जघन्य ही नहीं अक्षम्य अपराध होना चाहिए, मानव तस्करी ,समाज की चुप्पी सोच का विषय

व्ही.एस.भुल्ले। देखा जाये तो किसी भी अच्छाई बुराई की शुरुआत समाज से ही शुरु होती है। उसका स्वरुप पहचान जो भी हो मगर उसकी पहचान इन्सानिय...

व्ही.एस.भुल्ले। देखा जाये तो किसी भी अच्छाई बुराई की शुरुआत समाज से ही शुरु होती है। उसका स्वरुप पहचान जो भी हो मगर उसकी पहचान इन्सानियत के ही नाते होती है। जिसका प्रतिबिम्ब व्यवस्था, शासन, सरकारों और स्वयं समाज के अन्दर विभिन्न विद्याओं के रुप में देखने मिलता है।

ऐसे में अगर इन्सान और इन्सानियत की आड़ में कहीं जघन्य अपराध अत्याचार किसी भी इन्सान या जीव पर हो रहा है। तो यह इन्सानियत ही नहीं किसी भी सभ्य समाज के लिये खुली गाली है। जिसकी स्वीकार्यता भले ही स्वार्थ परख अंहकारी समाज में न हो मगर सत्य यही है।
भले ही स्वार्थवश इन्सान और समाज इस सच्चाई को खुले दिल से न स्वीकारे मगर मानव तस्करी इसी का सबसे बड़ा उदाहरण है।

जहां इन्सान हैवान बन इन्सानियत को बड़ी ही बेहरमी से रौंद जुल्म और अत्याचार कर रहा है। जहां शासन है, सरकारें है, इन्हें बनाने वाला वह समाज भी है और समाज में रहने वाले इन्सान भी, मगर फिर भी खुलेआम मानव तस्करी जैसे जघन्य, अक्षम्य अपराध समाज में व्यवस्था के बीच हो रहे है।

कहीं मजबूरी, तो कहीं धन लालची और स्वार्थियो की बाजीगरी जो उन नौनिहालों, इन्सानो को अपनी परम्पराओं की आड़ में हैवानियत का शिकार बनाने में लगे है। जिनका पुर्नजन्म में कोई अपराध हो तो हो मगर इस जन्म में तो नहीं, अर्थात भगवान का रुप माने जाने वाले वो अभागे बच्चे जिन्हें मानव तस्कर चन्द दौलत के चक्कर में उनका जीवन नरक बना देते है।

अब इसे इस महान समाज का सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य जिसके नौनिहाल जानवरों से गई गुजरी प्रताडऩा के चलते इस नरकीय जीवन को स्वीकार कर इसे अपना भाग्य समझ लेते है। बात यहीं पर खत्म नहीं होती। बात तो तब शुरु होती है जब पैसो के लालची नरपिचाश, पैसे के लिये पागल लोग अघोषित तौर पर व्यवस्था, शासन, सरकार में बैठे लेागों को खरीद, बेसहारा इन्सानियत का दाम चुका हैवानियत का नंगा नाच खुलेयाम करते है।

जिन्हें भारतीय समाज कन्या का ओहदा दे देवी स्वरुप पूजा जाता है उनके साथ ऐसा पैचासिक व्यवहार वह भी स य समाज शासन, सरकारो के रहते है। क्योंकि हम आज भी गुलाम कानूनो के शिकार है। जिससे समाज ही नहीं कानून केे पालनहार भी परेशान है। मगर मजबूरियों और स्वार्थ बस यह पैचासिक जघन्य अपराध इन्सानो के बीच खुलेयाम चल रहा है।
एक ऐसा जघन्य अपराध जिसे देख हैवानियत भी कांप जाये। मगर दुर्भाग्य कि कुछ ाी नहीं हो रहा है। गुम होती बच्चियाँ और बिलखते परिजन इसे समय की नियती मान चुप हो जाते है। लानत है ऐसे समाज, व्यवस्था, शासन, सरकारो पर जो प्रेम जाल में फंसा या बच्च्यिों को अपहरण कर गर्म गोस्त के धन्धे में पिचासिक अत्याचार कर धकेलने वालो को कड़ी से कड़ी सजा तो दूर की कोणी उनकी कालर तक नहीं पकड़ पाता है।

मगर दुर्भाग्य इन्सानियत का जो इन्सानियत की रक्षा करने वालो का जमीर भी न जाने क्यों मर जाता है। बरना क्या नहीं होता उन बच्चियों के साथ जिन्हें खिलौनो से खेलने की उम्र में उन नरपिचाशो से खेलने विवस कर दिया जाता है। जिनकी आत्मा मर चुकी होती है। जिनके लिये सजाये मौत भी कम है, जो हमारे कानूनो की किताबों में नहीं, बरना कानून तो ऐसा होना चाहिए जिसका नाम सुनते ही इन पिचासो की रुह कांप जाये। इतना ही नहीं उस कानून की हद में आते ही वह इन्सान खड़े पेड़ की तरह सूख जाये।

बरना यह तो.............बस एक नाम है इससे पहले भी कई ........... नाम रहे है। इतिहास बनता रहेगा और नर पिचाशो का धन्धा ऐसे ही फलता फूलता रहेगा। बहरहॉल लेखनी के शब्दो में इन्सानियत के नाते बारुद इतनी है कि यह सुन मुर्दे भी कर्ब से निकल आये मगर लगता नहीं कि जिन्दा मुर्दो पर इसका कोई असर हो पाये।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: जघन्य ही नहीं अक्षम्य अपराध होना चाहिए, मानव तस्करी ,समाज की चुप्पी सोच का विषय
जघन्य ही नहीं अक्षम्य अपराध होना चाहिए, मानव तस्करी ,समाज की चुप्पी सोच का विषय
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