कॉग्रेस: कड़ी निगाह, मेहनत और फैसलो का वक्त

अगर लेाकतंत्र में गहरी आस्था और कड़े संघर्ष को तैयार है कॉग्रेस तो, उसे भी अभी से देश के लिये लक्ष्य तय कर कड़े फैसले मेहनत के साथ कड़ी ...

अगर लेाकतंत्र में गहरी आस्था और कड़े संघर्ष को तैयार है कॉग्रेस तो, उसे भी अभी से देश के लिये लक्ष्य तय कर कड़े फैसले मेहनत के साथ कड़ी दृष्टि रख अपना काम शुरु करना होगा। भारत की राजनीति का इतिहास बताता है। कि कभी साधन विहीन रहे दल तो कभी 2 सदस्यों की सं या में रह भारतीय लोकतंत्र में भाग्य आजमाने वाले दल आज भारतीय राजनीति के अन्दर स्थान बनाने में सफल रहे है। तो कुछ कॉग्रेस को सत्ता से बाहर कर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सीन है। अगर वाक्य में ही कांग्रेस का लोकतंत्र में विश्वास ही नहीं अद य आस्था है। तो कॉग्रेस को देश की महान जनता के फैसले को सर माथे रख उसके आदेश का एक जि मेदार विपक्ष के रुप में पालन करना चाहिए।

क्योकि कॉग्रेस के पास फिलहॉल काम ज्यादा और वक्त कम उसे एक साथ 2-2 मोर्चो पर लडऩा और संघर्ष करना होगा। जिसमें उसके सारे संघर्ष का दारोमदार उसकी संस्कृति और संस्कारों पर टिका रहेगा।
इसलिये एक जि मेदार शुरुआत से पूर्व उसे सोचना होगा। और देश भर में सलाह मशविरा करना होगा। जिससे वह पुन: एक मजबूत संगठन और का भावी मिशन बन सके। कॉग्रेस को चाहिए कि वह आने वाले छ: माह बात कम और काम ज्यादा करने का प्रयास करे। और उन युवा जनसेवको की तलाश करे जो देश का बेहतर भविष्य कॉगे्रेस विचार धारा,अनुरुप नये सिर से गढऩा चाहते है। सरकार जिसकी भी जहां भी रहे प्रदेश या देश मेें भारतीय संस्कृति और कॉग्रेसी संस्कार अनुरुप सकारात्मक सहयोग सत्ता धारी दलो को कॉग्रेस की ओर से अवश्य मिलना चाहिए वहीं संगठन मजबूती की दिशा में कूटनीतिक कदम उठाना चाहिए। और यह तभी स भव है जब कॉगे्रेस कड़ी नजर के साथ कड़ा संघर्ष ही नहीं कड़े फैसलो को तैयार हो। और आलाकमान दिल्ली से निकल स्वार्थियो के काकस दूर देश भ्रमण कर जनता,बुद्धि जीवियो, किसान,मजदूर,मीडिया और युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करे और कॉग्रेस समर्पित लेागों से सतत स पर्क कायम रखे, तभी कुछ हो पायेगा।
क्योकि बाते लिखने को तो बहुत है मगर भूत,वर्तमान को भूल भविष्य बेहतर हो इसके लिये कांग्रेस को प्रयास करना चाहिए तभी कांग्रेस स्व.इन्दिरा,राजीव द्वारा खड़ी की गई। कॉग्रेस के कायाकल्प की दिशा में सोनिया के संरक्षण और राहुल के नेतृत्व में नई शुरुआत कर सकती है। और वह भी आरोप प्रत्यारोपों से विचलित हुये कि वंशवाद भी कोई मुद्दा है। सच तो यह है कि वंश की शुरुआत तो विरासत से होती है। और संगठन की शुरुआत संघर्ष से इसलिये संघर्ष जरुरी है। क्योकि संगठन फिलहाल निस्तानाबूत पड़ा है। इसलिये नई शुरुआत एक नई सोच समझ के साथ कांग्रेस के लिये जरुरी है।

मुख्यमंत्री श्री चौहान से सेन्ट्रल बैंक के सी.एम.डी. श्री ऋषि की मुलाकात
भोपाल : सोमवार, मई २६, २०१४, मुख्यमंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान से आज यहाँ सेन्ट्रल बैंक के सी.एम.डी. श्री राजीव ऋषि ने सौजन्य मुलाकात की।
मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि मध्यप्रदेश में लघु और कुटीर उद्योगों का जाल बिछाने के लिये मुख्यमंत्री युवा स्व-रोजगार योजना शुरू की गयी है। इस महत्वाकांक्षी योजना में जारी वर्ष में एक लाख युवा को खुद का उद्योग स्थापित करने के लिये ऋण उपलब्ध करवाया जायेगा। इन युवाओं को दिये जाने वाले ऋण की गारंटी राज्य सरकार लेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बैंक इस योजना में पहल कर युवाओं के ऋण स्वीकृत करें। इस अवसर मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री एस.के. मिश्रा भी उपस्थित थे।

महाराणा प्रताप और हल्दी घाटी युद्घ
जयपुर,25.5.201 4प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप (1540-1597 ई.) देश के उन महान सपूतों में से है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा और मान-स मान के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जीवन पर्यन्त वह आक्रमणकारियों से संघर्ष करते रहे किन्तु झुके नहीं और उनकी अधीनता स्वीकार की। महाराणा प्रताप की जीवनी के लेखक राजेन्द्र शंकर भट्ट के शब्दों में ''महाराणा प्रताप ''प्रतापÓÓ थे और अकबर ''अकबरÓÓ। एक ओर विश्व का उस समय का सबसे शक्तिशाली सम्राट अकबर भारत के सभी भागों विशेषत: तत्कालीन राजपूताना के राज्यों पर आधिपत्य स्थापित करना चाहता था। छल बल से उसे अपने प्रयत्नों में सफलता भी प्राप्त हुई किन्तु मेवाड़ के महाराणा ने अपना सिर नहीं झुकाया। वह निरन्तर आक्रमणकारियों से मुकाबला करते रहे। कविवर केसरी सिंह बारहठ के शब्दों में-
''पग पग भग्या पहाड़, धरा छांड रा यों धरम।
महाराणा रॅ मेवाड़, हिरदे बसिया हिंद रे।।ÓÓ
अर्थात् धर्म की रक्षा के लिए वह अपना राज्य छोड़कर पहाड़ों में भटकते रहे। इसलिए महाराणा और मेवाड़ हिंदवासियों के हृदय में बसे हुए हैं। उस समय की विषम परिस्थितियों पर दृष्टि डाले तो सन् 1568 ई0 में मेवाड़ की राजधानी चितौड़ महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह के हाथों से निकल चुकी थी। सन् 1572 ई0 में पिता के देहावसान के पश्चात् महाराणा प्रताप मेवाड़ की गद्दी पर विराजमान हुए तथा गोगुन्दा में उनका राजतिलक हुआ। 32 वर्षीय युवा महाराणा प्रताप ने अपनी सेना को संगठित किया। इसमें आदिवासी भीलों को भी प्रमुख स्थान दिया गया। बादशाह अकबर ने जलाल सिंह, आमेर के कुंवर मानसिंह, राजा भगवान दास और टोडरमल को समझाने के लिए भेजा तथा मेवाड़ और मुगलों में संधि के प्रयास भी किये गये किन्तु महाराणा अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
महाराणा प्रताप ने प्रण किया ''जब तक चितौड़ स्वतंत्र नहीं करा लूंगा तब तक सोने चांदी के बर्तन में भोजन नहीं करूंगा। महलों में वास नहीं करूंगा, न कोई उत्सव मनाऊंगा न रण में अपने गौरव की घोषणा करूंगा और अपनी मूंछों पर ताव भी नहीं दूंगा।ÓÓ
अन्तत: सन् 1576 ई. में हल्दीघाटी का युद्घ हुआ। आमेर के कुंवर मानसिंह और आसिफ खां के नेतृत्व में 5000 सैनिकों की फौज के साथ अप्रेल माह में शाही फौज ने अजमेर के लिए प्रस्थान किया। ाानसिंह के नेतृत्व में भाले, तलवारों, तेजी से वार करने वाले धनुष बाण एवं तीरों तथा छोटा तोपखाना और जंगी हाथियों से सुसज्जित मुगल सेना ने अजमेर होते हुए मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया। मेवाड़ में बनास नदी के उत्तरी किनारे पर खमनोर गा्रम से दो मील की दूरी पर मोलेला गांव के निकट पड़ाव डाला।
ाहाराणा की सेना में भी 3000 घुड़सवार 2000 पैदल, 100 हाथियों और 100 नगाड़े व तुरही वाले आदमियों के साथ खमनोर के दक्षिण पश्चिम में करीब 12 मील की दूरी पर स्थित गांव लोसिंग में अपना पड़ाव डाल दिया। मेवाडिय़ों के पास तोपखाना व बंदूकें नहीं थीं। दोनों सेनाओं के शिविरों की दूरी लगभग 10 मील थी और बीच में थी हल्दी घाटी। महाराणा ने युद्घ से पूर्व अपनी राजधानी गोगूंदा से बदलकर कु भलगढ़ बना ली क्योंकि यह स्थान मुगल सेना के रास्ते से दूर था।
21 जून,1576 को घमासान युद्घ हुआ जिससे रक्त का तालाब भर गया । इसी कारण यह स्थान रक्त तलाई कहलाता है। अब सेना की मध्य पंक्तियों के बीच घमासान युद्घ शुरू हुआ। मानसिंह हाथी पर सवार थे। चेतक पर सवार प्रताप ने भाले से मानसिंह पर वार किया। मानसिंह नीचे झुककर बच गए, किंतु उनके हाथी का महावत मारा गया। इस तेज आक्रमण में जब चेतक ने अपने पैर हाथी की सूंड पर जमाए ,तो वहां लगी तलवार से घोड़े की एक टांग ज मी हो गई। प्रताप के इस साहसी आक्रमण से मुगल सेना अधिक सचेत हो गई और निरंतर तीर और भालों से आक्रमण कर प्रताप को शेष सेना से अलग करने के प्रयत्न में लग गई। प्रताप अत्यंत रणकौशल से अपने को बचाते हुए अपनी सेना की ओर आ गए। ऐसे संकट के समय प्रताप के मु य सरदार झाला मानसिंह ने प्रताप के शाही प्रतीकों को स्वंय ने धारण कर लिया। मुगल सेना झाला मानसिंह को राणा समझ कर टूट पड़ी। मेवाड़ की सेना बड़ी बहादुरी से लड़ती रही। इसके परिणाम-स्वरूप मुगल सेना के पांव उखडऩे लगे। ऐसी स्थिति में मुगलों की रिजर्व सेना के सेनापति मेहतर खान ने दुंदुभी बजवाकर घोषणा कर दी कि बादशाह अकबर स्वंय युद्घ क्षेत्र की ओर आ रहे हैं। इससे मुगल सैनिकों में जोश आ गया और वह अधिक जोश से लडऩे लगे, किंतु बहादुर मेवाड़ी सेना के सामने कामयाब नहीं हो सके।
मध्यान्ह तक अनिर्णय की स्थिति में युद्घ समाप्त हो गया । मुगल सेना और 300 घायल हो गए। मुगल सैनिक इतने थक गए थे कि अब मेवाड़ की सेना का पीछा करने की उनमें शक्ति नहीं थी। खाने के लिए भी केवल आम व मांस ही उपलब्ध था। इतिहासकारों का मत है कि जब अप्रेल में ही मानसिंह के नेतृत्व में सेना को भेज दिया गया था, तब जून तक किस कारण से इंतजार करते रहे ? जून की तपती गर्मी का मौसम युद्घ के लिए किसी तरह भी उपयुक्त नहीं समझा जा सकता । इतिहासकार अल बदायंूनी, जो हल्दी घाटी के युद्घ के समय स्वयं उपस्थित था, वह लिखता हैं- '21 जून की तपती दोपहरी में सिर भन्ना रहा था तथा हवा भट्टी की तरह दहक रही थी, इससे सैनिकों में फुर्ती बिल्कुल नहीं रहीÓ। युद्घ में शाही सेना मेवाड़ विजय तो नहीं कर सकी, किंतु इसका परिणाम यह रहा कि अकबर अपने सेनापतियों से बड़ा खफा हो गया। कुछ समय के लिए मानसिंह और आसफ खां दोनों का शाही दरबार में जाना बंद कर दिया गया। आढ़ा दुरसा ने महाराणा प्रताप को श्रद्वांजलि अर्पित करते हुए लिखा है।
अकबर जासी आप,दिल्ली पासी दूसरा।
पुनरासी परताप,सुजस न जासी सूरमा ।।
अर्थात सम्राट अकबर का संसार छोड़कर जाना तो निश्चित है और दिल्ली पर अन्य लोगों का कब्जा होगा, किंतु हे पुण्यवान वीरवर प्रताप, तेरा सुजस तो सदा अमर रहेगा ।
प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप स्वतंत्रता संग्राम में भी देश भक्तों के प्रेरणा स्त्रोत रहे है। सुप्रसिद्व पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने समाचार पत्र '' प्रताप ÓÓ के माध्यम से जनमानस को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया । श्री विद्यार्थी के शब्दों में ''जब तक इस दुनिया में उदारता, स्वतंत्रता और तपस्या का आदर है, तब तक हम भारतवासी ही नहीं सारा संसार प्रताप को आदर की दृष्टि से देखेगाÓÓ ।
सन् 1597 में 57 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप का शरीर पंच तत्व में विलीन हो गया।

डॉ. रमन सिंह मुख्यमंत्री ने नये प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को दी बधाई
रायपुर, २६ मई २०१४ मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने आज श्री नरेन्द्र मोदी को देश के नये प्रधानमंत्री के पद की शपथ लेने पर अपनी और छत्तीसगढ़ की जनता की ओर से हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। डॉ. सिंह ने श्री मोदी के साथ शपथ लेने वाले सभी मंत्रियों को भी बधाई दी है। डॉ. रमन सिंह ने यहां जारी शुभकामना संदेश में कहा है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में निश्चित रूप से आज का दिन एक यादगार और ऐतिहासिक तारीख के रूप में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गया है। विशाल जनसमर्थन और लोकप्रियता के नये कीर्तिमान के साथ श्री मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में देश की कमान संभाली है। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि अब श्री मोदी के नेतृत्व में भारत में आम जनता की तरक्की और खुशहाली के लिए सुशासन और विकास का एक नया युग की शुरूआत हो गई है। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि ज्सबके साथ सबके विकासज् का लक्ष्य लेकर मोदी सरकार समाज के सभी वर्गो की सुख-समृद्धि के लिए काम करेगी। समाज की अंतिम पंक्ति के लोगों को विकास की मुख्य धारा से जोड़ने का सपना भी अब तेजी से साकार होगा। श्री मोदी ने शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित कर दुनिया को यह संदेश दिया है कि निकट भविष्य में विदेशों के साथ भारत के संबंध और भी अधिक मैत्रीपूर्ण तथा सौहार्द्रपूर्ण होंगे। भारत पूरी दुनिया में शांति और सदभावना के संदेशवाहक के रूप में अपनी निर्णायक भूमिका निभाएगा। डॉ. रमन सिंह ने कहा कि श्री मोदी के नेतृत्व में भारत एक स्वाभिमानी और विकसित राष्ट्र के रूप में दुनिया के नक्शे पर अपनी व्यापक पहचान बनाएगा। उन्होंने कहा कि श्री मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर छत्तीसगढ़ वासियों को भी अत्यंत हर्ष का अनुभव हो रहा है। श्री मोदी का छत्तीसगढ़ की जनता से वर्षो पुराना आत्मीय संबंध रहा है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में श्री मोदी छत्तीसगढ़ आ चुके है और संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर काम करते हुए उन्होंने पहले भी इस राज्य के जिलों का सघन दौरा किया है। मुख्यमंत्री ने विश्वास व्यक्त किया कि श्री मोदी के नेतृत्व में बनी केन्द्र की नई सरकार छत्तीसगढ़ जैसे नये राज्य को विकास के मामले में विशेष रूप से प्राथमिकता देगी और राज्य की वर्षो से विचाराधीन महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं को जल्द से जल्द स्वीकृति मिलेगी। 

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कॉग्रेस: कड़ी निगाह, मेहनत और फैसलो का वक्त
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