संस्कृति सहारे गढ़ेगें देश: मन्दिर को नमन और माँ भारती की सेवा में छिपे है मोदी के संकेत

व्ही.एस.भुल्ले। जिस माहन भारतीय स यता की छत्रछाया और संस्कृति के सहारे भाजपा संसदीय दल के नेता नरेन्द्र भाई मोदी ने देश के सवा अरब देश वासियों के  दिल और देश के लेाकतंत्र में जो ल बी लकीर खीचीं है। उसे और गहरा करने का काम उन्होंने हमारी महान संस्कृति के सहारे लेाकतंत्र के पवित्र मन्दिर अर्थात संसद की सीढिय़ों पर मत्था टेक और माँ भारती की सेवा का भांव अपने रुधन में स्पष्ट कर यह साबित कर दिया कि कितनी महान है हमारी संस्कृति। और कैसे देश को आगे ले जा, देश की सेवा किन आदर्शाे के साथ, और किन लेागों के लिये करना चाहते है।

यह सौभाग्य है हम सवां अरब देश वासियों का कि जिस महान स यता,संस्कृति,संस्कारों से विमुख एक अन्तहीन अन्धे रास्तों पर हम दौड़े जा रहे थे। उस दौड़ में दौड़ते दौड़ते न तो कोई अपना बचा न अपनो के बीच अपनत्व का भांव। मुगलिया सल्तनत से लेकर अंग्रेजो की हुकूमत ही नहीं हमारे आजाद भारत की हुकूमत में जिस तरह से हमारी महान स यता,संस्कृति,संस्कारों पर प्रहार हुआ। उसने हम भारत वासियो को अपनो से अपनो की बैबजह दुश्मनी,कटुता पैदा कर  अपनत्व से दूर कर दिया। और युवाओं को दिगभ्रमित कर दिया अगर यो कहें कि देश की पीढ़ी दर पीढ़ी हम अपनी मातृ भूमि अर्थात अपनी माँ भारती से ही अपनत्व का भांव जाता रहा।

आज उस भांव को जिन्दा करने संसदीय दल के नेता ने लेाकतंत्र के मन्दिर की पहली सीढ़ी पर मत्था टेक और रुधन भरे शब्दों में माँ भारती पर कृपा नहीं सेवा के भाव और अपने वरिष्ठ नेताओं के चरण आचमन ने सांसदों से भरे संसद के सेन्ट्रल हॉल में साबित कर दिया कि हमारी वो स यता,संस्कृति,संस्कार ही है। जो हमारे देश की सवां अरब जनता का जीवन खुशहाल और हमारे देश को शक्ति स पन्न राष्ट्र बना सकते है।
जिसकी शुरुआत पूरे आत्म विश्वास के साथ भाजपा संसदीय दल के नेता और भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी कर चुके है।

उनकी सोच और कार्यशैली से उनके सहयोगी सांसद,वरिष्ठ नेता,प्रशासनिक तंत्र सहित देश की जनता,मीडिया और पड़ोसी देश समझ ले कि आज भी भारतीय स यता,संस्कृति,संस्कार हमें इस बात के लिये प्रेरित करते है। कि हम स य ही नहीं संस्कार वान भी है। और स्वाभिमानी भी।

बहरहाल नई संसद के गठन की शुरुआत ने अपने संसदीय दल के नेता के नेतृत्व में यह स्पष्ट कर दिया कि किसी को देश के अन्दर और देश के बाहर यह संदेह नहीं होना चाहिए कि संसद हमारे लिये मन्दिर के समान जिसकों मत्था टेक हम नमन करते है। और भारत हमारी माँ है जिसकी सेवा हमारा धर्म जिसके स्वाभिमान स मान के लिये हम सवां अरब भारतीय न तो आँख दिखाकर कर जीना चाहते न ही आँख झुका कर, हम तो बस स मान जनक ढंग से आंखों में आंखे डाल कर जीना चाहते है।

इसलिये दल,देश या परदेश में बैठे लेागों को समझना होगा कि जिस तरह हम सबका साथ सबका विकास के मंत्र के साथ आगे बढऩा चाहते है। उसमें व्यावधान निश्चित ही जनभावनाओं के विपरीत और हमारी संस्कृति का अपमान होगा।


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