काश बापू होते

देश में लेाकतंत्र के नाम संविधाम उनमुख संस्थायें जो भी हो उनके सिद्धान्त व्यवहार इस लेाकतंत्र में जो भी हो मगर वर्तमान हालातों के मद्देनजर अगर हम बापू को याद करे जिन्होंने देश के स मान,देश वासियों के स्वाभिमान की खातिर स पन्नता,स मान पूर्वक जीवन त्याग देश व देश वासियों के लिये एक फक्कड़ संत की तरह जीवन जी उस ब्रिटानियों हुकूमत के खिलाफ बगावत का श्ंाखनांद पूरे अहिंसात्मक तरीके से किया जिसकी सत्ता के बारे में यह कहावत थी कि ब्रिटानियों हुकूमत में कभी सूर्य अस्त नहीं होता। उस हुकूमत का सूर्य अस्त खासकर भारत से पूरे अङ्क्षहसात्मक ढंग से किया और भारत को अंग्रेजो के चंगुल से आजाद कराया।

फक्कड़ सन्त की तरह जीवन जी विदेश ताकत से खुला संघर्ष करने वाले बापू ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि आजादी के 50 वर्ष बाद फिर किसी गाँधी की जरुरत होगी इस देश को क्योकि इस देश से विदेशी गौरे तो अपने साम्राज्य को बापू के कड़े अङ्क्षहसक संघर्ष के चलते छोड़कर चले गये और आम भारत वासी ने आजाद भारत में स्वास ली।
मगर बापू को क्या पता था कि हमारे द्वारा गढ़ी गई महान संस्थाओं का भविष्य क्या होगा? क्या एक बार फिर से इस देश की दीन हील दरिद्र नारायण जनता पर फिर से आजाद भारत में साम्राज्यवाद हावी होगा। जिनके लिये वह जीवन पर्यन्त अंग्रेजो से लड़े। दुर्भाग्य मगर जी हाँ अग्रेज भले ही इस देश से चले गये मगर उनका साम्राज्यवाद आज भी भारत मेें लेाकतंत्र के नाम पर जिन्दा है।
क्योकि सर्व प्रथम दलीय व्यवस्था के नाम बनी व्यवस्था में जनतंत्र की हत्या। उसके बाद दलीय सत्ता के नाम अघोषित साम्राराज्य बाद ने भारत के आम गरीब को कहीं धर्म,जाति,क्षेत्र,भाषा के नाम तोड़ कर रख दिया है। क्योकि आज सत्ता मेें इन्हीं लेागों का बोलवाला है औा सत्ता पाने के लिये कहीं धर्म,जाति,क्षेत्र,भाषा का खुल कर प्रयोग हो रहा है। तो कहीं साम्राराज्य बनाये रखने जनकल्याण,विकस के नाम साम,नाम,दण्ड,भेद नीति का उपयोग हो रहा है। कोई भी महा बेईमान किसी भी ईमानदार व्यक्ति पर आरोप लगा पूछ रहा है। बताओं ईमानदार नहीं तूम बेईमान हो। कइ्र संस्थागत कानून पूँछ रहे है कि हमारा क्या गुनाह,हम तो निर्जीव,बेगुनाह है हम तो कानून की किताबों में विगत 65 वर्षो से बदले ही नहीं गये। अब उस पर से लेाकतंत्र के नाम अघोषित साम्राराज्य बाद जहां दल ही नहीं सदनो में भी धनाडयों का बोलबाला है और हो भी क्यों न क्योकि हमारी चुनाव प्रणाली ही दोष पूर्ण है। जहां चुनाव लडऩे से लेकर जनसेवा तक की व्यवस्था अर्थ पूर्ण है।
अगर केन्द्रीय आंकड़ों को ही पकड़ ले जिन्हें खादय सुरक्षा की जरुरत है अर्थात 80 करोड़ से अधिक आबादी जिनकी आय प्रतिमाह 1500 से अधिक न हो वह निर्वाचन आयोग निर्धारित विधानसभा में 14 लाख और लेाकसभा में खर्च सीमा हो ऐसे में 80 फीसदी आबादी बापू के सपने के मद्देनजर कैसे अपने हिस्सेदारी निभा सकती है।
मामला साफ है हमारी चुनाव प्रणाली ही दोष पूर्ण है।
अगर बापू के सपनो का भारत बनाया है तो देश की चुनाव प्रणाली में परिवर्तन सर्वप्रथम जरुरी है।
अगर देश में चुनावी व्यवस्था दुरुस्त हो चुनावों में हर प्रत्याशी का स पूर्ण खर्च आयोग उठाये कुछ शर्तो के साथ तो देश में 75 फीसदी भ्रष्टाचार धन का दुरुपयोग खत्म हो जायेगा।
और हमारा महान भारत भी अघोषित साम्राराज्य बाद से आजाद हो जायेगा फिर वह साम्राराज्यवाद देश के अन्दर औद्योगिक घरानों,राजनैतिक दलो पूर्व राजवंशों और अपराधी,माफियाओं का ही लेाकतंत्र की आड़ में क्यों न हो निस्तानाबूत हो जायेगा और 65 वर्ष बाद भारत हकीकत में आजाद हो जायेगा।


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