सामंती सियासत से सनाके में लेाकतंत्र: समझना होगा, सियासतदारों को देश का मर्म

व्ही.एस.भुल्ले। जिस लाइन पर आज तक देश चल और अब चल रहा है। उसे समझना हर देश वासी ही नहीं उन संस्थाओं, संगठनों को भी जरुरी है जिनके कन्धो...

व्ही.एस.भुल्ले। जिस लाइन पर आज तक देश चल और अब चल रहा है। उसे समझना हर देश वासी ही नहीं उन संस्थाओं, संगठनों को भी जरुरी है जिनके कन्धो पर देश और देश के महान लेाकतंत्र को जिन्दा रखने की जबावदेही है फिर चाहे वह राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक या फिर संवैधानिक संस्थाये, संगठन हो।

प्राय: देखने में आ रहा हैै कि हर क्षेत्र में सामंती साम्राज्यवादी सोच का विस्तार बड़ी ही तेजी से हो रहा है। जिसके परिणाम कुव्यवस्था के रुप में अब धीरे-धीरे देश के सामने आने लगे है। कहते है व्यवस्था जो भी हो उसमें न्याय एवं जनकल्याण का भाव तो उसे बेहतर व्यवस्था माना जाता है। फिर चाहे वह राजतंत्र हो या फिर लेाकतंत्र।

वैसे भी विश्व बिरादरी में राजतंत्र से अधिक लेाकतंत्र को सर्वोपरि इसलिये माना गया कि राजतंत्र में सामंती, साम्राज्यवादी प्रवृति के पनपने के अधिक मौके होते थे। जिससे इन्सान का जीवन कभी नरकीय या अन्यायी हो जाता था। जनकल्याण तो दूर की कोणी, इन्सान अपने ही घर असुरक्षित हो जाता था। जिससे न तो सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक संस्थाये ही अछूती रहती थी न ही वह भू-भाग जहां उस राष्ट्र, राज्य और उसके नागरिको को उसके दुष्परिणामो को भोगना पड़ता था जिनके उदाहरण इतिहासो में देखे जा सकते है।

प्राय: भले ही हम या हमारे जैसे कई राष्ट्र लेाकतांत्रिक व्यवस्था के पैरोकार हो, मगर लोकतंत्र में पनपती सामंती, साम्राज्यवादी प्रवृतियों ने हमें सनाके डाल रखा है।

जिनके अन्याय अत्याचारी से कई मर्तवा इन्सानियत तक तार-तार हुई है क्योंकि सामंती प्रवृति ही इन्सान कि वह स्थति होती है जो उसे स्वार्थी, अहंकारी निस्ठुर अन्यायी और साम्राज्यवादी बनाती है। जिसमें इन्सान के नाम इन्सानियत का कोई काम नहीं होता है। अब यहां यक्ष प्रश्र यह है कि हमारे महान लेाकतंत्र में हमारी जबावदेही संस्थाये, संगठन क्या कर रहे है, चाहे वह संवैधानिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक संस्थाये और संगठन हो ?

जहां तक संवैधनिक संस्थाओं का सवाल है तो हम विधायिका को ही ले तो जो भी सरकारे बनती है वह राज्य की हो या केन्द्र की अमूमन, सभी का अन्तिम लक्ष्य यह रहता है कैसे अधिक से अधिक समय सत्ता में रहा जाये, उसके पीछे सत्ताधारी दल, और सरकार का पूरा लावो लश्कर चन पड़ता है। क्या सही क्या गलत सब कुछ सत्ता में बने रहने की सनक में न्यौछावर हो जाता है। रहा सवाल हमारे न्याय के मन्दिरो का तो वहां भी स्थति भगवान जैसी ही है। जो न तो दिखते है न ही महसूस होते है। न्याय कब मिलेगा कोई गारन्टी नहीं जिस तरह भगवान के खिलाफ सोचना पाप है। उसी तरह न्याय के खिलाफ चिल्लाना अपराध है।

कार्यपालिका के हालात ऐसे कि वहीं चोर और वहीं साहूकार पकडऩे वाले भी उन्हीं के जमात के। एक हमारे लेाकतंत्र के स्त भ कि चर्चा न हो तो अधूरी ही है। जिसे लेाकतंत्र में चौथा स्त भ भी कहते है। उसकी हालत ऐसी कि कभी कभी वहीं न्यायालय, सरकार की स्थिति में नजर आती है तो कभी कभी स्वयं ही अत्याचारियो की भूमिका में दिख पुलिस के रुप में नजर आती है।

बची हमारी सामाजिक संस्थाये जो जाप्ते में है। वह आवंटन और ऑडिट में व्यस्थ है। अधिकांश माल कबाडऩे में जैसे तैसे शेष रही सामाजिक संस्थाये जो अब समाज संस्थाये बन अपनी-अपनी जातियो का झण्डा लिये अपनो के ही उत्थान में डटी नजर आती है।

वहीं धार्मिक संस्थाओं के धनी धोरी जाप्ते में भले ही सरकारे हो अलग से मंत्रालय हो। जो आज कल मलाईदार नहीं कह जाते, धर्म के नाम पुजारियो के बजीफे, शिक्षा के नाम मध्ययान, साइकल, डे्रस, किताब और वेतन तथा संस्कृति के नाम नाच गाने और नृत्य हो रहे है।

वहीं गैर जाप्ते वाली संस्थाओं में व्यापार चल रहे है, चाहे वह शिक्षा संस्थान, संस्कृति के नाम धारावाहिक फिल्म और धर्मो की आड़ में बड़े-बड़े स्कूल, आश्रम चल रहे हो, जिनमे से कुछ तो धर्म की आड़ में धन्धा चमकाने वाले सलाखों के पीछे पढ़े है।

रहा सवाल आर्थिक संस्थाओं का तो उनका आलम यह कि हर बड़ी मछली, छोटी को निगल बड़ी बनना चाहती है कोई किसी क्षेत्र में तो कोई किसी क्षेत्र में अपना-अपना लोहा मनवाना चाहती है। फिर चाहे देश में संचार खेल, खरीद कोयला घोटाले हो या फिर बैकिंग, बीमा और फर्टीलाइजर क्षेत्र के घोटाले जो अभी भी दवे पड़े है, देखा जाये तो हर क्षेत्र में सामंती, साम्राज्यवादी प्रवृतियों ने इन्सानियत का जमकर शोषण कर लूट का नंगा नाच किया है। महोदय अब अन्तिम छोर का व्यक्ति भी इन लुटेरो से नहीं बचा है चाहे वह कुकर मुत्तो के तरह पनपी चिटफण्ड क पनियों हो या सत्यम, सुन्दरम शारदा के घोटाले हो।

बेहतर हो कि हर क्षेत्र की समीक्षा हो और जल्द ही इन क्षेत्रों में तीव्र सुधार की शुरुआत कैसे हो इस पर विचार मंथन ही नहीं काम शुरु हो। अगर यहीं हाल कुछ और साल चला तो यह कुव्यवस्था न तो उन संवैधानिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक संस्थाओं संगठनो को सुरक्षित छोड़ेगी और न ही लेाकतंत्र में पनपती सामंती साम्राज्यवादी प्रवृति राष्ट्र को चैन से सोने देगी।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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