कै हारी, थरे से फूटी है, जो मने, समझा रिया शै.......

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज . महिलाओं के वाले काम कर न सकी, वह सरकार निकम्बी है, जो सरकार निकम्बी है वह सरकार बदलनी है। बोल भैया कैसी रही।
भैये- चुनावी बेला पर, तने कै अर्र-बर्र बक रहा है कै थारे को मालूम कोणी म्हारे महान लोकतंत्र में नगर, शहर, महानगर, की सरकारें चुनने के लिये नगरीय निकायों का चुनाव हो रहा है।
भैया- वहीं तो, मैं भी बोल्यू भाया, महिलाओं के काम कर न सकी, वह सरकार निकम्बी है, जो सरकार निकम्बी है, वह सरकार बदलनी है।

भैये- म्हारे महान लेाकतंत्र में ऐसा क्या हुआ है? जो तू चुनाव की बैला पर म्हारे महान लेाकतंत्र में, म्हारे महान लोकतंत्र को चलाने वाले, महान राजनैतिक दलो के खिलाफ के पीछे चूल बांधकर पड़ा है।
भैया- म्हारी कै विशात, पीछे पडऩा तो दूर की कोणी मने तो म्हारी गरीबी ने इतना भी हक न छोड़ा जो थारे महान लोकतंत्र की महान लेाकतांत्रिक व्यवस्था में हारे जैसा गरीब भी चुनाव लड़ जाऊं। मैं ठहरा, गरीब गंबार मगर एक वोट का हकदार अध्यक्षी की रशीद कटाना तो दूर फिलहॉल फार्म भरते ही 15000 फीस के और करोड़ों का चुनावी होम कहां से लाऊं, वैसे भी कहते है, जनसेवा में तो दाल रोटी ही मिलती है, पऊआ रोटी थोड़े ही मिलती है।
भैये- तने तो बावला शै, कै थारे को मालूम कोणी आज हमारे कई शहरों में, शहरो की सरकारो चुनने की शैया सजी है और ऐसे में थारे जैसे मश ारे को, माता-बहिनो के कत्र्तव्यों को लेकर,  हारे महान राजनैतिक दलो पर मशखरी चढ़ी है।
भैया- मशखरी चढ़े म्हारे महान लेाकतंत्र के दुश्मनो पर, मने तो शहरों की चुनने वाली सरकारों की पूर्ण बेला पर केवल सच बोलना चाहूं, और हाथों हाथ इन महान दलो को खुलेयाम आयना दिखाना चाहुं। कै थारे को मालूम कोणी जो कार्य हारे घर की माता-बहिने हर रोज बगैर किसी सरकार में रहे अपने तीन कार्य अवश्य पूरा करती है। एक घर की साफ सफाई, दूसरा शुद्ध पेयजल, तीसरा शाम की दिया बत्ती। जो कार्य शहर की सरकारों में आज से 30 वर्ष पूर्व तक नियमित होता था। मगर थारे जैसे चिन्दी, पन्ने अखबार आड़ो द्वारा भी गला फाड़ चिल्लाने और जनता द्वारा चीथ पुकार मचाने के बावजूद भी नहीं होता। सड़क विहीन, अंधकार मय शहरोंं में अब न तो शुद्ध पेयजल, न ही साफ सफाई का कार्य ही होता, पर्यावरण ऐसा कि स्वस्थ व्यक्ति भी मरीज-सा नजर आये मगर इन सरकारों को कौन बताये कि हालात अब इन निकायों में हालात इतने बद से बदत्तर हो चुके है, और यह निकायें पालिका के नाम, जनता के धन के, लूट के अड्डे बन चुके है, जहां जनसेवा के नाम लोगों की मजबूरी का लाभ उठा, खुलेयाम लूटपाट का खेल चलता है, मगर अफसोस कि स्वसासी संस्थाओं किसी का जोर नहीं चलता है। फिर इन संस्थाओंं में सरकारे जिस भी दल की रही हो। कै भाया मने बतायेगा कि घर में आने वाला नल वर्षो से क्यों बन्द है ? शहर की बैवजह स्ट्रीट लाईट क्यों बन्द है ? क्यों शहर वासी शुद्ध पेयजल से महरुम हो, ऐसा पेयजल पीने पर मजबूर है जिसे जीव जन्तु भी न पिये। मगर मानव पी रहा है उस पर तू महान लेाकतंत्र और नगरीय निकाय चुनावों में बनने वाली सरकारों पर दम भर रहा है।
भैये- मने दम क्यों न भरुं 55 वर्ष देश पर शासन वालो को छोड़ दे, तो लगभग 15 वर्ष तक प्रदेश में शासन करने वालो पर तो दम भर सकता हूं। भले ही सुविधा शुल्क क्यों न हो, अधपैटा रह अपने अखबारों का तो पेट भरता हूँ।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा, मगर मने भी, बोल्यू, बरगद की तरह खड़ा सूख जाऊंगा मगर नगरीय निकाय चुनावों में तो मने झूठ नहीं बोल पाऊंगा। सो एक मर्तवा फिर सुन, महिलाओं के काम, जो कर न सकी, वह सरकार निक बी है, जो सरकार निक बी है वो सरकार बदलनी है। 
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