बच्चों को तो बख्शो भाई

व्ही.एस.भुल्ले। अगर देश का प्रधानमंत्री अपने देश के बच्चों अर्थात देश के भविष्य को संबोधित करना चाहता है तो इसमें हर्ज ही क्या? क्या देश का प्रधानमंत्री अपने देश के बच्चों को संबोधित नहीं कर सकता जो लोग बैमतलब विवाद खड़ा कर रहे है। हालात ये है कि केन्द्र सरकार के मंत्री को जबाव देना पड़ा कि बच्चों पर कोई दवाब नहीं जो सुनना चाहे वह सुने।

इससे बड़ा मजाक और क्या होगा हमारे महान लेाकतंत्र का ये सही है। कि कुछ व्यवहारिक मुश्किले हो सकती है। विद्यालयो और बच्चों के सामने मगर ऐसा नहीं कि उसका निदान न हो सके।

रहा सवाल प्रसारण समय सैकेण्ड हॉफ का तो सरकार को चाहिए कि वह बच्चों की परेशानी को देखते हुये उसमें आवश्यकता अनुसार संसोधन कर सकती हो तो करना चाहिए।
क्योंकि यह ऐतिहासिक समय है जो सीधे तौर पर कोई प्रधानमंत्री बच्चो को स बोधित करने जा रहा है। यह कार्य तो पहले ही शुरु हो जाना चाहिए था। मगर कहावत है देर आये दुरुस्त आये।

अगर वाकई में ही हमें हमारा भारत महान, शसक्त खुशहाल बनाना है तो इस तरह की परेशानियाँ तो उठाना ही पढ़ेंगी। वशर्ते इस तरह की शुरुआतों के परिणाम भी लेागों के सामने आये साथ ही ऐसे लेाग भी मुंह पर लगाम लगाये जो माल में घप सस्ती लेाकप्रियता के चलते हर किसी बात पर बगैर सोचे समझे बयान ठोकने में लग जाते है।

युवा, बुजुर्गेा का तो जैसा भविष्य बनना था सो बन गया, कम से कम बच्चों को तो व शो उनके आगे तो पूरा भविष्य कोरी किताब की तरह पढ़ा है। जिसमें वह अपने सपनो की उड़ान भर जीवन का ककेहेरा भर सके। वो भी हमारी महान स यता,संस्कृति, पर पराओं और संस्कारो की छांव में। मुझे यह दोहराना पुन: मेरी मजबूरी और उन बड़ बोलो से मेरी गुजारिस है। कि वर्तमान भले ही तु हारा हो जिसमें सत्ता, दौलत, सुरक्षा भी अकूत हों। मगर हम ऐसी व्यवस्था स्वयं व अपने भविष्यों अर्थात हमारे बच्चों का न छोड़े, जो वर्तमान उन्हें और उत्तरार्ध में हमें परेशानी का सबब बन मानव जीवन को ही नरक बना दे। क्योंकि हम सभी को इसी देश, इसी व्यवस्था और आज जो बच्चे है, कल वहीं इस देश के युवा होगें इन्हीं के साथ रहना है। बेहतर हो हम हमारा अंहकार भूल, हम महात्मा गांधी, विवेकानन्द या अन्य महापुरुषो की तरह सोचे जिन्होंने अपना समुचा जीवन इस देश के बच्चो और युवा तरुणायी को समर्पित कर दिया।


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