मुट्ठी भर लोग, मोहताज देश..?

व्ही.एस.भुल्ले@तीरंदाज। 
भैया- मने तो मंहगाई,मोटी कमाई, ऊपर से, ऊपर वाले की हम मुफलिसों से बैहयायी। आखिर किस भरे में कूद,किसके दर धोकनी बन चुकी काठी की छाती कूट आऊं। मंहगाई तो मंहगाई अब मुफलिसी भी भारी पढ़ रही है। इन मुट्ठी भर म्हारे भाग्य विद्याताओं के चलते।
पहले रेल,डीजल,पैट्रोल और अब गैस सब कुछ भारी पढ़ रहा है। जिनको विपक्ष में बैठ अगले 5 वर्ष तक चुप रह, सरकार की परफॉरमेन्स पर नजर रख खबर हम दीन हीनों तक पहुंचाने का जि मा मिला था। उन्होंने भी जिम्मेदारी छोड़ नई सरकार के गठन के बाद से ही चीत पुकार मचा देश भर में कोहराम मचा रखा है। तो कुछ भाई लेागों के सार्गिदों ने तो, नये प्रधानमंत्री की जिन्दाबाद,मुर्दाबाद के बीच पुतलो को फूंकने का क्रम चला रखा है। आखिर कब होगी हमारे ही देश में हम मुफलिसों की चिन्ता? कौन करेगा इन मुठ्ठी भर लेागों के हाथ बैहिसाब लुटते देश वासियों की रक्षा? क्या इसी तरह चमक दमक के बीच देश में हम अध भूखों के कल्याण की योजनायें बनती रहेंगी। और जनता बगैर किसी गुनाह के सब कुछ होते हुये भी इसी तरह तडफ़ती रहेगी। आखिर किसी भी देश में क्या गरीब किसान,मजदूर होना कोई गुनाह है?
अब तू ही बता सच क्या है,बरना धोकनी बन चुकी हारी काठी मुझे नहीं लगता कि अब ज्यादा कुछ कर पायेगी? मगर कुछ दिन ऐसा ही और चला तो भाया मैं तो बौल्यू आने वाले भविष्य में ऐसे नीति निर्माताओं की कुडली इतिहास के गर्भ में भी नहीं मिल पायेगी।

भैये- सब्र रख और सैक्रूलिजम,और कृ नूलिजम के चक्कर में तू न पढ़। क्या तुझे थारे राम भक्तों पर भरोसा नहीं जो सत्ता के लिये विलाप करते लेाग को देख स्वयं का धैर्य खो रहा है? और अपनी ही सरकार के खिलाफ तावड़ तोड़ व्यंगों से मोर्चा खोल रहा है।

भैया- क्यों न बौल्यू ऐसे लेागों के खिलाफ, मोर्चा क्यों न खोलू उन सत्ता सीनों के खिलाफ जो राम नाम को बदनाम कर सत्ता सुख भोग रहे है? कभी हारे म.प्र. को मन्दिर मान, हम गरीब,मजदूर,किसानों को भगवान का दर्जा दे, भक्त होने का भ्रम रखते थे,तो कभी मामा बन भय,भूख,भ्रष्टाचार मिटाने की शुरुआत गंगा से लेकर गंगोत्री तक की सफाई करने की हुंकार भरते थे। ऊंचे-ऊंचे वातानुकूलित मंचो पर दहाड़ते हुये कहते थे, कि जब जनता को तकलीफ हो, तो मुखिया कैसे चैन से सो सकता है। कांटा जनता के पैर में लगे तो दर्द उनके दिल में होता है। मगर अब व्यापम में क्या हो रहा है? व्यापम तो भैया बानगी भर है। इस भ्रष्टाचार की वहती गंगोंत्री की, अगर इतिहास पलटा गया तो प्याजो की पुरतों की तरह भ्रष्टाचार का कुरु प चेहरा, म.प्र. मेें पर्यटन उद्योग भले ही न हो,मगर भ्रष्टाचार ही इतना बड़ा पर्यटन केन्द्र बन जायेगा कि लेाग दांतो तले उंगली दबाते रह जायेगें। और मैं तो बोल्यू भाया पर्यटक देश विदेश से ही नहीं,विश्व भर से म.प्र. देखने आयेगें। अब ऐसे में तने बोलने,और मोर्चा खोलनेे की बात कर रहा है,ऐसे में तू ही बतां कितना राजधर्म और नैतिकता का पालन हारे म.प्र. में हो रहा है। ौया मने सुना है, हारे महान महापुरुषों,नेताओं और बुजुर्गों से कि सर्वोच्च जीवन जीने के लिये सादा जीवन उच्च विचार का नारा चरितार्थ था। मगर पैसा, सत्ता, सुख, सुविधा की अन्धी दौड़ में भागती भीड़ ने तो उसका अर्थ ही पलट दिया। मने तो लागे अब नारा सादा जीवन उच्च विचार की जगह उच्च जीवन,नीच विचार होता जा रहा है। तभी तो कुछ लेाग बे दिशा हो, स यता,संस्कृति, संस्कारों को तिलांजली दे समाज में नई स यता,संस्कृति,संस्कारों को गढऩे का कार्य कर रहे है।

भैये- तने तो बावला शै ऐसा नहीं कि सब कुछ उलट पुलट चल रहा है। तने तो सत्ता से बाहर हुये लेागों के भड़काऊ विलाप पर वेवजह ही बद वहास और बेहाल हो रहा है। कै थारे को मालूम कोणी,कि सत्ता हासिल करने से लेकर सत्ता में स्वयं को किसी भी कीमत पर बनाये रखनेे का अदभुत प्रयोग हारे भारत में विगत कई दशकों से चल रहा है। जिसने आज हारे महान लेाकतंत्र का स्वरुप ही बदल उसे कुरुप बनाने का काम शुरु कर दिया है। भैये अंग्रेजो ने तो हमें गुलाम ही बना,हमें और हमारे देश को लूटा था मगर कभी उन्होंने भी हमें  प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं से तो मोहताज नहीं किया था। मगर दुर्भाग्य कि हमें हमारी प्रकृति प्रदत्त सुविधायें तो दूर की कोणी, अब हमें संविधान प्रदत्त हको और अपने मूल कत्र्तव्यों से हारे आजाद भारत में अपने ही लेागों के बीच मोहताज होना पड़ रहा है। वन पर्यावरण कानून के तमगे की आड़ में आये दिन हमें शुद्ध पेयजल,जंगल,जमीन से मोहताज होना पड़ रहा है। उस पर से अव्यवहारिक नीतियों के चलते। समान शिक्षा,रोजगार के अवसर,आर्थिक सहायता, सत्ता में समान भागीदारी और सुरक्षा सड़कों के मोहताज रहते हुये मुफलिसी भरा जीवन अपने ही देश में जीना पड़ रहा है। सुनते थे कभी बुजुर्गेा से की देश व देश वासियों की सुरक्षा हेतु पहले के जमाने में सेना होती थी। मगर आज सेना भी है,सैनिक दल है,पुलिस है, फिर भी देश केकई अभागे लेाग तो लेाग घर की चार दीवारी के अन्दर ही,लुट,कट,मर,इज्जत तक नहीं बचा पा रहे है।
नैतिक शिक्षा तो दूर अपनी स यता,संस्कृति,संस्कारो पर भी आंसू नहीं वहा पा रहे है। सो भैये समय की बलिहारी मान,और चुप हो जा, कम से कम राम भक्तों के कुनवे को छोड़ हो सके तो भगवान राम की तो बजा, जिन्होंने स्वयं ईश्वर होते हुये मनुष्य योनी में मर्यादाओं का पालन कर जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाये। जिन्होंंने तुझे इतना सुन्दर जीवन दें,तेरे साथ पूरा न्याय किया है। और स्वस्थ शरीर दें,तेरे साथ समान व्यवहार किया है।

भैया- मने समझ लिया थारा इसारा कि कलयुग चल रहा है। बढ़ते उसके प्रभाव से ही हारा दिल विचलित हो रहा है। शायद बाबा की बन्दर वाली कहावत सही है जो उसने जंगल के शेर और बन्दर की कहानी सुनाई थी बाबा कहते थे , कि जंगल के राजा शेर से अनुशासित,शक्तिशाली और संतुष्ट तथा प्राकृतिक न्याय प्रिय पृथ्वी पर दूसरा जीव नहीं है। जो अनुवानशिक गुण और अपने धर्म अनुसार भूख लगने पर अपने जीवोत्पार्जन हेतु ही हिंसा कर शिकार करता है। मगर वह उस धर्म और अपने कत्र्तव्य का पालन पूरे अनुशासनात्मक ढंग से शिकार के वक्त करता है जिसमें उसे भोजन तो मिले मगर भोजन बनने वाले जीव को अधिक कष्ट न मिले इसलिये शेर हमेशा अपने शिकार की गर्दन पर ही वार करता है,और एक झटके में उसका शिकार कर उसका अंत कर अपनी भूख मिटा जीवन निर्वहन करता है। जिसकी छत्र छाया में जंगल के सभी जीव प्रकृति की गोंद में स्वच्छंद विचरण करते है,और प्रकृति की रक्षा भी उसी शेर के संरक्षण में करते है। मगर जैसे ही जंगल मेंभी लेाकतंत्र आया जीवो में सर्वाधिक उस्ताज माने जाने वाले जीवों ने एकत्रित हो निर्णय लिया,कि शेर के अनुशासन से हम अपने विधवनसक गतिविधियो से वंचित है क्यों हम किसी विधवंसक प्रवृति वाले अनुवानसिक जीव को चुने उसमें सभी स्वार्थियों ने बन्दर का नाम सुझाया और जैसे ही जंगल में चुनाव हुये भोले भाले जंगली जीवों ने स्वार्थियों के भड़कावे में आ बन्दर को राजा चुन लिया। बैचारा शेर तो हार के बाद राजा का पद त्याग वीयावान जंगल जा बैठा मगर इसी बीच आजाद हुये स्वार्थियों जीवों के झुण्ड में खुशी की लहर दौड़ पड़ी और इसी खुशी जश्र को खूबशूरत बनाने एक तेन्दुये ने हिरण के मैमने का अपहरण कर लिया और जंगली कानून के तहत सभी मासाहारियों से मिल जारेदार दावत उड़ा डाली। उधर हैरान परेशान दुखित हिरण जैसे ही जंगल के नये राजा बन्दर के पास अपनी गुहार लेकर पहुंचा बन्दर राजा नदी किनारे आम के पेड़ पर बैठ गदराये आमो का मजा ले कभी नदी में डुबकी तो कभी आम के पेड़ पर उछल कूंद कर उसके फलों की बर्बादी में लगा था जैसे ही हिरण आवाज दी हुजूर दुहाई हो मेरे जिगर के टुकड़े, मेरी जान,मेरे नन्हें से मैमने को तेन्दुये से बचा लो बरना वो उसकी जान ले उसे मार डालेगा। इतना सुनते ही बन्दर बोला तू रुख मैं देखता हूं तेन्दुये को बस क्या था बन्दर ने उसी पेड़ पर अपने नेसर्गिक गुण अनुरुप पुन:उछल कूंद मचा दी कभी इस पेड़ पर कभी उस पेड़ पर कभी इस ढाली को तोड़ कभी उस ढाली को तोड़ तो कभी नदी में डुबकी लगा उछल कूंद मचा दी। जब कई घन्टों तक बन्दर का तमाशा देख हिरण ही नहीं उसके साथ आये खरगोश,लोमड़ी,अन्य जीवों ने नये राजा बन्दर से कहां कि हे राजन अब तो कई घन्टे बीत गये अब तक तो तेन्दुआ मेरे मैमने की जान ले उसे खा चुका होगा। और आप अभी भी यहीं पर उछल कूंद कर रहे हो। उस पर से जंगल का नया राजा बोला कि सुन भई हिरण जिस क्षण से तूने मुझे बताया हैउसी क्षण से मैं निरन्तर प्रयास ही नहीं कड़ी मेहनत कर रहा हूं,तेरे मैमने का जो भी हो,मेरी मेहनत में कोई कमी हो,तो बता?

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