राहुल पर सवालकर्ता, स्वयं की गिरेबा में झांके, क्या स्वार्थो ने, नहीं बोलने दिया सच?

व्ही.एस.भुल्ले। कांग्रेस के सत्ता से सड़क तक पहुंचने के बाद राहुल पर सवाल खड़े करने वालो के सामने सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि जिस सच को वह सड़क पर खड़े हो या पत्रचार के माध्ययम से खुलासा कर रहे है।


उस सच को सत्ता में रहते क्यों नहीं बोला? जबकि ढेरो बांधे कांग्रेसी चिल्ला चिल्ला कर कलफते रहे मगर तब एक न बोला आज जब कांग्रेस सत्ता से बाहर विपक्ष के नेता तक के ओहदे को हासिल करने में अक्षम साबित हो रही तब कॉग्रेस के युवा नेता पर कीचड़ उछालना कि उसेे तजुर्बा नहीं।

यक्ष प्रश्न यहां यह है कि पहले कॉग्रेस आई या फिर राहुल। पहले से मौजूद गाड़ी भरे तजुर्बेदार नेता कॉग्रेस को चलाते रहे या राहुल?

क्या राहुल पर सवाल खड़े करने वाले बतायेगें कि स्व.नरसिंह राव से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार तथा अन्य प्रदेशों की कांग्रेस सरकारो में मंत्री, मु यमंत्री रह 10-10 वर्ष तक सत्ता भोगने वाले सत्ता सुख उठाते रहे या फिर राहुल उन सरकारों में मंत्री, मु यमंत्री रह सत्ता सुख राहुल भोगते रहे, या फिर स्वार्थो में सने कुछ स्वार्थी सत्ता का लुफत उठाते रहे। यह उत्तर स्वयं उन कॉग्रेसियों को सोचना होगा। जो आज सवाल खड़े करने से नहीं चूकते।
एक नौजबान नेता जिसे चुनाव प्रचारों में दौड़ा दौड़ा कर 10 साल तक सत्ता सुख उठाने वाले नेता और वह सत्यधारी हालिया हार के बाद हुई दिल्ली की समीक्षा बैठक में चुप बैठ हार पर सवाल दागने के बजाये क्यों तालियाँ पीटते रहे?

क्यों नहीं खुलकर एक संगठन के ऊर्जावान युवा नेता के साथ, एक साथ खड़े हो यह बताने में यह सफल हुये कि भारत मेें लेाकतंत्र है, अगर 10 साल के शासन के बाद जनता ने हमें विपक्ष में बैठने की जबावदेही दी है। तो हमें विपक्ष में बैठ आगे की रणनीति आपके नेतृत्व में तैयार करनी चाहिए जिन निर्णयों को लेकर आज हार का थीगरा फूट रहा उन्हीं पर हमें संगठनात्मक ढांचे को रुट लेवल तक ले जाकर 5 वर्षो तक जनता के बीच संघर्ष करना चाहिए। जो आपने किसानो की भूमि, सुचिता और संस्कारिक राजनीति के लिये अपराधियों से भरी राजनीति के विरुद्ध शंखनाद किया था और जिस सूचना, शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, खादय सुरक्षा के कानून बनवाये उनका प्रचार करना चाहिए।

यह एक कटु सत्य है,कि किसी भी लेाकतांत्रिक देश में हमेशा एक ही दल सत्ता में बना रहे यह स भव नहीं। कभी न कभी तो सत्ता से बाहर होना पढ़ता है। और पुन: सत्ता में आने संघर्ष भी करना पड़ता है। यह किसी राजनैतिक दल का मूलदायित्व भी होता है, संगठन के प्रति, जिससे सत्ता हासिल होती है। अगर ऐसे में 10 वर्ष तक लगातार सत्ता में रहने के पश्चात कॉग्रेस सत्ता से बाहर है तो कौन-सा पहाड़ टूट पढ़ा, जो लेागों ने उस नेता में कमियाँ ढूढऩा शुरु कर दी जिसकी बिना पर वह 10 वर्ष तक सत्ता भोगते रहे।
बेहतर होता कॉग्रेसी सड़क का बिलाप छोड़, देश की जनता ने जो उन्हें जि मेदारी सौंपी थी उसके कत्र्तव्य निर्वहन में जुट जाते। और जमीनी स्तर तक संगठन पर पकड़ बना मौजूद सरकार की जन विरोधी नीतियों पर सवाल उठाते न कि राहुल पर ही सवाल खड़े कर स्वयं की जग हसाई कराते।

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