बर्बादी के कागार पर मेहनतकश

कभी जल, जंगल, जमीन के सहारे जीवन बसर कर अपना जीवन सबसे सीधी साधी मेहनत कस कौम दुव्र्यवस्था के चलते आजाद भारत में इस तरह बर्बाद होगी किसी...

कभी जल, जंगल, जमीन के सहारे जीवन बसर कर अपना जीवन सबसे सीधी साधी मेहनत कस कौम दुव्र्यवस्था के चलते आजाद भारत में इस तरह बर्बाद होगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा।

मगर म.प्र. के शिवपुरी जिले की हकीकत यही है हालात ये है कि बर्बादी के कागार पर खड़ी ये कौम अब खाना बदौसो की भांति ही नहीं,बड़े पैमाने पर बर्बाद हो रही है। जिसका मूल कारण इनका भोलापन और अज्ञानता है अब इनकी मजबूरी है,जो यह कौम अपनी उजड़ती संस्कृति को नंगी आंखों से देखने पर मजबूर है इस कौम की मजबूरियों के चलते भले ही फिलहाल यह चुप है। मगर इनकी कद काठी आंखे बताती है कि शिवपुरी जिले की शहरिया कौम संकट में है।

कभी जंगलों में प्रकृति की गोद में अनुशासित रहने वाली यह कौम प्रकृति आधारित थी। और आजादी से पूर्व अपने सीमित संसाधनों के बीच खुशहाल थी। मगर जब से इनके विकास के लिये व्यवस्था का हस्तक्षेप मदद बतैार इनके जीवन में बढ़ा तभी से इस कौम पर मुसीबतों का पहाड़ जाने अनजाने में टूट पढ़ा।

इस कौम का एक पहलू यह भी है कि इनके बेहतर जीवन के लिये शासकीय मदद की शुरुआत करने वाली सरकारें और दलो के लिये कभी उनका यह कार्य इन्सानियत के लिये सेवा रही होगी। जिसके नाम पर विगत 65 वर्षो में अरबों खरबों रुपया फूक दिया गया। जिसका परिणाम यह हुआ कि इनके जीवन स्तर में कुछ तो सुधार हुआ मगर बहुत कुछ नहीं।

देखा जाये तो मदद की मुरीद बनती जा रही यह कौम या तो वोट बैंक की पहचान बनती जा रही है। या फिर खाना वदोसो के रुप में बढ़ती जा रही है। जिनका दुरुपयोग या तो राजनैतिक दल या शासकीय बजट ठिकाने लगाने वाले कर रहे है। जबकि शहरिया जागरुकता के आभाव में रोजगार,स्वास्थ और संस्कृति से मोहताज होते जा रहे है।

शिवपुरी जिले के गांवों में निवासरत शहरिया जाति के उत्थान हेतु शासन की सेकड़ों योजनायें प्रचलित है। मगर सबसे ज्यादा ग भीर बीमार बैकार लेाग इसी वर्ग से बस्तियों में मिलेगें व अधिकांश मातायें और बच्चे कुपोषित।

रहा सवाल इनकी दिनचर्चा का तो अधिकांश लेाग नशे के आदि हो निक मे हो चुके है,या शारिरिक तौर पर कमजोर जो अब मजदूरी लायक भी नहीं बचे देखा जाये तो इनके अधिकांश परिवार महिलाओं की मजदूरी पर निर्भर है जो बैचारी बच्चों को पालने कड़ी मेहनत से कमाये पैसे का इस्तेमाल न तो स्वंय न ही बच्चों के लिये कर पाती है। क्योंकि अधिकांश नशेड़ी उनकी मजदूरी छीन नशे मेें उड़ा मारपीट तक करते है। चाहे पत्नी बच्चे भूखे बैठे रहे। उन्हें कोई परवाह नहीं। वोटो की खातिर जो जहर अब इस कौम में घर कर गया है। उसके चलते यह सिर्फ राजनैतिक उपयोग की विषय वस्तु बनकर रह गये है।
जिनकी अज्ञानता का लाभ उठा प्रशासनिक मशीनरी के लेाग इनकी आड़ में जमकर लूटपाट में लगे रहते है। चाहें,शिक्षा, पोषण आहार,मध्ययान भोजन,राशन तेल,स्वास्थ,कृषि,मनरेगा आवास जैसी योजनायें हो या फिर अन्य फिलहॉल तो यह सीधी साधी स्वाभिमानी मेेहनतकस कौम का अब तो अस्तित्व ही खतरे में आता दिख रहा है। जिसका कोई बेहतर भविष्य फिलहॉल नजर नहीं आता।

मध्यप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में नई आर्थिक-सामाजिक क्रांति
पाँच वर्ष में १०,००,००० गरीब परिवार होंगे लखपति क्लब में शामिल
भोपाल : मंगलवार, जून २४, २०१४ मध्यप्रदेश के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक समृद्धि और सामाजिक बदलाव की नई क्रांति देखी जा सकती है। पहले कर्ज के लिए साहूकारों पर निर्भर रहने वाले लाखों गरीब ग्रामीण परिवार विभिन्न आजीविका गतिविधियों के जरिये अब ३ हजार से १५ हजार रुपये माह की आय प्राप्त कर रहे हैं। कई परिवारों की सालाना आमदनी एक लाख रुपये से भी अधिक हो गई है। प्रदेश में ग्रामीण परिवारों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिये 'लखपति महिला क्लब' बनाये गये हैं। आने वाले पाँच वर्ष में करीब १० लाख से अधिक परिवार इस क्लब का हिस्सा बन जायें, इस मकसद से सुनियोजित प्रयास हो रहे हैं। प्रदेश में जिला गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम (डीपीआईपी) और राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन में अब तक करीब ७० हजार से अधिक स्व-सहायता समूह का गठन हो चुका है। गाँवों में स्व-सहायता समूहों की मदद से संचालित आजीविका गतिविधियों से लाखों गरीब परिवारों के जीवन में सुखद बदलाव लाया जा रहा है। यह समूह गरीब ग्रामीण परिवारों के आर्थिक संवर्द्धन के प्रयासों के साथ-साथ गाँवों के समग्र विकास और सामाजिक बदलाव में भी सशक्त भूमिका निभा रहे हैं। स्व-सहायता समूहों की मदद से गरीब महिलाओं को मिले छोटे-छोटे कर्ज से अनेक ग्रामीण परिवार आर्थिक रूप से सशक्त बन चुके हैं। मध्यप्रदेश में स्व-सहायता समूहों द्वारा ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण के प्रयासों से ग्रामीण परिदृश्य में भी नया बदलाव आया है। ग्राम सभाओं में अब ग्रामीण महिलाओं की व्यापक मौजूदगी और ग्राम विकास के विभिन्न फैसलों में उनकी दमदार भागीदारी से गाँवों की तस्वीर बदल रही है। सरकारी दफ्तरों और विकास से जुड़े संस्थानों में भी स्व-सहायता समूह की सदस्य महिलाओं को समुचित आदर-सम्मान मिलता है। आत्म-विश्वास से भरपूर यह महिलाएँ अपने-अपने घरों की जिम्मेदारियों को पूरा करने के बाद चूल्हा-चौखट से बाहर निकल कर पंचायत से कलेक्टर ऑफिस तक जाकर अधिकारों की बात करने में किसी से पीछे नहीं रहती। वह सरकारी अफसरों और जन-प्रतिनिधियों से मिलकर गॉव के विकास के मुद्दों पर बेहिचक बातचीत करने लगी हैं। स्व-सहायता समूहों ने इस बदलाव के लिये महिलाओं को सुनियोजित रूप से संगठित और प्रशिक्षित किया है। आजीविका कार्यक्रमों में शामिल गाँवों में छोटे-छोटे स्व-सहायता समूह बनाये गये हैं। समूह की सदस्य महिलाएँ अपनी बचत राशि जमा करती है, जिससे समूह की अन्य महिला सदस्यों को उनकी जरूरत के समय कर्ज मुहैया करवाया जाता है। स्व-सहायता समूह ग्राम उत्थान समिति से जुड़कर बैंकों से वित्तीय मदद हासिल करते हैं। समूह की सदस्य महिलाएँ समय पर कर्ज वापसी के लिये भी जागरूक भूमिका निभाती है। ग्राम उत्थान समितियाँ सामुदायिक संगठन से जुड़कर बड़े पैमाने पर आजीविका गतिविधियों का क्रियान्वयन कर रही है।

बढ़ते कदम द्वारा दी जाएगी डायलिसिस की सुविधा : मुख्यमंत्री ने की फैसले की प्रशंसा
रायपुर, २४ जून २०१४ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह से यहां उनके निवास पर राजनांदगांव जिले की समाजसेवी संस्था च्बढ़ते कदमज् के प्रतिनिधि मण्डल ने मुलाकात की। संस्था के प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री को बताया कि बढ़ते कदम ने किडनी के मरीजों को राजनांदगांव में किफायती दर पर डायलिसिस की सुविधा देने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री ने उनके इस फैसले की प्रशंसा की और उन्हें इसके लिए वहां शासकीय जिला अस्पताल परिसर में डायलिसिस यूनिट स्थापना के लिए जगह उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। संस्था के प्रतिनिधि मंडल ने मुख्यमंत्री को बताया कि च्बढ़ते कदमज् द्वारा दो एम्बुलेंस, कॉफिन फ्रिजर जैसी सुविधाएं भी जरूरतमंद लोगों की दी जा रही है। संस्था के सदस्यों द्वारा रक्त दान भी किया जाता है। मुख्यमंत्री ने संस्था द्वारा लिए गए इस निर्णय की सराहना की और राजनांदगांव जिला अस्पताल परिसर में डायलिसिस यूनिट के लिए जगह उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। प्रतिनिधि मण्डल ने स्मृति चिन्ह प्रदान कर मुख्यमंत्री का अभिनंदन किया। प्रतिनिधि मण्डल में संस्था के अध्यक्ष श्री गुरुमुखदास वाधवा, रुपचंद भीमनानी, अजय माखीजा और अर्जुन वाधवानी सहित संस्था के अनेक पदाधिकारी और सदस्य शामिल थे।

नई आर्थिक सोच की आवश्यकता : महात्मा गांधी के विचार आज भी प्रासंगिक
पर्यावरण और श्रम कल्याण के संरक्षण की जरूरत-राज्यपाल
जयपुर, 24 जून। राज्यपाल श्रीमती मार्ग्रेट आल्वा ने आर्थिक और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में पर्यावरण और श्रम कल्याण के संरक्षण पर बल दिया है। राज्यपाल श्रीमती आल्वा मंगलवार को यहां चै बर भवन में उत्पादकता पुरस्कार प्रदान करने के बाद आयोजित समारोह को स बोधित कर रहीं थीं। कार्यक्रम का आयोजन राजस्थान राज्य उत्पादकता परिषद ने किया। श्रीमती आल्वा ने कहा कि उपभोक्तावाद और मुनाफावाद पर आधारित आर्थिक दर्शन पर पुनर्विचार की आवश्यकता है तथा गांधी जी द्वारा प्रतिपादित सादगी व नैतिकता युक्त उत्पादन और व्यापार के विचारों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। राज्यपाल ने कहा कि प्रतिस्पर्धात्मक बाजार में अधिकतम लाभ प्रौद्योगिकी व हरित तकनीकी के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है मगर कौशल उन्नयन और श्रम शक्ति को प्रेरित करने पर जोर देना होगा। उत्पादकता बढ़ाने वाले श्रम एवं कौशल को समय-समय पर उन्नयन किया जाना चाहिए। उन्होंंने इस बात पर अफसोस जताया कि आधुनिक तकनीक लागू करने व लागत में कटौती करने के नाम पर पहले महिला श्रमिकों को फिर पुरुष श्रमिकों को नौकरी से हाथ धोने पड़ते हैं। आर्थिक नीतियों के तहत इंसान के सर्वांगीण विकास को भी केन्द्र में रखा जाना चाहिए। श्रीमती आल्वा ने कहा कि आर्थिक विकास मॉडल को अकेले विकास के आधार पर ही आंखें बंद करके नहीं अपनाया जा सकता है बल्कि सामाजिक सिद्घांतों का भी इसमें समावेश करना चाहिए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी के आदर्शों एवं सिद्घान्तों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व के संसाधन मानव जरूरतों के लिए तो पर्याप्त हैं मगर असीमित लालच की पूर्ति नहीं हो सकती है।
राज्यपाल ने समारोह में श्रम उत्पादकता, उत्पादक उत्कृष्टता और उत्पादक योग्यता पुरस्कार प्रदान किये। प्रारंभ में परिषद् के अध्यक्ष डॉ. के.एल.जैन ने स्वागत उद्बोधन दिया। मानद् महासचिव श्री यू.सी. जैन ने परिषद की गतिविधियों को प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में परिषद के पूर्व पदाधिकारियों सहित अनेक गणमान्य नागरिक मौजूद थे।

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बर्बादी के कागार पर मेहनतकश
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