बिखरती कॉग्रेस में बबाल, स्वयं राहुल को सम्हालनी होगी कमान

व्ही.एस. भुल्ले। कॉग्रेस की मुख्य लड़ाई आज जिस प्रमुख दल के साथ है वह दल अब कोई साधारण दल नहीं बचा जहां उसकी आज कई राज्यों में सरकारें है। तो आने वाले समय में कई जगह बनने वाली है वहीं केन्द्र में भी उसकी पूर्ण बहुमत वाली सरकार है। हार से बिलबिलाई कॉग्रेस में जहां ऊपर से लेकर नीचे तक बबाल कटा पढ़ा है।

ऐसे में कॉग्रेस आलाकमान की उम्र और उनकी मजबूरियों के मद्देनजर कॉग्रेस की कमान स्वयं राहुल को स हालना होगी। समझना होगा कि 100 वर्ष पुरानी कॉग्रेस आज किस मुहाने पर है अगर अब भी इसे न स हाला गये तो इसे बिखरते देर नहीं होगी। क्योंकि जो हालात दिल्ली ,उ.प्र., बिहार, म.प्र., राजस्थान के बाद हालियाँ तौर असम, हरियाणा, ज मू काश्मीर और महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में उपजे है। कि कॉग्रेस के ही नेता अपने नेताओं के खिलाफ खुलेयाम बगावत पर उतारु है। और देश भर में कॉग्रेस के सभी संगठन निस्तानाबूत ऐसे में बड़ी ही समझदारी भरे निर्णायक निर्णयों की जरुरत है। जो कॉग्रेस नेता ही नहीं शेष बचे कार्यकत्र्ताओं को स्पष्ट संदेश दे सके वह चाहे वह कॉग्रेस सेवादल, युवक कॉग्रेस, एन.एस.यू.आई. हो या फिर मृत पढ़े अन्य कॉग्रेसी संगठन।

ये अलग बात है कि आलाकमान और राहुल की संगठनात्मक गति के बीच सुरक्षा का बिन्दु सबसे बड़ी बाधा और स्वार्थी सत्ता लोलुप सलाहकार रास्ते के रोड़ा हो जिसके चलते आज कॉग्रेस जैसे महान संगठन जिसे स्वर्गीय, जवाहर लाल नेहरु शास्त्री जी, इन्दिरा जी, राजीव जी ने अपने खून पसीने से सीचा तथा जिस कॉग्रेस की खातिर अपने सिद्धान्त और विचारों पर चल स्वयं स्वर्गीय राजीव गांधी ने गठबन्धन सरकारों व राजनीति से दूर रहने तोड़ फोड़ की राजनीति को दरकिनार कर विपक्ष में बैठना उचित समझा और सत्ता को त्याग दिया।

उसी गठबन्धन राजनीति के पक्षधूर सत्ता लेालुप कॉग्रेसियों ने कॉग्रेस जैसे महान संगठन का 20 वर्षो में बैड़ागरग कर दिया। आज जब कॉग्रेस के सितारे गर्दिश में है और अपने खून पसीने से सीचने वाले मझधार में तब कॉग्रेस नेतृत्व या राहुल पर अनौपचारिक निशाना साध कॉग्रेस से पलड़ा झाडऩे या फिर सत्ता के लिये कॉग्रेस और राहुल,सोनिया को चलाने वाले अब चुप क्यों है?

मूल कारण एक वो कॉग्रेसी जो कॉग्रेस को कॉग्रेस की तरह चलाना चाहते है दूसरे वो जो येन केन प्राकेण सत्ता के नजदीक रहना चाहते है। तीसरे वो जो राहुल की आड़ में बुजुर्ग और सच्चे कॉग्रेसियों को दरकिनार कर कॉग्रेस में अपना बर्चस्व चाहते है। इन तीन धड़ों की लड़ाई में कई राज्य तो राज्य केन्द्र से भी कॉग्रेस की सरकार जाती रही। और अब बारी संगठन तक आ पहुंची। जिसमें फिलहॉल बबाल कटा पढ़ा है। ऐसे कॉग्रेस के पास दो ही रास्ते है या तो आलाकमान फिलहॉल की स्थति से स्वयं को दूर कर ले या फिर स्वर्गीय इन्दिरा,राजीव की तरह अकेला चल निकला की राजनीति पर चल निकले।

और मुद्दों के आधार पर संगठनात्मक ढांचे को बढ़ाते हुये जमीनी जंग छेड़ दे उस दल के खिलाफ जिसने अपने बेहतर प्रबन्धन के सहारे देश के गरीबों को 1977 की तरह बरगला सत्ता हासिल की है। और गरीबों के नाम उद्योगपतियों जमाखोरों की चल निकली है।

मगर, यह तभी स भव है जब स्वयं सोनिया या राहुल सलाह करो से सलाह तो ले मगर निर्णय जमीनी हकीकत पहचानने के बाद क्योंकि देश में आज भी हजारों सेकड़ों कॉगे्रस समर्पित युवा,नेता है जो न तो कभी सोनिया न ही राहुल से मिलना तो दूर अपनी बात तक नहीं पहुंचा पाते है। और यह तभी स भव है जब सेानिया जी या राहुल देश भर में दौरे करे। मीडिया कर्मियों से भी खुले दिमाक से मिले और सुने, भले ही कुछ न बोले साथ ही कार्यकत्र्ताओं नेताओं से भी मिले। बगैर किसी क्षेत्रीय राजनेता के हस्तक्षेप के। जिससे लेाग खुलकर मिल सके। जो लेाग यह कहते है कि राहुल 10 वर्ष से देश के दौरे कर रहे है। मगर वह कोई चमत्कार नहीं कर सके ऐसे लेाग झूठ बोलते है। क्योंकि राहुल जहां गये या तो कार्यक्रम इतना व्यवस्थ रखा गया। और कोई न कोई क्षेत्रीय नेता हमेशा राहुल के साथ लटका रहा रही सही कसर उनकी सुरक्षा कड़ी रखने वालो ने कर दी। ऐसे में चमत्कार कैसे होगा।

ज्ञात हो जब स्वर्गीय राजीव जी राजनीति में आये तो उन्होंने भी देश भर की यात्राये की और बतौर युवक कॉग्रेंस नेता,वे लेागों के बीच मिलते भी थे लेागों को सुनते भी और साथ भोजन भी करते थे। उस समय भी क्षेत्रीय नेता साथ होते थे। मगर वह उसके बावजूद भी लेागों को सुनते थे। अगर राहुल भी स्व.राजीव जी तरह एक नई शुरुआत करे। और श्रीमती सोनिया जी अपने अनुभवों के आधार पर निर्णायक निर्णय ले तो कोई कारण नहीं जो कॉग्रेस जैसे महान संगठन को पुर्नजीवित कर शसक्त न बनाया जा सके। ऐसे जरुरत है स्वविवेक और सैद्धान्तिक आधार पर संगठन खड़ा करने की। शुरुआत हुई तो हजारो,लाखों लेागों का सैलाब आज तैयार है कॉग्रेस धारा में बहने को मगर सत्ता लोलुप चापलूस, चाटूकारों के अवरोध तो आलाकमान को ही हटाने होगें।

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