राहुल के सुशासन पर, धन्यवाद तो बनता है...

व्हीएस भुल्ले@तीरंदाज। मुई काठी टूटे हारी, जो हारे मगज के फलूदे पर हमें धन्यवाद भी नहीं मिलता है। संवाद, संपर्क तो दूर की कोणी, भाई लेाग उस्ताद इतने बड़े कि फॉर्मूला जो भी हो, पता ही नहीं चलता है कि वह हमारी सुन रहे है। या अपनी कह रहे है, सच वोल्यू तो भाया अब हारे को सन्तोष मिल रहा है। सुना है भैया कि बिग्रेड ने कॉग्रेस को फिर से पटरी पर लाने एक फॉरमूला इजात किया है जिसमें 50 फीसद आरक्षण के सहारे अल्पसंख्यक ओ.वी.सी., एस.सी.एस.टी. को मुख्यधारा में लौटने का रास्ता साफ किया है। जिसमें विचार धारा संगठन, स पर्क, राजनीति, रणनीति में बेहतर ताल मेल पर जोर दिया गया है।

भैया- अब सुशासन की शुरुआत केन्द्र की सरकार में हो या फिर कॉगे्रस जैसे महान संगठन में, कम से कम स्वागत योग्य तो होना ही चाहिए और विधा विशेषज्ञो के मामलो में भी, विश्व की महाशक्ति अमेरिका से सीख ले। उन विधा विशेषज्ञों को धन्यवाद ही नहीं वह काम भी मिलना चाहिए, जिससे वह कांग्रेस जैसे महान संगठन ही नहीं, अपने महान राष्ट्र के लिये बेहतर काम कर सके। कम से कम उस व्यक्ति से संवाद तो कर सके। जिसे वह अपने लीडर के रुप में देखना चाहते है। वह भी निस्वार्थ, केवल सत्य और सिद्धान्तो के लिये। वह यह देखना चाहते है कि एक नेक दिल इन्सान क्यों लीडर सिप की लाइन से बाहर नजर आता है। ये अलग बात है कि जहां सरकार में सुशासन की शुरुआत मोदी की है वहीं संगठनात्मक स्तर की शुरुआत राहुल की है, मगर भाया मने धन्यवाद नहीं मिला, कै वाक्य में ही विधा चोरो की जमात ल बी है या फिर सुशासन वालो के दरबार में ही अन्धी है।

भैये- चुप कर मुये घन्टे भर थारी राम कहानी मने मजबूरी में सुन रहा हूं। स्वर्गीय राजीव जी के 73 वे व 74 वे संविधान संसोधन से चुनी जाने वाली स्थानीय सरकारो के बनने की बेला पर मने भले ही न बोल रहा हूं। मगर मैं इस मौके पर इतना अवश्य बोलना चाहूं कि थारी बुद्धि भी सत्ता सुख की ओर स्वार्थ की खातिर चल पढ़ी है। बरना तुझे संगठन या सरकारों की सराहना या फिर बिन मांगे मशविरे की क्या पड़ी है।

भैया- बेड़ा गरग हो थारा जो हारे जैसे नेक दिल इन्सान पर थारी उंगली उठी है भाया मैं कै चाहुं सत्ता और सिंहासन क्योंकि हारे को तो हारी औकात पता कोणी सो कान खोल कर सुन ले, मने न चांहु धनकुबेर बनना अगर भगवान ऐसा कुछ मने बनाता तो मने स्वर्गीय धीरु भाई के यहां होता, राजनेता बनता तो किसी नेता के यहां हुआ होता, जब ईश्वर ने ही मुझे कर्मयोगी बना कर इस पृथ्वी पर भेजा है तो फिर शिकायत कैसी। भाया अगर तने सुडऩा चाहे तो सुन, हारे जैसा इन्सान खुद की हकीकत छिपा नहीं सकता। न ही ईश्चर द्वारा बताये गये रास्तों को पलट उसके आदेशों को टाल सकता। और न ही स्वार्थी दुनिया के काबिल स्वयं को बना सकता। सो मुझे ईश्चर की कृपा से हकीकत का भान है। कहते है एक इन्सान को जिन्दा रहने दो वक्त की रोटी, दो वस्त्र और 3 बाई 6 का स्थान लगता है। और वह भी ईश्वरीय कृपा से, महल कोठी, मकान, झोपड़ी, सड़क जो भी हो, हारे जैसे व्यक्ति को तो बस इतना ही सामान लगता है। न तो पैदा होने के साथ कोई ऐश्वर्य, धन दौलत और न ही भौतिक वस्तु लाता है अब्बल मरते वक्त भी आदमी कुछ साथ नहीं ले जा पाता है। बस यहीं जीवन का स पूर्ण सत्य है और सच भी, अगर यही सुशासन सरकार और थारे, भाई के संगठन में आने वाला है, तो हारे को हाथो हाथ बता, बरना हारे को बच्चो की तरह कक्षा 3 की हरपाल सिंह की कहानी मत सुना, जिसमें जीवन की 5 महत्वपूर्ण बातो का उल्लेख हुआ करता था।

भैये- तने तो बावला शै, आखिर तू सुशासन की शुरुआत पर ही क्यों भड़क रहा है, और हारे जैसे चिन्दी पन्ने वालो के बीच बड़े-बड़े मल्टीकलर अखबार, टी.व्ही. चैनलो की कारगुजारी देख उखड़ रहा है। ये सब बाते थारे जैसे अदने-से इन्सान के लिये ठीक नहीं।

भैया- मैं जाड़ू, थारी राम कहानी मगर थारी या हारी लेाग सुनते कहां ? कै करु इस कलमुई व्यवस्था का जिसमें जहां राजा रंक और रंक राजा हो रहा है।
स्वार्थो का ऐसा मकड़ जाल, जहां चापलूसो का ही ढंका जारे-शोर से बोल रहा है। विधा चेार भी ऐसे जिनकी बिना पर विश्व कोतवाल बन, अपराधियों का टापू, खुलेयाम सच झूठ के फैसले कर रहा है। सच वोल्यू तो भाया हारा राष्ट्र ऐसे कठिन दौर से गुजर रहा है, जिसकी हालात देख मने तो छाती कूटना आवें।
काश प्रभु की कृपा हारे जैसे उद्दण्ड दुस्साहसी के साथ सभी पर भी होती, तो सोने की चिडिय़ा कहलाने वाली हमारी वस्ती की पहचान भिखमग्गों की तरह न होती।

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