बेतुके तर्क, और बर्बाद शहर, सवाल जबाव कैसे ?

हालिया सबसे बड़ी पीढ़ा उन भोले भाले शहर वासियों की है। जिनमें से कुछ बहकावे, तो कुछ लेाग प्रलोभन बस अपना अमूल्य मत बेवजह गवां देते है और 5 वर्षो तक सुविधाओं के नाम धक्के खाते है। एक समय था जब शिवपुरी शहर की सु ा सुविधायें, सुन्दरता देख प्रदेश, देश ही नहीं विदेशी सैलानी तक वाओं कह जाते थे मगर वर्तमान में जो नरकीय हालात इस शहर के है। उन्हें देखकर लगता है आखिर क्यों ?
शहर के लिये आने वाले सिन्ध के शुद्ध पेयजल का जो हुआ सो हुआ, मगर सीवर लाइन से जो नरकीय हालात पैदा हुये है वह देखने योग्य है। लेाग चलते में रपट रहे है। 12-12 फिट गहरे गड्डों में मय वाहन के गिर रहे है। मगर देखने सुनने वाला कोई नहीं।
ऐसा नहीं कि शहर की सुविधाओं से किसी को कोई सरोकार किसी को न हो, सुविधाओं के द्रष्टिगत ही क्षेत्रीय सांसद महोदय द्वारा केन्द्र से लगभग 54 करोड़ रुपया दिलाया गया। मगर राजनैतिक विदवेश ने इसे कहीं का न छोड़ा, कारण संवैधानिक बध्यताये सांसद केन्द्र से पैसा दिला सकता है मगर क्रियान्वयन तो राज्य सरकार को ही करना होता है अब्बल तो कई वर्षो तक यह योजना नगर पालिका में धक्के खाती रही। जहां करोड़ों रुपया झील संरक्षण के नाम बर्बाद कर दिया गया।
फिलहॉल यह योजना नगर पालिका द्वारा पी.एच.ई. को पूर्ण करने दे दी गई है। जिस पर तमाम हीला हबाली के बाद न जाने किससे तो डी.पी.आर. बनवाई गई। और न जाने क्यों ? कई भागों में सीवर लाइन को बांटा गया जिसमें एक मैन लाइन और दूसरे भाग में रायजिंग लाइनो को रखा गया है।
सूत्रों की माने तो 10 फीसदी राशि से मैन तो 90 फीसदी राशि से रायजिंग लाइने डालने का कार्य शुरु हुआ। चूंकि मैन लाइन की निविदा आये बगैर ही राइजिंग लाइनो का कार्य मनमाने ढंग से शहर की घनी बस्तियों में शुरु हो गया हालात ये है कि शहर की अधिकांश सड़के खुद मलबे, गड्डे के ढेर में तब्दील है।
न तो कार्य कर रही एजेन्सी के पास शहर वासियों या प्रशासन को बताने वर्क प्लान है न ही शहर के बीचों बीच वर्ष भर से चल रही खुदाई से सुरक्षा के कोई पु ता इन्तजाम है, न ही ट्राफिक कैसे चले, इसका कोई प्लान है। कार्यकत्र्ता एजेन्सी मनमाने ढंग से खुदाई में जुटी है। और जगह-जगह पाइपों का ढेर लगा सिन्ध परियोजना की तरह भुगतान ले रही है। भुगतान और मल्याकंन इन्जीनियर की इतनी जबरदस्त जबावदेही बनी है। कि कभी उसे श्योपुर तो कभी उसे गुना संभाग देखने की भी कमान मिली है।
बगैर तलाई के बनते चे बर और घटिया चीनी पाइप देखने की किसको पड़ी है अब तो चे बरों का आलम यह है कि सड़क लेवल से भी नीचे ढक्कन लगाये जा रहे है, कहीं ढक्कन टेड़े तो कहीं धसकते जा रहे है। घनी बस्तियों में भी 6 इन्च के चीनी पाइप डाले जा रहे है। इस अव्यवस्था और जनता के धन की लूट पर लगभग सभी जानकार चुप है सूत्रों की माने तो जिस डी.पी.आर. के सहारे घनी बस्ती वाला शहर खुद रहा है। वह डी.पी.आर. नई बसाहट के हिसाब से है।
जब तक नेशनल पार्क में फसी मैन लाइन नहीं डल सकेेगी तब तक रायजिंग लाइन का क्या काम है। पहले मैन लाइन डलती फिर रायजिंग लाइन डलती तब तो ठीक था। अगर रायजिंग का उपयोग हुआ तो बगैर मैन लाइन के सीवेज कहां जायेंगा ? आखिर ये सवाल निर्माण कराता एजेन्सियों को कब समझ में आयेगें या उसे कोई समझा पायेगा ? क्या अवैध कॉलोनियों को भी डी.पी.आर. में लिया गया है। जहां लाइन बिछाने का कार्य पूर्ण किया गया है। कई सवाल और समस्याये फिलहॉल इस शहर में है मगर दुर्भाग्य कि इक_ा हो चले झूठे समाज, जिसमें राजनीति प्रशासन, सरकार और चटखारे लेने वाली मीडिया भी न जाने क्यों सुन्दर शहर की बर्बादी पर चुप खड़ी है जहां उन्हें भी आज इन समस्याओं से दो-चार होना पढ़ रहा है, तो भविष्य क्या होगा, सभी को ग भीरता से समझने की जरुरत है। क्योंकि इस शहर में रहने वाले सभी लेागों का बर्बाद होता यह सुन्दर शहर है। जहां सभी को मिलकर रहना है। 
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