बाबू जी को ही देख लेते, गाड़ी भरे काठी ढेाते उन मूड़धन्यो को भी पुरुस्कार देने खोज लेते, जिन्हें वाक्य मे ही पुरुस्कारों की जरुरत है। मने तो बोल्यू काठी उठे थारी जैसे थारे जैसे चिन्दी, पन्ने वालो की आखिर लेाकतंत्र भी तो कोई चीज होवे। मगर उन कल मुंहो का कै करे जो हारे जैसे प_ेधारियों के पीछे पढ़े है। बड़ी मशक्त के बाद मिले, अधिमान्य प_े को भी बड़ी ही बेरहमी से छीनने में लगे है। आज जिस प_े को तू गले में टांग जो इतना इतरा है और खुद को हाथो हाथ अधिमान्य पत्रकार बता रहा है यह खेल भी अब ज्यादा दिन चलने वाला नहीं। क्योंकि हाल ही में हारे प्रदेश में सत्ता के हासिये पर पढ़े कुछ उस्ताद दिल्ली जाकर चिलम भर आये है। आश्वासन मिला या नहीं आज तक किसी को नहीं बता पाये है।
भैया- कै थारे को मालूम कोणी, प_ा तो वफादार कुत्ते या फिर पालतू जीव के गले में होता है। तो मने तो इन्सान हूं अच्छा हुआ जो अधिमान्यता का प_ा जाता रहा और सत्ता के इस मलयुद्ध में हो न हो, कम से कम सत्ता, समाज का सत्य तो सामने आने लगा। कुछ भाई लेाग है जो अन्डी बच्चे से लेकर अब इक_ा हो देश की सत्ता प्रमुख के दरवाजे पहुंच भाई के भ्रष्ट होने के प्रमाण यकीनन तौर पर दे आये हो। मगर देखना यह है कि केन्द्र की सत्ता के प्रमुख बने कितना कुछ कर पाते है। या फिर सत्ता सुख को जागीर समझ, सुख भोगने वालो के सुर में सुर, मिलाते है या मजबूरी बस जनहित में खलनायक बने लेागों की हॉ, में हॉ मिलाते है।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा बातजो भी हो, ओलो की आफत के बीच, अब तो आर पार की चल रही है। मगर भाई की हालत भी भले इन्सान होने के नाते कमजोर नहीं पड़ रही है। अगर भाई का रास्ता सत्य के मार्ग पर है तो कोई ताकत हिला नहीं पायेगी और सरकार 5 वर्ष तक अपना कत्र्तव्य भाई के ही नेतृत्व में निभायेगी। अगर भाई का रास्ता गलत और असत्य की बुनियाद पर टिका है तो कोई भी ताकत इस सरकार को, अब आने वाले समय में नहीं बचा पायेगी क्योंकि सत्य अजय अमर है।
एक लगाओ, दस पायोगे, चल गया तो जादू, चूक गये, तो मौत, क पनी का प्रचार है।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: सत्ता, ऐ जंग में, खत्म हुये, सरोकार...?
सत्ता, ऐ जंग में, खत्म हुये, सरोकार...?
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