माइक वन टू, पीएलसी...? आदर्श जनसुनवाई की मिशाल बने- महेन्द्र सिंह सिकरवार

म.प्र. शिवपुरी। एक अर्से बाद सुनाई दी किसी पुलिस कप्तान की ऐसी दहाड़ माइक वन टू.पी.एल.सी...?  फिलहॉल मैं, यहां कोई कॉमेन्ट्री नहींं किसी सैट पर सुनी उस हकीकत को बता रहा हूं ,जिस पर जिले भर से आये आवदेक पुलिस अधीक्षक कार्यालय के एक हॉल में सस मान कुर्सियो पर विराज शिवपुरी पुलिस कप्तान महेन्द्र सिंह सिकरवार को अपनी समस्याये सुना रहे थे। उस हाल का उदघाटन कभी इस रेन्ज के .डी.आई. जी रहे। आज के डी.जी. म.प्र. रघुनन्दन दुबे ने किया था।

जो शिकायती आवेदन कभी लाख मशक्कत और घन्टो बाहर खड़े रह कर दिये जाते थे। उनमें से कई तो फाइलो में पढ़े पढ़े ही दम तोड़ जाते थे। या पुन: पुलिस कप्तान तक फिर से आ जाते थे। बैचारा प्रताडि़त व्यक्ति या तो हार थक कर घर बैठ जाता था या फिर मायूस हो चुपचाप रह जाता था।

मगर आज वर्षो ,महिनो,दिनो में न निवटने वाली शिकायते घन्टो में नहीं, जिस तरह मिन्टो में निवट रही थी। वह नजारा देखने लायक था। पुलिस कप्तान के सामने सस मान कुर्सी पर बैठा आवेदक खड़े होकर अपनी पीढ़ा पुलिस कप्तान को सुनाता बैसे ही पुलिस कप्तान का सैट घनघना जाता माइक वन टू थाना भैंती,क्या हुआ गुम सुदगी का आवेदक मेरे पास खड़ा है। श्रीमान यह प्रकरण थाना दिनारा से स बद्ध है। माइक वन टू दिनारा सुन रहे है न आप,राजर सर अगर मेरे यहां का होगा तो श्रीमान विधि स बत कार्यवाई की जायेगी।

बगैर किसी औपचारिकता के 2 बजे तक चली सुनवाई में पुलिस कप्तान का सैट लगातार घनघनाता रहा किसी को शाबासी तो किसी को वायरलैस सैट पर ही पुलिसिया समझाइस दी गई।

निश्चित ही आज की जनसुनवाई देखने लायक थी। बगैर किसी लागलपेट के काम करने वालो को उनके काम पर ईनाम, शाबासी और लेतलाली पर फटकार और सजा शायद सिकरवार की आदत में सुमार है जिस तरह वह काम में अलाली करने वालो को मिन्टो में इधर से उधर या लाइन पहुंचा देते है। यह बताता है कि वह आम आदमी के प्रति कितने संवदेन शील है। कभी कभी नहीं, अगर यूं कहें कि महिलाओं के प्रति होने वाले अपराध छेड़छाड़, अपहरण,या बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों पर इतने आक्रोशित हो जाते है, कि वह, यह भी भूल जाते है कि पास खड़ा उनका अधिकारी कर्मचारी कौन है, वह उसे भी डपटने या दण्ड देने से नहीं चूकते। शायद ये उनका महिला जाति के प्रति स मान और संवदेनशीलता ही है।
जो महिलाओं और बच्चियो से जुड़े मामलो पर अचानक भड़क जाते है,जिसकी एक मिशाल इस जनसुनवाई में भी देखने मिली।

काश अगर सभी अधिकारी इतने संवदेनशील हो समस्याओं का निपटारा सिकरवार की भांति करने लगे तो चरमराई व्यवस्था के बीच इससे बड़ी सेवा प्राडि़त जनता की दूसरी नहीं हो सकती। जिसमें उसे तत्काल राहत मिले क्योंकि जो संसाधन सरकार ने पुलिस कप्तान को दे रखे है। वह उन पर भी है जहां लेाग घन्टो इन्तजार के बाद मायूस लौटते है। 
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