सवाल गंभीर हो तो, गुरेज कैसा, फिलहाल देश गंभीर?

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह के सपने देश वासियो को दिखा, राजग सरकार सत्ता सिंहासन पर आरुढ़ है और लेागों की समस्याये जस की तस, ऐसे में अगर ग ...

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह के सपने देश वासियो को दिखा, राजग सरकार सत्ता सिंहासन पर आरुढ़ है और लेागों की समस्याये जस की तस, ऐसे में अगर ग भीर सवाल देश के सामने हो तो, गुरेज कैसा? क्योंकि देश वर्तमान हालातो को लेकर फिलहाल कॉफी गंभीर है।
देश के अन्दर राष्ट्रीय भावना, चरित्र, शिक्षा, रोजगार, प्राकृतिक संसाधनो का सदउपयोग और सुरक्षा के साथ ही चरमराता हमारा सामाजिक ताना-बाना, जिसने अच्छे अच्छे विचारक, बुद्धि जीवियो और व्यवस्था को पथ्य में डाला रखा है।

निश्चित ही देश की नई सरकार ने अगर देश वासियो से कोई वादे किये है। तो वह उन्हें पूरा भी करना चाहेगी। जिसकी शुरुआत वह देश के अन्दर किये जाने वाले सुधारो के साथ-साथ देश की जरुरतो को ध्यान में रखते हुये देश के बाहर भी पड़ोसियो से बेहतर स बन्ध कायम रख समुचे एशिया में अपने स बन्ध बड़ा, देश के लिये कुछ करना चाहती है।

जिसकी शुरुआत वह अपने भूटान, नेपाल और जापान के सफल दौरो के रुप में कर चुकी है। वहीं देश के अन्दर गुड गर्वनेन्स के लिये सीमित मंत्री मण्डल, समयबृद्ध योजनाओंं का क्रियान्वयन, तत्कालिक निर्णयों में तेजी, देश की नब्ज टटोलने व देश का हाल जानने शिक्षक दिवस पर प्रधानमंत्री की कक्षा ऐसी कई बाते है जिन पर देश का ग भीर होना स्वभाविक है।

मगर जिस तरह से देश की सबसे अहम पार्टी कॉग्रेस अपनी न समझी के चलते सत्ता गबाने केे बावजूद भी आज अपनी नादानी छोडऩे ग भीर हो, तैयार नहीं। और देश मौसन पर होने के बावजूद भी वह बचकाने व्यानो से बाज नहीं आ रही। यहीं बात भारतीय लेाकतंत्र के विपक्ष लिये बहुत ही खतरनाक है।

सत्ता का आना और जाना भले ही अलग विषय हो मगर न जाने क्यों कॉग्रेस यह स्वीकारने तैयार नहीं कि वह अब विपक्ष में है। अब उसे सवालो के जबाव नहीं, पूरी तैयारी के साथ संजीदा सवाल करने होगे, समय आने पर सरकार से सदन में और सड़क पर भी, ाले ही हाल में सदन के अन्दर सं या बल कम और संगठन का सैलाब सिकुड़ा हुआ हो मगर विपक्ष के नाते उचित समय पर संजीदा हो ग भीर सवाल तो करने ही होंगेें। मगर दुर्भाग्य कि हमारा विपक्ष अहम मुद्दों से इतर बेवजह के सवाल कर समय बर्बाद करने में लगा है।

अगर सवाल करना कॉग्रेस को इतना ही जरुरी है तो जब यू.पी.ए. सरकार पर आरोप लग रहे थे। और 60 वर्षो का हिसाब कॉग्रेस से वर्तमान सत्ता धारी दल मांग रहा था। तब पु ता जबाव दे तब आरोप लगाने वाले से ही सवाल क्यों नहीं हुये? कॉग्रेस के लिये यहीं यक्ष प्रश्र आज भी होना चाहिए क्योंकि कॉग्रेस ने जितना भी हो सकता था अपनी समर्थ अनुसार कुछ ज्यादा ही किया जिसे वह देश की जनता को बताने में असफल रही और बड़े बड़े नेता स्वार्थ बस चुप बैठे रहे।

तो फिर अब हाय तौबा क्यों? बेहतर हो कॉग्रेस संगठन स्वयं को संगठनात्मक तौर पर मजबूत कर अहम मुद्दों पर दिमाक लगाये और सवाल जबाव के बीच पूरी तैयारी से आये। क्योंकि देश की आवाम मौशन पर है। ऐसा नहीं कि देश की आवाम सिर्फ और सिर्फ सत्ता धारी दल को ही देखती, सुनती है वह विपक्ष को भी पूरी ग भीरता से देखती व संजीदा हो सुनती है, देश का इतिहास गवाह है।

एक समय था जब 1977 में देश ने विपक्ष को सुना, दूसरा वक्त था जब 1980 में स्व. इन्दिरा जी को भी विपक्ष में रहते सुना, स्व. वी.पी. सिंह से लेकर देश के विपक्ष में रहे अटल, आडवाणी को भी सुना, फिर श्रीमती सोनिया गांधी को भी विपक्ष में रहते देश ने सुना। 10 साल सत्ता में कॉग्रेस नेतृत्व वाली सरकार के रहते विपक्ष में भाजपा और मोदी को सुना। और जनसेवा के लिये मोदी को चुना। मगर कहते है तथ्यात्मक बात रखने और तर्क परख अपनी बात सुनाने का हुनर तो हो। देश हमारा पहले भी ग भीर जागरुक रहा है। और देश आज भी ग भीर है इसलिये बेहतर हो कि विपक्ष बचकाने सवालो से बच और कॉग्रेस विपक्ष की भूमिका में रह कुछ ग भीर सवाल तलाशे तब सत्ताधारी दल से सवाल जबाव करे तो हो सकता है इतिहास एक बार पुन: उसे मौका दे, सवालो के जबाव देने का।

मध्यप्रदेश में बदली खेती-किसानी की फ़िजा
भोपाल।  शनिवार, सितम्बर ६, २०१४ मध्यप्रदेश में एक दशक पहले खेती-किसानी के पुश्तैनी काम से मुँह मोड़ते चल जा रहे किसान राज्य सरकार की पुरजोर कोशिशों के चलते अब फिर से पूरे जोश के साथ इस काम में जुटते जा रहे हैं। खेती को मुनाफे का धंधा बनाने के लिये की गई दो-तरफा कोशिशों से यह मुमकिन हुआ है। जहाँ एक ओर किसानी की लागत में कमी लाई गई वहीं इससे आमदनी में कारगर इजाफा किया गया। जहाँ एक ओर किसान ने बीते कुछ वर्षों में नई-नई तकनीकों को अपनाना शुरू किया है, वहीं खेती से जुड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों को राज्य सरकार ने पूरी शिद्दत के साथ अंजाम दिया है। अपनी उपलब्धियों के बूते मध्यप्रदेश ने दशकों से खेती-बाड़ी में देश में सबसे आगे रहने वाले पंजाब और हरियाणा जैसे सूबों को पीछे छोड़ दिया है।

उत्पादन
नतीजतन मध्यप्रदेश कुल अनाज के मामले में देश में अव्वल हो गया है। वर्ष २००३-०४ में मध्यप्रदेश का कुल अनाज उत्पादन २ करोड़ २० लाख ८७ हजार टन था, जिसके साल २०१३-१४ में ३ करोड़ ८६ लाख टन से ज्यादा होने का अंदाज है। इसी तरह गेहूँ उत्पादन में उत्तरप्रदेश को पीछे छोड़ते हुए मध्यप्रदेश ने देश में दूसरा स्थान हासिल किया है। प्रदेश में वर्ष २००३-०४ में गेहूँ का उत्पादन ७३ लाख ६५ हजार टन था, जबकि कृषि विभाग के अनुमान के मुताबिक साल २०१३-१४ में यह करीब १७५ लाख टन होने जा रहा है।

उत्पादकता
उत्पादन ही नहीं उत्पादकता बढ़ाने में भी मध्यप्रदेश ने बड़ी कामयाबी हासिल की है। साल २००३-०४ में कुल अनाज उत्पादकता १,१७७ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, जो साल २०१३-१४ में १,६१४ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होने का अनुमान है। गेहूँ की उत्पादकता साल २००३-०४ में १,८७९ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी जो इस साल २,६०२ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होने का अनुमान है।

देश में पहला मुकाम
मध्यप्रदेश ने बीते कुछ वर्षों में ऊँची कृषि विकास दर हासिल कर देश में पहला मुकाम हासिल किया है। साल २०१२-१३ में प्रदेश की कृषि विकास दर २०.१६ और साल २०११-१२ में १९.८५ फीसदी रही। साल २०१३-१४ के अग्रिम अनुमान के अनुसार यह २४.९९ फीसदी है। एक बड़ी उपलब्धि है कि मध्यप्रदेश में ११वीं पंचवर्षीय योजना (२००७-११) में कृषि विकास दर का लक्ष्य २.५ फीसदी तय किया गया था। इसके बरक्स इस दौरान ९.०४ फीसदी विकास दर हासिल की गई। इसकी तुलना में देश में सकल कृषि विकास दर का लक्ष्य ४ फीसदी था, जबकि हासिल सिर्फ २.५ फीसदी की जा सकी। दलहन, तिलहन और चना उत्पादन में तो मध्यप्रदेश पहले से ही गुवा है। इन उपलब्धियों के चलते मध्यप्रदेश को दो साल से भारत सरकार द्वारा लगातार प्रतिष्ठित कृषि कर्मण अवार्ड से नवाजा जा रहा है। इतना ही नहीं बीते तीन साल में किसानी में बड़ी उपलब्धियों के चलते देश में हरित क्रांति के जनक कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में विशेषज्ञ समिति की अनुशंसा पर प्रदेश को सर्वश्रेष्ठ कृषि राज्य श्रेणी में एग्रीकल्चर लीडरशिप अवार्ड भी मिला है।

खास कोशिशें किसान पुत्र मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने पहले दिन से ही खेती को मुनाफे का धंधा बनाने के लिये कमर कसी हुई है। किसानों और किसानी की दिक्कतों से रू-ब-रू और उन्हें दूर करने में किसानों की सलाह लेने के लिये उन्होंने किसान महापंचायत बुलाई। पंचायत में किसानों ने खुलकर अपनी बात कही और मुख्यमंत्री ने एक के बाद एक उनकी सलाहों पर अमल शुरू कर दिया।

तकनीक
किसानों को बेहतर तकनीकों से वाकिफ करवाने के साथ-साथ उन्हें किसानी के अच्छे औजार भी मुहैया करवाये गये। प्रदेश के किसानों को नई तकनीक सीखने के लिये विदेशों में भी भेजा गया। प्रदेश में किसानों को महँगे कृषि यंत्रों का फायदा दिलाने के लिये कस्टम हायरिंग सेन्टर योजना शुरू की गई है। साथ ही कृषि यंत्रदूत योजना से भी किसानों को बेहतर तकनीक हासिल हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय संस्था नार्मन बोरलॉग, मेक्सिको के सहयोग से जबलपुर में स्थापित 'सिमिट' केन्द्र में मक्का पर अनुसंधान चल रहा है। जापान की संस्था 'जायका' प्रदेश के चुनिंदा जिलों में सोयाबीन पर अनुसंधान पर भागीदारी कर रही है। प्रदेश में विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है, जिसके साथ ही प्रदेश में अब कृषि के दो विश्वविद्यालय हो गये हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिये खासतौर पर योजनाएँ बनाकर उन्हें लागू किया गया। उवर्रक के अग्रिम भण्डारण की व्यवस्था की गई। उवर्रक सीधे आयात कर किसानों को उपलब्ध करवाये गये। खेती-बाड़ी से जुड़े क्षेत्रों के बीच बेहतर तालमेल के लिये कृषि केबिनेट बनाई गई जिसके फैसले केबिनेट के फैसले माने जाते हैं।


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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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Village Times: सवाल गंभीर हो तो, गुरेज कैसा, फिलहाल देश गंभीर?
सवाल गंभीर हो तो, गुरेज कैसा, फिलहाल देश गंभीर?
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