धूल के ढेर पर, मातम मनाते लोग, शहर शमशान तो शमशान चमन बन गया है

तीरंदाज@व्ही.एस.भुल्ले भैया- शहर की सरकार के मुखिया के चुनाव के वक्त तो शुभ-शुभ बोल तने ये क्या अर्र-बर्र बक रिया शै। कि शहर शमशान और ...

तीरंदाज@व्ही.एस.भुल्ले
भैया- शहर की सरकार के मुखिया के चुनाव के वक्त तो शुभ-शुभ बोल तने ये क्या अर्र-बर्र बक रिया शै। कि शहर शमशान और शमशान, चमन हो गया शै। कोला पड़े थारे मुंह में।
भैये- क्यों न बोल्यू ? क्या बचा है इस शहर में ? न तो मान, सम्मान, स्वाभिमान, न ही कोई संस्कार बचा है, हारे स्वर्ग से शहर में।

भाया विगत 40 वर्षो में सबसे सुन्दर सूव्यस्थित सुविधा युक्त स्वर्ग सा शहर आज धूल, गन्दगी का ढेर बन गया है जहां न तो साफ पेयजल, वो पानी के ताल, तलैया है, न ही खरंजा युक्त वर्षाती वो नालो और न ही साफ पानी से सराबोर तालाबों केे वो वेस्ट वीयर जिस शहर में 2 फुट खोदने पर गीली मिट्टी या पानी निकल आता था उस शहर मेें आज हजारों सैकड़ो खोदने बावजूद भी पानी नहीं निकल पाता है। क्या कोई बतायेगा कि विगत 30 वर्षो पूर्व घरों के अन्दर दो समय आने वाले नलो का पानी क्यों बन्द है ? सीवर, गन्दे पानी को शहर से बाहर ले जाने वाली सीवर लाइन का मुंह क्यों बन्द है ?

न तो सुन्दर बाग बगीचे ही बचे न ही सुन्दर चौराहे, वहीं शहर के मुखिया बनने गाड़ी भरे प्रत्याशी इस चुनाव में खड़े है।

थारे जैसे चिन्दी पन्ने वाले जनता को जाग्रत करने के फेर में जनसंसद बुला घटिया राजनीति के चलते और नोटो की खनक से थारे जैसे बड़े-बड़े खबरचियों के मुंह लेाकतंत्र की चुनावी बेला पर जनता को जाग्रत करने के बजाये बन्द पडें है। भाया मने तो शर्म आवे थारे जैसे चिन्दी पन्ने वाले ही नहीं बड़े-बड़े उन मल्टीकलर वालो पर जो बड़े-बड़े ढोंग कर मतदान अधिक से अधिक कराने का प्रचार कर लेाकतंत्र की हत्या कर उन स्वार्थी दलो और नेताओं के इसारे पर उनसे मिल अपना मुंह बन्द रखते है। आखिर कहां टूट गई वो कलम जो लेाकतंत्र की जनतंत्र की दुहाई के नाम अच्छे अच्छो की हालात खराब कर देते है। कहां सूख गई वो स्याई जिससे सुन्दर-सुन्दर मल्टी कलर छपते है। सवाल फिर वहीं भाया तने चिन्दी पन्ने वालो के कुनवे के ही कुछ लेागों ने न जाने क्यों ऐसा कुचक्र रचा है कि कई पाठको ने पढ़ा है कि जनसंसद में धमईया हुआ है। और आज तू जनजागरण, मतदाता जागरण के ईनाम बतौर लेाकतंत्र का माखौल उड़ा मजा लूटने वालो के सामने अपराधी बना खड़ा है।

भाया न तो इस शहर में आवारा पशुओं के कानी हाउस बचे, न ही शहर में 40 वर्ष पूर्व मौजूद सार्वजनिक शौचालय मूत्रालय, वाचनालय ही बचे। सेवाओं की हालत ऐसी कि बगैर पठानी बसूली के न तो नामान्तरण न ही नक्शा न ही गरीबों के राशन कार्ड बनते है।

आखिर कौन लोग है जो सेवा भावी संस्था में विगत 40 वर्षो से राजनीति कर रहे है। और शहर के मुखियाओं की कमाई को लूट मजे कर मुखियाओं को ही हर चुनावो में बदनाम कर रहे है।
बैसे भी हारे बुजुर्ग कह गये है, कि जिस घर में राजनीति हो उसका हाथो हाथ सत्यानाश सुनिश्चित है सो भाया थारे शहर की जो सुविधा, सुन्दरता और सेवाऐं थी उसका सत्यानाश हो, स्वर्ग सा थारा शहर शमशान बन गया है।

कै थारे को मालूम कोणी जब कई पीढिय़ों तक राजनीति करने देखने वाले पितामह से अर्जुन ने अन्तिम वक्त पूछा कि राजनीति का क्या सिद्धान्त होता है पितामह ने कहा स्वार्थ। सो भैये स्वार्थ परख राजनीति ने इस स्वर्ग से शहर का सत्यानाश कर दिया।

भैये- मगर हारे महान लोकतंत्र में ऐसा कैसे सम्भव है।
जिस शहर के मुखिया मेहनतकस, ईमानदार और कमाऊपूत हो, 18-18 घन्टे मेहनत करते हो, उस शहर का सत्यानाश कैसे हो सकता है ?
जिस शहर के मुखिया चुनावों में एक अदने से आदमियों को विगत 25 वर्षो से गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले पैदल घूम सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने रहे हो, जिनका राजनीति में उद़्ेश्य सिर्फ और सिर्फ क्षेत्र का विकास और जन सेवा हो बगैर किसी लेाभ लालच और स्वार्थ के क्या घटिया राजनीति चापलूस चाटूकार क्या उन्हें भी धूल चटा सकते जिस धूल को आज उनकी सबसे लेाकप्रिय जनता और उनके शुभचिन्तक नाक, मुंह दोनो जगह से फाक रहे है।
भैया- तने तो बावला शै, तू कै जाने घटिया स्वार्थ परख राजनीति के गुर, सच तो यह है कि यह कलयुग है और भीष्म पितामह के मार्गदर्शन अनुसार इसका सिद्धान्त केवल स्वार्थ ही हो सकता है। अगर चन्द स्वार्थी मिल, राजनैतिक रुप से मेहनत कश, कत्र्तव्य निष्ठ, ईमानदार, निस्वार्थ मुखियाओं सहित आम भोली भाली जनता को वर गला बफादारो के सर गद्दारो के हाथ कलम करवा रहे है तो इसमें हर्ज ही क्या ? गलती तो घर के मुखियाओं की है। जो चाटूकारो के बीच बफादारो गद्दारो में फर्क नहीं कर पा रहे। परिणाम कि शहर शमशान और लेाग बगावत पर उतारु है।
भैये- मने समझ लिया थारा इसारा, मौका मिला तो मुखियाओं और परिवार जनो को भी समझाऊंगा जनजागरण में जिन्दा कोमो का सहयोग मिला तो वर्षो से मलाई लूट मजा लेने वाले उन स्वार्थी लेागो को भी बताऊंगा। कि लेाकतंत्र और संसदीय पर पराओं का अर्थ क्या होता है? मगर पहले मने, हारे शहर को स्वार्थो से सनी राजनीति से अवश्य बचाऊंगा।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: धूल के ढेर पर, मातम मनाते लोग, शहर शमशान तो शमशान चमन बन गया है
धूल के ढेर पर, मातम मनाते लोग, शहर शमशान तो शमशान चमन बन गया है
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