क्यों सच से मुंह छिपाना चाहती- कॉग्रेस ?

व्ही.एस.भुल्ले। कॉग्रेस की देश भर में हार के लिये न तो सोनिया न ही राहुल और न ही वे युवा तुर्क जि मेदार है जिन्होंने विगत चुनावों में स...

व्ही.एस.भुल्ले। कॉग्रेस की देश भर में हार के लिये न तो सोनिया न ही राहुल और न ही वे युवा तुर्क जि मेदार है जिन्होंने विगत चुनावों में सफेद झूठ, और सुनियोजित दुष्प्रचार के माध्ययम से, जनकाक्षांओं को सपने दिखाने वालो के साथ कड़ा संघर्ष किया। क्योंकि भारत में जनतंत्र है हर 5 वर्ष में जनता अपनी सुरक्षा और सेवा का अवसर किसी न किसी को देती। मगर 10 वर्ष बाद सं या बल आधार पर वह अवसर इस मर्तवा भाजपा को मिला है। वह सस मान स्वीकार होना चाहिए यहीं जनतंत्र है।


बल्कि हार का प्रमुख कारणों में से सबसे बड़ा कारण संचार क्रान्ति से देश में विस्फोट की तरह बड़ी जनाकांक्षाओ और सच को स्वीकारने में कोताही तथा कुछ संगठनों नेताओं के व्यक्तिगत महात्वकांक्षाओं, स्वार्थ और संवदेनहीन हो व्यवहारिक संवाद का न होना संगठनात्मक ढांचे में लचीलापन होना रहा। न तो जि मेदार नेताओंं में जबावदेही का भाव दिखा न ही सच बोलने का साहस, और सबसे दो कदम आगे वह समय जो अच्छे अच्छो को खुद के असल अक्स का एहसास कराने से नहीं चूकता इतिहास गवाह है।

सच ये है कि हो सकता है, कि कॉग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी और राहुल ने संचालन कत्र्ताओं को फ्री हेन्ड दे रखा हो।

सच ये है कि सत्ता के मद में चूर कुछ नेताओं की अव्यवहारिक अंहकार पूर्ण भाषा शैली और यू.पी.ए. सरकार के सहयोगी संगठनो ने कॉमन मिनीमम प्रोग्राम पर पूरी निष्ठा ईमानदारी से काम नहीं किया सच ये कि किसी भी सरकार का जो संवाद लेाकतंत्र की राजा जनता के साथ सरल सीधा व्यवहारिक और सांस्कारिक होना चाहिए। उसका विगत वर्षो से आभाव रहा।

सच यह है कि जब भी किसी युवा तुर्क ने आम जनकांक्षाओं अनुरुप जनता से संवाद स्थापित करने का प्रयास या सच बोलने का दुस्साहस किया विपक्ष का तो काम होता है। सत्ता पक्ष को कोसना मगर यहां तो जब तब अपनो ने ही किन्तु परन्तु लगा, पूरी ताकत से काम नहीं करने दिया।

कॉग्रेस के पास बहुमूल्य सेवा विकास उन्मुख सामान तो था मगर न तो दुकान ही थी और न ही बेहतर मार्केटिंग,यहां तक कि सरकार के काम बताने सैल्स मैनो की हालात ऐसी कि दुकान बढ़ा ब्लेकमेलरो से मिल जनता को उचित मूल्य के सामान को तरसाते रहे और अपना इकबाल संगठन ने मजबूत करते है। समुचे समय दुस्प्रचार के कुचक्र में उलझ कॉग्रेस संवदेनशीलता को छोड़ अहम मुद्दो से इतर बेमतलब के सवालो में उलझती रही। जो एक सुनियोजित संडय़ंत्र था। और वहीं क्रम आज भी कांग्रेस की संवाद शैली में स्पष्ट दिखाई देता है। जिसका लाभ आज भी उन्हीं दलो को मिल रहा है, जो कांग्रेस की नब्ज और जनता की नब्ज को समझ अपना कारवां बढ़ाने में लगे है।

बरना कॉग्रेस द्वारा की गई राष्ट्र सेवा, जन सेवा और उसके द्वारा किये गये कामों का तो अ बार है जिसके बल पर विश्व विरादरी में भारत पूरी मजबूती के साथ खड़ा है, मगर सच बोलने की फुरसत किसे।

अपने संगठन राष्ट्र के लिये सच्चे दिल से सेवा कर शहीद होने वालो के कामो की चर्चा क्यों नहीं ? सच तो यह है कि कॉग्रेस का तो सुनहरा इतिहास है, मगर जिनका कोई इतिहास नहीं वह महान हो लोगों को झूठा इतिहास बताने में लगे है। क्या कांग्रेस को पता नहीं कि जिस दिल्ली में वर्ष 2000 से पूर्व, दिल्ली घूमने के बाद सफेद रुमाल से मुंह पोछने पर रुमाल काला हो जाता था, और एक दिशा से दूसरी दिशा तक जाने से दिन भर लग जाता था। कभी कभी तो आम दुकान दार लाल बत्तियों पर लगने वाले जामो में फस देर रात या दूसरे दिन ही घर पहुंच पाता था।

अगर बात विकास की है तो जिस विकास का शंख फूंक आज जो लेाग जिनके आर्शीवाद से सत्ता में है, उन्हें भी मालूम होना चाहिए कि दिल्ली में मैट्रो रेल से लेकर प्लाई ऑव्हर ब्रिज, और सी.एन.जी. की शुरुआत ने दिल्ली का चेहरा ही बदल डाला। रहा सवाल अवैध गरीब बस्तियों, मंहगी बिजली, पेयजल का तो यह देन समाज में विस्फोट की तरह बढ़ती जनसं या व दैत्य की तरह पनपे भ्रष्टाचार की देन है।

रहा सवाल केन्द्र की यू.पी.ए. सरकार के मुखिया डॉ मनमोहन सिंह का तो निश्चित ही जो आकार उन्होंने देश की अर्थ व्यवस्था और ग्रामीण विकास, ग्रामीण रोजगार, मजदूरी को दिया उसका परिणाम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जहां लेागों की आय बढ़ी वहीं मजदूरों को रोजगार और उसकी मजदूरी की कीमत में सुधार भी हुआ। जो मजदूर कभी मालिको के सामने काम के लिये गिढ़ गिढ़ाते थे आज उनके सामने काम के लिये काम देने वाले गिढ़ गिढ़ाते है, मगर सरकार के कुछ नेता और सहयोगी संगठन जो घोटालो के कर्णधार रहे वहीं संगठन के स्वार्थी और महात्वकांक्षी नेताओं की सह पर हुये घोटालो ने एक ईमानदार प्रधानमंत्री की छवि तक को कलंकित किया।

सच ये है कि समाज के विभिन्न वर्गो के आम गरीब, मजदूर, किसान के हित में कांग्रेस नेताओं ने जब-जब जो-जो कहां, वह उन्होंने करके दिखाया। उन्हीं में से एक विकास के पुरोद्दा, कर्ण धार रहे स्व.राजीव गांधी थे। जिनके नेतृत्व वाली सरकार ने जो कहां उसे पूरा भी किया। उन्होंने लाख उपहासो व विपक्ष के व्यंग वाणो की परवाह किये बगैर दिल्ली में ही स्वीकारा कि हम दिल्ली से आम गांव गरीब को 100 रु भेजते है। मगर उस तक मात्र 15 पैसा ही पहुंच पाते है। इस सच पर भी विपक्ष ने स्वर्गीय राजीव गांधी जैसे युवा तुर्क और देश में विकास की क्रान्ति लाने वाले उस भोले भाले नेता का मजाक उड़ाया मीडिया में ाी उनके सच पर बड़ी टीका टिप्पणणियाँ हुई।

मगर स्वर्गीय राजीव गांधी ने गरीब के हक में होने वाली लूट को रोकने का रास्ता निकाला। तथा संविधान में 73 वाँ, 74 वाँ संसोधन का दिल्ली की सत्ता को महात्मा गांधी जी के सपने के अनुरुप उसे साकार कर दिल्ली की सत्ता को देश के अन्तिम छोर तक गांव-गली, मोहल्ला चौपाल तक पूर्ण अधिकार के साथ कानूनी तौर पर पहुंचाया। जिसे आज हम नगरीय निकाय और पंचायती राज कहते है।

परिणाम कि नगरीय निकाय, पंचायते आज खुद की सरकारे मय वित्तीय अधिकारो के साथ देश भर में चला रही है। जिन आम गरीब, मजदूर दबे कुचले वर्ग ने कभी सपने में भी न सोचा होगा चाहे वह महिला, पुरुष हो या फिर युवा फिर चाहे वह अनुसूचितजाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और आम गरीब मजदूर सभी को सत्ता सुख के साथ लेागों की सेवा करने का समान मौक मिला। देश में ऐसी सामाजिक, आर्थिक क्रान्ति जिसके परिणाम आज देश के सामने है।

इसके अलावा भी, शिक्षा, संचार और ऑटो मोबाइल्स के क्षेत्र में किये गये कार्य जिनके दम पर आज हम आधुनिक भारत की बात कर स पर्ण विकास की बात करते है। उसके शिल्पि स्व.राजीव गांधी थे। सच ये है कि जिस मान स मान स्वाभिमान की बात हम करते उसका उदाहरण स्व.इन्दिरा गांधी ने पूर्व में ही 1971 का युद्ध उसके बाद के सुधार, भले ही वह परिवार नियोजन रहा हो।

या धर्म निरपेक्ष और धर्म की रक्षा और उनकी पवित्रता बनाये रखने ऐतिहासिक निर्णय मगर न जाने क्यों कॉग्रेस महात्मा गांधी, नेहरु जी, स्व.इन्दिा , स्व. राजीव गांधी कीकुर्बानियों और उनके संस्कारो की चर्चा को छोड़ झूठ के तिलस्म पर व्यान बाजी करती रहती है।

अगर देश की जनता ने विपक्ष में बैठ, विपक्ष के प्रशिक्षण और सत्ता धारी दल पर नजर बनाये रखने और जर्जर हो चुके कॉग्रेस संगठन को खड़ा करने का काम सौंपा है, वह भी 10 साल तक सत्ता में रखने के बाद तो विपक्ष में बैठते ही इतनी हाय तौबा क्यों ?
यह लेाकतंत्र है और किसी ाी देश में लेाकतंत्र तभी सफल है जब लेागों की आस्था उसमें हो। और संगठनो का जनता में अगाद विश्वास ?

इसलिये बेहतर हो कि जनाकांक्षाओं, जनभावनाओं अनुरुप स्वाभिमान स मान के साथ राष्ट्र सेवा, जनसेवा के मुद्दों पर संवाद हो, और निचले स्थर तक संगठनात्मक ढांचे में सुधार हो। संवाद की भाषा शैली ऐसी हो, कि उसे आम नगारिक समझ सके। जो तार्किक ही नहीं आम लेागों के मुद्दों से जुड़ी हो। न कि जनभावनाओं के विरुद्ध।
रहा सवाल संगठन का तो जब तक संगठन में पूर्ण कालिक कार्यकत्र्ता नहीं होगें उनके बेहतर समन्वयक नहीं होगें, जो गांवो-गांवो, गली-मोहल्ले जा कांग्रेस विचार धारा का प्रचार कर उसके महान नेताओं का इतिहास लेागों तक नहीं पहुंचाते तब तक अधकचरे ज्ञान पर भाषण वीरों व्यान बाजी से कांग्रेस की लुटिया ऐसे ही डूबती रहेगी, और भाई लेाग की जमात नेतृत्व को कोस नकारेपन का सबूत देती रहेगी। क्योंकि भारत जैसे महान देश और देश की जनभावनाओं, जनाकांक्षाओं को दिल्ली में बैठ नहीं गांव-गली, मोहल्ले, चौपालो तक पहुंच अपनी उपस्थिति दर्ज करा समझा जा सकता है। 


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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: क्यों सच से मुंह छिपाना चाहती- कॉग्रेस ?
क्यों सच से मुंह छिपाना चाहती- कॉग्रेस ?
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