ये तो हद है बौद्धिक अय्यासी की

तीरंदाज ?
भैया- इन बौद्धिक चर्चा, परिचर्चाओं को सुन-सुन कर हारा मन तो छाती कूटना चावे। मगर कै करुं हारे कानो का जिनमें बगैर किसी टावर की आये दिन मुई चर्चाओं की तरंगे घनघनाती रहती है। नित नये दिन बगैर सर पैर के नये-नये मुद्दे फिर उन पर बौद्धिक जुगाली मगर जिन्दा कोम पर चर्चा करैया कोई नहीं।
अब तो हालात ये है, कि लेाकसभा, विधानसभाओं के चुनाव तो दूर अब तो नगर निगम, पंचायतो के चुनावों में भी अच्छे-अच्छे कद्वावरो की इज्जत दांव पर लग जाती है। कहने को हमारी व्यवस्था में लेाकतंात्रिक पर पराओं के चलते जबावदेही सामूहिक होती है। मगर हार जीत के गणित में यह ताना शाह हो जाती है। जब भी कोई चुनाव कहीं पर भी आता है, किसी न किसी नेता की इज्जत या तो स्वत: ही दांव पर लग जाती है या चर्चा के मूर्णधन्यों द्वारा किसी न किसी की इज्जत दांव पर चर्चाओं के दौरान लगा दी जाती है। मने तो शर्म आवे हारे कानो पर जो इस तरह की चर्चा परिचर्चाओं का श्रवण कर कनपटी के दोनो ओर शान से खड़े रहते है। अब तू ही बता मैं कै करुं?

भैये- तने तो बावला शै कै थारे को मालूम कोणी कि हारे महान देश के कुछ महान प्रदेशों में विधानसभा तो कुछ प्रदेशों में नगरीय निकाय और पंचायतो के चुनाव होने वाले है। सो मुंह दिखाई के लिये चर्चा, परिचर्चाओं का दौर चलना स्वभाविक है। और हार जीत का मैडल समय से पूर्व र्निधारण करना हम जैसे बौद्धिक अययासी की आदत है। और हो भी क्यों ? कहते है जिस राष्ट्र के लेाग स्वयं को राजनीति से अलग रखते है उस राज्य, देश में इस तरह की घटनाये स्वभाविक है।

भैया- तो क्या आजादी के 67 वर्ष बाद भी हारे मूल मुद्दे रोटी कपड़ा और मकान धरे के धरे रह जायेगें। शायद सच ही बोल्या काड़ू कि चर्चा, परिचर्चा मूल मुद्दो को छोड़ बौद्धिक अययासी ही होवे। बरना क्या बात है कि आज भी हारे जैसा गांव का गवई गवार हारी सत्ता 67 वर्ष तक रहने के बावजूद भी शुद्ध पेयजल, शिक्षा, सुरक्षा और रोटी-कपड़ा मकान को तरस रही है। वहीं हमारे द्वारा सत्ता में बैठाली गई सरकारे लाल कालिनो पर दमक रही है। आखिर और कब तक चलेगा लेाकतंत्र के नाम यह अघोषित राजतंत्र? जहां राजा तो भिखारी और सेवक दातारी बने है।

भैये- चुप कर मुये तुझे इस महान लेाकतंत्र ने राजा बन सेवा करने सरकार चुनने का अधिकार दिया है तेरे अधिकारो में खलल न पड़े इसलिये 3 घोषित और एक अघोषित स्त भ का सहारा दिया है,उस पर भी तू हाय-तौबा कर रहा है और हारे लेाकतंत्र की रक्षा में दिन-रात एक करने वाले एक दो तीन नहीं पूरे चारो स्त भो को कोस रहा है। शायद थारे को मालूम कोणी कि हारा लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लेाकतंत्र बन रहा है।

भैया- मै समझू थारे जैसे बौद्धिक अययासो को जिन्हें भी हम दीन-हीनो की चर्चा, परिचर्चा से ज्यादा उन गलीचो, महलो और लग्झरी कारो, जहाजो में घूम हाथ हिलाने वालो की खबरो में ज्यादा मजा आता है। कि वे क्या पहनेगें क्या खायेगें कैसे रहेगें और देश की जनता से क्या-क्या आव्हन और आशा रखेगें? किसकी सरकार बनेगी किसकी डूबेगी किसकी इज्जत दांव पर और किसकी इज्जत छांव पर होगी? मगर थारे पन्ने में हारे जैसे गांव के गवई गंवार की झोपड़ी, कीचड़, मच्छर, बीमारी, लुटते पिटते, इज्जत बचाते लेागों की तस्वीर न होगी? भले ही सड़क के फुटपाथ पर हारी काठी और कुत्ते की काठी एक साथ होगी मगर थारी चर्चा, परिचर्चा, खबर हारे पर नहीं बनेगी। भाया मैं तो बोल्यू मने तो लिखाकर लाया हूं और हारे महान लेाकतंत्र में हर चुनाव में बड़ा धोखा खाया हूं। इस बार तो मने भी भाग्य आजमाऊंगा कैसे भी हो पहले जमकर बापू की तस्वीर वाला आर्शीवाद ले फिर सत्ता की गलियों में वेहरुपिया बन जमकर धूम मचाऊंगा। क्योकि अपने 83वे जन्म दिन पर बाबू जी ने भी हारे से कहां है कि अब तो पैसा और राजनीति के बीच ही चोली दामन का साथ बचा है। सो चल गया तो जादू, चूक गया तो मौत, क पनी का प्रचार है। 
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1 comments:

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