कॉग्रेस: कुर्बानियो से दुराग्रह

व्ही.एस.भुल्ले। सत्ता से सड़क पर आते ही, कांग्रेस मेें मौजूद काकस के पुर्त, प्याज की तरह उतरने लगे है। और जो बातें देश के राजनैतिक गलिय...

व्ही.एस.भुल्ले। सत्ता से सड़क पर आते ही, कांग्रेस मेें मौजूद काकस के पुर्त, प्याज की तरह उतरने लगे है। और जो बातें देश के राजनैतिक गलियारो में गूंज चटकारे लेने का विषय बनी हुई है। वह कांग्रेस के लिये बड़े ही चौकाने वाली हो सकती है। मगर यहां यक्ष प्रश्र यहीं है कि कॉग्रेंस जैसे कुर्बानियों वाले संगठन में ऐसा दुराग्रह क्यो?

कभी देश भर में सत्ता के माध्ययम से एक छत्र जनता की सेवा राज करने वाली कॉग्रेस 44 सीटो पर सिमट इस तरह से अघोषित तौर पर तार-तार हो बिखर अपने ही होनहार युवा नेतृत्व की मेहनत पर सवाल खड़े कर, शिकस्त की समीक्षा करना पड़ें तो इससे बड़ा दुराग्रह कुर्बानियों पर खड़े संगठन के साथ और क्या हो सकता है? फिलहॉल कॉग्रेस की दुर्गति को लेकर जो अपुष्ट कयास हो सकते है वह मात्र 3 ही हो सकते है उनमेंं पहला कॉग्रेस के अन्दर वह काकस जो जनाधार और अपने राजनैतिक रण कौशल के चलते येनकेन प्राकेरण कॉग्रेस के स्थापित सिद्धान्तो को तिलांजली दे, आलाकमान को गठबन्धन,बन्धन का रास्ता और सत्ता में बने रहने का गुर बता कॉग्रेस को कमजेार कर अपना रुतवा कॉग्रेस में बढ़ा अपने मंसूबे पूरे करता रहा। दूसरा काकस वह रहा है जो सत्ता की मलाई की खातिर स्वार्थ बस षडय़ंत्रकारियों के भय से ायभीत हो चुप रहा।

तीसरा काकस वह रहा जो आलाकमान की चापलूसी कर हर गलत सही निर्णय पर चुप रहने में ही अपना भला समझता रहा। जिसमें न तो मैदानी ताकत थी न ही जमीनी राजनैतिक समझ, सो जो काकस जमीनी था। वह राजनैतिक नफा नुकसान में माहिर था जिसने हर हॉल में अपनी भूमिका कॉग्रेस में सुरक्षित रख, कॉग्रेस को कमजेार कर, स्वयं की ताकत बढ़ा आलाकमान को अघोषित तौर पर ब्लैक मेल कर उस नौजबान के नेतृत्व को कांग्रेस में मजबूत नहीं होने दिया।

अब यहां सवाल यह उठता है, कि जब ाी उस नौजबान द्वारा उसकी समझ और प्राप्त अनुभव के आधार पर लिये गये गलत या सही निर्णय पर आखिर सबसे पहले नुक्ता चीनी करने वाले कौन लेाग थे। सच तो यह है, कि जैसा उसे सहयेागियों द्वारा राजनैतिक रुप से बताया, सिखाया, और अनुभव कराया उसने बैसा ही किया फिर दोष कैसा? उसी काकस ने कभी उस नौजबान नेतृत्व को शसक्त नहीं होने दिया। और उसके द्वारा समझ और अनुभव के आधार पर उठाये सही या गलत निर्णय पर नुक्ता चीनी की जिसमें उसका कोई दोष नहीं था।

यह सच है कि भारत जैसे विविधता वाले देश में राजनैतिक जड़े मजबूत करना उतना सरल नहीं वह भी बिना जमीनी स पर्क और सूझ-बूझ के। सो कॉग्रेस में मौजूद इन घाघो ने स्वयं की राजनैतिक महात्वकांक्षाओं और सत्ता में बने रहने के स्वार्थ के चलते न तो उस नौजबान को जमीन पर ही चलने दिया, न ही हाई प्रोफाईल नेता बतौर उस नौजबान को कार्यकत्र्ता बनने दिया। जब भी अपनी उम्र और तजुर्बे के चलते उसने कोई फैसला लेने का प्रयास किया। उस फैसले को भी इसी मण्डली द्वारा अपने रणनैतिक कौशल के चलते सबसे पहले बचकाना निर्णय करार दिया गया।

जबकि कहां जाता है, कि लेाकतंत्र में हर व्यक्ति को अपने विचार की अभिव्यक्ति करने का अधिकार है, अगर जब तब इस नौजबान ने अपने लेाकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर भी लिया तो हाय तौबा कैसी।

बहरहॉल जो भी हो अभी भी समय है, इस महान संगठन में से साफ सफाई और इसे शसक्त बनाने का, बेहतर हो कि आलाकमान उस निर्दोष नौजबान को कम से कम जमीनी हकीकत जानने राजनीति में फ्री हेन्ड दे। और स्वयं संगठन की कमान स हाल। इस बात की समीक्षा करे कि कैसे कैसे क्या-क्या हुआ और अब क्या होना चाहिए क्योंकि हमारा महान देश आज भी प्रतिभाओं और कॉग्रेस विचार धारा र ाने वाले नौजबानो से भरा पढ़ा है। जिन्हें इन्तजार है, साफ दिल इस नौजवान का जिसके साथ वह कॉग्रेस विचार धारा और कुर्बानियों पर खड़े संगठन के स मान की रक्षा करते हुये देश की सेवा कर सके। क्योंकि लेाकतंत्र मे सत्ता किसी भी एक दल या व्यक्ति के लिये चिरस्थाई नहीं होती, मतलब साफ है, जो आज सत्ता में है, उसे कल सत्ता से जाना है, और फिर किसी नई सरकार को सत्ता में आना है। क्योंकि हमारे महान लेाकतंत्र में पर परा रही है, देश की जनता हर उस दल या व्यक्ति को सत्ता तक अवश्य ले जाती है, जिनके मन,वचन और जहन में राष्ट्र तथा जन कल्याण हेतु कुछ करने की ललक होती है। और यहीं ललक उस नौजवान में आज भी झलकती है जिसे र्निअपराध होने के बावजूद भी राजनीति के घाघ राजनैतिक तौर पर अपराधी साबित करने पर तुले है। 

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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कॉग्रेस: कुर्बानियो से दुराग्रह
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