सिन्ध का सच: ले डूबी श्रेय की सियासत, ठंडे वस्ते में करोड़ों की योजना

व्ही.एस.भुल्ले/म.प्र. शिवपुरी। धन्य है ये शहर शिवपुरी और इस शहर के वासी जो खुद के साथ हो रहे छलाके के बावजूद अपनी बर्बादी पर चुप है। वहीं शिवपुरी वासियों का कंण्ठ गीला करने तैयार हुई, सिन्ध जलावर्धन योजना 25 वर्षो की मशक्कत और लगभग 36 करोड़ फूकने के बाद ठन्डे वस्ते में जाती दिख रही है।
महान है वो नौकरशाह जो कहने को तो माधव राष्ट्रीय उद्यान का मु य संरक्षक है। मगर अपनी कत्र्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी की नजीर पेश कर देश के केन्द्रीय मंत्री म.प्र. के मु यमंत्री सहित प्रदेश सरकार के कई मंत्रियों को सत्ता में रहते छटी का दूध याद दिला दिया। हालात ये हुये कि केन्द्रीय मंत्री के दावे और मु यमंत्री के वादे एक अदने से अधिकारी के सामने दम तोड़ गये।

जिसमें शहर की 2 लाख से अधिक की आबादी की तो गन्दा पानी पीते पीते घिग्गी ही बन्द है। जो मूक दर्शक बन अपने भविष्यों के मुंह में मुसीका डाले चुप बैठे है।
बहरहाल बात उस गूंगे बेहरे पत्थरीले शहर की है कि पत्थरों का शहर है मगर सुनता बोलता नहीं कोई आखिर क्यों चुप है, वो वीर जो चुनावों में भोली भाली जनता की देहरी खूद खाते है?

रहा सवाल सिन्ध पेयजल की उत्पत्ति का तो 1988 का दौर था प्रदेश के मु यमंत्री स्वर्गीय अर्जुन सिंह और शिवपुरी से मंत्री दाऊ हनुमत सिंह शिवपुरी में दोनों नेता हुये कि माधव चौक पर सभा थी और युवक कॉग्रेसियों ने उन्हें स्वयं के खून से तोला था। तब मंत्री दाऊ हनुमत सिंह की मांग पर पहली मर्तवा साढ़े 22 करोड़ की येाजना की स्वीकृति गोरा टीला से लिफट के माध्ययम से पानी मुहैया कराने की बनी। उसी दौरान वन पर्यावरण की स्वीकृति के बिना मड़ीखेड़ा अब अटल सागर योजना धक्के खा रही थी। पानी की मड़ीखेड़ा में पर्याप्तता और दूरी कम होने कारण इस योजना की पुन: शुरुआत मड़ीखेड़ा से हुई। और इसकी लागत 62 करोड़ तक जा पहुंची जिसे यथक परिश्रम कर क्षेत्रीय विधायक श्रीमंत यसोधरा राजे ने तैयार कराया मगर वन पर्यावरण की स्वीकृति के चक्कर में यह अटकी रही। पुन: डूबी यह महत्वकांक्षी योजना की लागत 82 करोड़ के पार जा पहुंची। जिसे स्वीकृति दिलाने क्षेत्रीय विधायक एक मर्तवा म.प्र. शासन के तीन-तीन मंत्रियो के साथ टूरिष्ट विलेज लेकर आयी तब के मंत्री जयंत मलैया ने पत्रकारों के बीच साफ कहा कि इतना मंहगा पानी हम शहर वासियों को नहीं पिला सकते। मगर क्षेत्रीय विधायक ने हार नहीं मानी और मु यमंत्री से इस योजना के लिये 25 लाख रुपये दिला योजना को जीवित रखा इस बीच श्रीमंत ग्वालियर की सांसद बनी और क्षेत्रीय सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस योजना को वन पर्यावरण से स्वीकृति ही नहीं 52 करोड़ रुपये की राशि भी दिलाई और प्रायवेट पार्टरशिप योजना के तहत केन्द्र और नगर पालिका ठेकेदार के हिस्से से यह योजना शुरु हुई जिसमें 80 प्रतिशत राशि केन्द्र व 10 प्रतिशत नं. पा. तथा 10 प्रतिशत ठेकेदार द्वारा लगाना तय हुआ। जिस पर ठेकेदार द्वारा अनुबन्ध के आधार पर 20 प्रतिशत बैंक से उधार ले काम शुरु कर दिया। इससे पहले कि काम पूरा होता वन पर्यावरण के अड़ंगें के चलते रुक गई।

अब जबकि ठेकेदार लगभग 36 करोड़ का भुगतान ले चुका है। और एक वन विभाग का कत्र्तव्यनिष्ठ अधिकारी केन्द्रीय मंत्री,मु यमंत्री के आश्वासन वादो की धज्जियाँ उड़ा अब हाईकोर्ट के आदेश के भी विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रहा है। क्योंकि 470 डूठो पर उग आये झाड़ न कटने पाये।

भले ही शहर की 2 लाख से अधिक की आबादी जिसमें महिला,पुरुष,बच्चे जीव जन्तु गन्दे नाले गटर से वह जाधव साग होते हुये चाँदपाठा पहुंचने वाला पेयजल पी.पी. कर मर जाये या फिर जिन्दा रहने हजार डेढ़ हजार खर्च पानी की बोतल मंगाये। इसे कहते है कत्र्तव्यनिष्ठ और कत्र्तव्यनिष्ठा स भवत: भारत का ऐसा इतिहास पुरुष नौकरशाह म.प्र. ही नहीं देश में कोई दूसरा नहीं होगा। जिसे सलाम ही नहीं ऐसे युग पुरुष नौकरशाह को पुरुस्कार भी देना चाहिए।

देखा जाये तो जब भी परियोजना का प्रस्ताव बना होगा। राजस्व वन,और नगर पालिका की संयुक्त टीम ने सर्वे किया होगा 5 वर्ष लेट हो चुकी परियोजना के प्रस्ताव के वक्त जो पौधा टूट या पौधा रहा होगा वह झाड़ बन चुका होगा।
इतनी सी बात महानुभावों को समझ में नहीं आयी। शासन का क्या जनता के टेक्स का 36 करोड़ डुबा योजना हापनी भी नहीं भर पाई,कि आज चारो खाने चित पढ़ी है।

मगर दुर्भाग्य ऐसे इन्जीनियर और शहर के शुभचिन्तकों का जो बगैर किसी अड़ंगे के बगैर किसी कानून का उलंघन किये मात्र 3 महिने में सिन्ध का पानी 6 कि.मी. ल बी लाइन बिछा सिन्ध को शिवपुरी लाने का दावा करते है मगर ऐसे लेागों की सुनता कौन है। फिलहॉल तो श्रेय की सियासत में सिन्ध स्वाहा होती नजर आ रही है। 


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