समीक्षाऐं सामने हो तो बेहतर, बाद में क्यों ?

व्ही.एस.भुल्ले। सार्वजनिक जीवन में जो बेवजह छीटा कसी का खेल विगत वर्षो में जो शुरु हुआ है वह बन्द होना चाहिए परिणाम कि स्व.नेहरु, लाल ब...

व्ही.एस.भुल्ले। सार्वजनिक जीवन में जो बेवजह छीटा कसी का खेल विगत वर्षो में जो शुरु हुआ है वह बन्द होना चाहिए परिणाम कि स्व.नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, स्व.इन्दिरा गांधी, राममनोहर लेाहिया, जयप्रकाश नारायण, राजीव गांधी और वर्तमान में अटल बिहारी वायपेयी, सोनिया गांधी, आडवाणी के बाद राजनीति में कोई ऐसा खास नाम नहीं जिनकी चर्चा देश की राजनीति में स्वयं के उल्लेखनीय योगदान के रुप में की जाती हो।

अतीत जैसा भी, जो भी रहा हो मगर राजनीति के क्षेत्र में इन नेताओं के द्वारा निर्वहन किये गये जीवन के कुछ अंशो को ले तो जहां नेहरु का अपना राष्ट्र प्रेम उनका समाजवाद, देश के विकास का नजरिया बताता है। कि वह एक सच्चे राजनेता के रुप में कितने सफल या असफल रहे। बच्चों के प्रति उनका अगाध स्नेह आज भी उनको चाचा नेहरु कहने पर मजबूर करता है। वहीं स्व. सरदार बल्लभ भाई पटेल का भी अखण्ड भारत के लिये किया गया कार्य आज लेागों की जुबान पर है।

जहां तक शहीद लाल बहादुर शास्त्री जी का सवाल है तो उनका समुचा जीवन प्रतांत किसी दृढ़ निश्चयी ईमानदार देश भक्त और किसी महान मार्गदर्शक से कम नहीं। जिसकी देश को आज स त जरुरत है। जिन्होंने देश को जय जवान, किसान किसान का नारा दिया। बचपन के अभाव, संघर्षो के बीच एक ईमानदार देश भक्त की उनकी जीवन गाथा शहीद होने तक बताती है कि आज के राजनैतिक परिवेश और देश के हालातो को सुधारने इनकी कितनी जरुरत है।

जिसमें वैचारिक तौर पर तो स्व. डॉ. राममनोहर लेाहिया, जयप्रकाश नारायण और शेष बचे उनके सच्चे अनुयायी जो आज भी देश भर में घूम आम गरीबों की खातिर धरना देने वाले रघु ठाकुर राजनैतिक तौर पर कार्य करते है। जिसमें देश की आवाम और समाजबाद के लिये स्व. लेाहिया और जयप्रकाश नारायण ने तो सारा जीवन ही हॉम कर दिया।

वहीं स्वर्गीय इन्दिरा जी ने एक शसक्त और निर्णायक नेता के कौशल के बल भारत को शक्ति शाली और अनुशासित राष्ट्र की पहचान देने का कार्य किया जिसके लिये उन्होंने एक नारा भी दिया दूर,दृष्टि,कड़ी मेहनत,पक्का इरादा, ही देश को महान बनाता है। रहा सवाल अटल, आडवाणी और स्व. राजमाता विजय राजे सिंधिया जी का तो ये सच है कि जनता पार्टी के अवसान से लेकर भाजपा के उदय तक जहां अटल, आडवाणी की जोड़ी सहित स्व. कुशाभाऊ ठाकरे की तिकड़ी राजनैतिक कौशल के बल का कार्य करती है। मगर इन्हें सीचने और पहचान देने का कार्य स्व. राजमाता सिंधिया ने जनता पार्टी के समय से लेकर भाजपा के स पूर्ण उदय तक तन-मन धन के साथ करती रही। दृढ़ निश्चयी, आम गरीब की खातिर स्व. डी.पी. मिश्रा मु यमंत्री को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा संगठन और सिद्धान्तो के लिये जेल में रह यह बताने वाली कि उनके जीवन में आम गरीब नागरिक और संगठन, सिद्धान्तो सहित धर्म की क्या अहमीयत होती है। उसके लिये उन्होंने अपने सिंधिया राज वंश के वैभव यहां तक कि अपने इकलौते पुत्र स्व. माधवराव सिंधिया से भी दूरी बना ली। समुचा जीवन उन्होंने एक द़ृढ़ निश्चयी तपस्वी की तरह रजनैतिक तौर पर जिया। यहां तक कि जब अयोध्या की घटना पर उठे सवालो पर लेाग मुंह छिपाते थे तब वह राजमाता सिंधिया ही थी जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपनी भावनाओं का इजहार किया था।

वहीं अटल जी ने भी एक राजनैतिक संत के रुप में अपना जीवन वेदाग जिया, सिद्धान्तो की राजनीति के सहारे भारत को महाशक्ति ही नहीं सड़को का देश भर में जाल बिछा और नदी जोड़ो की बात कर देश की राजनीति को नया आयाम दिया।

स्वर्गीय राजीव गांधी ने भी आम गरीब की भावनाओं को स मान जनक स्थान देने संविधान 73,74 वाँ संसोधन कर दिल्ली की सत्ता को नगरीय निकाय, पंचायती राज के माध्ययम से गली मोहल्ले, गांव, चौपाल तक पहुंचाने का कार्य किया, इतनी ही नहीं, देश के नौजवान, बच्चों, बच्चियों को सूचना, संचार, ऑटो मोबाइल्स, इलैक्ट्रॉनिक, शैक्षणिक, क्रान्ति के बल देश की राजनीति में सत्ता शक्ति का विकेन्द्रीय कर स्व. महात्मा गांधी के सपने को ही नहीं, आम नौजवान, बच्चों की भावनाओं को सुन्दर स्वरुप प्रदान कर उस नौजवान शहीद ने देश में सत्ता का विकेन्द्रीकरण और विकास की नई राजनीति का सूत्रपात किया।

वहीं आडवाणी जी ने भी देश भर की यात्राऐं कर भाजपा को मजबूती से खड़ा करने का जीवन पर्यन्त निशकलंक रह काम किया। इस बीच कई मर्तवा उन्हें उन दौरो से भी गुजरना पढ़ा जो एक राजनेता के लिये बहुत कठिन होते है। मगर उनके द्वारा सिद्धान्तय किया गया कार्य भाजपा जैसे वृहत संगठन के रुप में सामने है।

रहा सवाल श्रीमती सेानिया गांधी का तो भले ही वे किसी सत्ता के पद पर न रही हो मगर वह सत्ता समन्वमक व कॉग्रेस जैसे वृहत संगठन की अध्यक्ष अवश्य रही। वह भी इस कीमत पर जब वह अपने नन्हे बच्चों को ठीक से निहार भी नहीं पायी थी तब उन्होंने अपने ही घर अपनी सास और भारत जैसे शक्तिशाली राष्ट्र की तत्कालीन प्रधानमंत्री जिन्हें देश मां दुर्गा की उपाधी देते नहीं थकता था। जिनके रणकौशल से दुश्मन ही नहीं विश्व भी थर्राता था। गोलियाँ की आवाज के बीच गोलियो से भुनी उनकी लाश को देखा।

इसके पहले कि वह अपने बच्चों पर ममत्व लुटा उन्हें उनके पिता का पर्याप्त लाड़ दुलार दिला पाती। कि उस पिता को जिसने राजनीति का ककहरा तक नहीं पढ़ा था उसे स्वयं की मां की हत्या जो देश की एकता अखण्डता, व धर्म रक्षा की खातिर हुई, उसके चलते उसे रातो रात देश का प्रधानमंत्री बनना पढ़ा बल्कि उस भले इन्सान को भी कुछ वर्ष बाद ही बम से उड़ा हत्या कर दी गई। ऐसे में उस जीवट महिला का धर्म और कर्म देश की राजनीति के लिये काबिले गौर होना चाहिए। जो विदेश में जन्मी खुली हवा में स्वच्छन्द जीवन जीने वाली उस लड़की को याद करना चाहिए। जिसने किसी दूसरे मुल्क के नौजवान के साथ वैवाहिक जीवन जीने का निर्णय लिया हो। जिस देश की स यता, संस्कृति, संस्कार उस देश से जुदा हो जहां उसका जन्म हुआ हो।

मगर एक संस्कारिक देश व इस देश के सबसे सभ्रान्त संस्कारिक परिवार की बहुं व कॉग्रेस जैसे महान संगठन को बचाने कार्यकत्र्ताओं के आग्रह पर कमान स हालने वाली इस महिला ने आज तक न तो उस परिवार की प्रतिष्ठा, न ही भारतीय संस्कृति,संस्कार,सिद्धान्त को बहुं, माँ और संगठन की बतौर मुखिया प्रतिष्ठा पर धब्बा लगने दिया। रहा सवाल सत्ता का जब देशी विदेशी की बात चली तब भी 2 मर्तवा केन्द्र में कॉग्रेस नेतृत्व वाली सरकार बनने के बावजूद उन्होंने सत्ता का मोह नहीं किया अब्बल देश के सबसे योग्य, देश के गर्वनर, वित्तमंत्री अर्थशास्त्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाया। इस बीच नौजवान हुये उनके पुत्र राहुल गांधी को भी प्रधानमंत्री बनाने की मांगे भी होती रही। मगर इस महान महिला ने अपने पुत्र को भी मां की तरह समझाया और संगठन को भी मुखिया की तरह बताया कि यह राजनैतिक सिद्धान्तो के अनुकूल नहीं। शायद भारत जैसे महान राष्ट्र और कॉग्रेस जैसे महान संगठन की संस्कृति इसकी इजाजत नहीं देती। नही तो कौन रोक सकता था आज की राजनीति में स्वयं सोनिया या राहुल को प्रधानमंत्री बनने से भले ही छ: माह के लिये ही क्यों न बनते, जैसे स्व. चौ. चरण सिंह, देवे गौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल, स्व. चन्द्रशेखर रहे।

मगर सोनिया गांधी आज उम्र के उस पड़ाव पर है जहां कॉग्रेस संगठन कमोवेश खड़ा है मगर न तो सेानिया ने देश की बहुं, न ही राहुल की मां और न हीं कॉग्रेस जैसे वृहत संगठन के मुखिया बतौर अपनी संस्कृति,संस्कार,सिद्धान्तो से समझौता किया न ही अपनी जि मेदारियों से मुंह मोड़ा, भले संगठन, सत्ता के रुप में सैया पर हो। 


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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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समीक्षाऐं सामने हो तो बेहतर, बाद में क्यों ?
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