राहुल पर दोष गलत: चिन्तन विहीन कॉग्रेस को भस्मासुर बन ले डूबीभाषा और बॉडी लेंग्वेज

व्ही.एस.भुल्ले। लेाकतांत्रिक व्यवस्था में जिन्दा रहने किसी भी दल को जनता से जीवन्त स पर्क भले ही पहली शर्त,संस्कारिक शालीन भाषा का शरीर के साथ समन्वय उसकी जरुरत और विचार उसकी आत्मा होती है। इस अदने से ज्ञान से अनभिज्ञ हो, जो दल जब गलतियों पर गलतियाँ दोहराता है। तो स्वत: ही वह अज्ञान उसके लिये भस्मासुर बन जाता है। 

मगर दुर्भाग्य इस सच्चाई से अनभिज्ञ कॉग्रेस अभी भी इस गलत फहमी में है। आज नहीं तो कल स्वार्थी चापलूस भस्मासुरों के सहारे अच्छे दिन आने वाले है एक और कहावत है जब सच से सामना करने तर्को का स्थान कुतर्क ले लेते है। और मु य मुद्दों को भूल एक दूसरे को नीचा दिखाने लेाग कुतर्को के सहारे स्वयं का दल भूल स्वयं का इकबाल बुलन्द करते है तो परिणाम यहीं मिलते है। जो कांग्रेस को 2013 व 2014 में मिले है। 
अगर नई सरकार की चुनावी परफॉरमेन्स के मद्देनजर वर्तमान कॉग्रेस के हालातों पर नजर डाले। तो अगले 10 वर्ष में कहीं कॉग्रेस बगैर किसी अपराध के इतिहास न बन जाये।

क्योकि एक ओर लगभग 100 संस्थाओं संगठनों समाज सेवियो का समर्थित दल और 29 छोटे मोटे क्षेत्रीय दलो का साथ वहीं दूसरी और कार्यकत्र्ता विहीन कॉरपोरेट कॉग्रेस जहां बोस के वोर्ड में अस्तित्व विहीन स्वार्थी मगर चापलूस वोर्ड मे बर है, जो यस मैन की मुद्रा में रहते है। ऐसे में जब मुखिया या बोस पर बाजार,समाज,जनता की आशा आकाक्षाओं से जीवंत स पर्क के आभाव में दिशा विहीन हो। और सूचना दाता स्वार्थी और अज्ञानी हो तो भविष्य कैसा होगा अन्दाजा लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं भविष्य कैसा तय होगा उस संगठन और उस कॉरपॉरेट क पनी का जो जबरदस्त प्रतिस्पर्धा के बीच टिके रहना चाहती है।

इसलिये यह कहना गलत न होगा कि संगठन विहीन दल और क पनी के बारे में जिसने विगत 25 वर्षो में गिरती संगठन की सेहत और क पनी पर कोई काम नहीं किया। इसलिये क पनी और कॉग्रेस के टिकाऊ और,स्थाई उत्पादनो पर चुनावों के दौरान इसलिये भाव और बाजार नहीं मिला कि न तो शॉरुमों की विश्वसनीयता रही न ही प्रचार प्रसार रहा, अब्बल कॉग्रेस के उत्पादनों का अस बलिंग बाजार खूब चला। और लेाग करोड़ पति ही नहीं अरबपति बन बड़ा ए पायर बना समुचे देश की सत्ता हथियाने में सफल रहे।

अब जब कॉग्रेस जैसा महान संगठन जिसे स्व.इन्दिरा और स्व.राजीव जी ने अपने खून पसीने से सीचा हो और राजनैतिक चाल बाजियों से अनभिज्ञ एक सरल महिला ने अपना सब कुछ गवां अपने बच्चों तक को खेलने खाने की उम्र में राजनीति में झोंक संगठन बचाने, डरते डराते दो दो दिल दहला देने वाले हादसो के बावजूद इतना बड़ा रिस्क लिया हो। उसके बावजूद भी इस महान संगठन की ऐसी दुर्गति हेागी उसने सपने में भी न सोचा होगा। इस दुर्गति के लिये वो ही जि मेदार हो सकते है। जो कॉग्रेस में ही रहकर अपने स्वार्थ और पद की खातिर कॉग्रेस की बर्बादी पर चुप रहे वहीं कुछ ऐसे भी रहे जो अघोषित विपक्ष में सत्ता भागीदारी के चलते बार बार राजनैतिक पडय़ंत्र कर विरोधी दलो को ताकत दिलाते रहे। और घडय़ाली आंसू वहा अपने बेहतर प्रबन्धन के सहारे कॉग्रेस की बर्बादी की कालिख कभी मीडिया तो कभी दिल्ली में आलाकमान के आसपास रहने वाले चापलूसों के सहारे औरो पर पोतते रहे।

मगर कॉग्रेस की शुभचिन्तक बैचारिक मीडिया और कॉग्रेस समर्पित कार्यकत्र्ता सड़कों पर चिल्लाते रहे। 
मगर आलाकमान की कमजोर नस जनता या फिर मीडिया मित्रों से खुले जीवंत स पर्क न होने के कारण और सही सूचनाओ के आभाव का लाभ उठा स्वार्थियों ने कभी सच्चाई सामने नहीं आने दी। यहां तक आलाकमान के संचार माध्ययम भी मूकदर्शक ही नहीं श्रवड़ विहीन बने रहे।

कहते जिस संगठन या सत्ता का उन लेागों से सीधा संवाद न हो जो निस्वार्थ सिद्धान्तों विचारों के लिये सेवा देते है उसका विनाश सुनिश्चित होता है।
मगर दुर्भाग्य कि देश भर में विधानसभा लेाकसभा चुनावों में करारी हार के बाद कार्य समिति और फिर टी.वी. चैनलों पर जो पक्ष या विरोध कॉग्रेस द्वारा चल रहा है। 
उससे नहीं लगता कॉग्रेस ने कोई सबक सीखा है। अगर ऐसा ही कुछ चला तो वो समय भी दूर नहीं जब कुर्बानियों पर टिके एक महान दल को लेाग इतिहास में पढ़ने पर मजबूर होगें।

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