मुख्यमंत्री जी ये कैसा गणतंत्र: गण घन्टों खड़े रहे, तंत्र सोफो पर जमा रहा

म.प्र शिवपुरी। हो सकता है राष्ट्रीय पर्व पर मेरा यह लेख कुछ लेागों को नागबार गुजरे या मेरी मानसिकता ओछी लगे मगर दुख होता है हमें हमारे ...

म.प्र शिवपुरी। हो सकता है राष्ट्रीय पर्व पर मेरा यह लेख कुछ लेागों को नागबार गुजरे या मेरी मानसिकता ओछी लगे मगर दुख होता है हमें हमारे द्वारा एक वर्ष में दो बार आने वाले राष्ट्रीय पर्वो को मनाते वक्त, जिन गणों की सुरक्षा उनके उत्थान के लिये गणतंत्र की स्थापना हुई।
वह आज भी अपने गणतंत्र जैसे राष्ट्रीय त्यौहार का नजारा हर वर्ष गैरो की भांति मनाने पर मजबूर है। मुझे लगता है कि हम आजादी के 65 वर्ष बाद 65 वे गणतंत्र पर भी गुलामी पूर्ण व्यवस्था को नहीं बदल पाये।

लगभग मेरे जीवन का 35 वर्ष का लम्बा सफर, वहीं गणतंत्र दिवस, वही पोलो ग्राउन्ड, ग्राउन्ड में बन्दुकों की सलामी, जवानों की शानदार परेड मुख्यमंत्री के संदेश का वाचन, बच्चों की पी.टी.योगा, सांस्कृतिक कार्यक्रम झांकियाँ और पुरुषकारों का वितरण इत्यादि,इत्यादि।

जब मैं छोटा था, 5 वी कक्षा में पढ़ता था, जब भी स्कूली बच्चों की तरह में भी अपने गणतंत्र दिवस को मनाने हर वर्ष पोलो ग्राउन्ड जाता था। समारोह पश्चात शास.स्कूल में मिष्ठान वितरण भी होता था। शहर में प्रभात फेरी भी निकलती थी। नारा होता था गणतंत्र दिवस अमर रहे, आज क्या है 26 जनवरी।

तब भी गणतंत्र दिवस समारोह मनाने स्कूली बच्चे शिक्षकों और पालकों के साथ तात्या टोपे स्टेडियम ही जाते थे। तब भी एक मंच, मंच के दोनों तरफ 200-500 कुर्सियाँ तंत्र के मुखिया, पैरोकार, जनप्रतिनिधियों को डाली जाती थी। बाकी जगह बच्चे बगैर किसी विछात के या तो ग्राउन्ड की खुली जमीन पर ही बैठते थे या फिर घन्टों खड़े खड़े ही गणतंत्र समारोह को देख वापिस हो लेते थे।

आज जब 35 वर्ष बाद मेरी नजर एक आम आदमी के रुप में सम्पूर्ण समारोह पर गयी तो मैंने देखा नन्ने, नन्ने बच्चे या तो मैदान में खड़े है या खुली जमीन पर बैठे है। कुछ माता बहिनों तो दूर से ही खड़े खड़े समारोह देखने पर मजबूर है। यह सब देख मुझे शर्म ही नहीं ग्लानी भी महसूस हुयी और पत्रकार दीर्घा में खाली पढ़ी कुर्सियों पर बैठके समारोह देखने का इरादा त्याग मैंने भी आम व्यक्ति बच्चों की तरह खड़े होकर ही समारोह देखना उचित समझा, इसके अलावा मैं वेवस इन्सान अपने गणतंत्र समारोह में शर्म महसूस करने के अलावा करता भी क्या?

इस बीच कुछ पत्रकार साथियों से मैंने गुजारिश भी की भाईयों इस दृश्य के फोटो तो लो मगर दुर्भाग्य बेचारे वे भी कबरेज में व्यस्त थे। जैसे-तैसे मैंने एक फोटो ग्राफर से विनय की और यह फोटो निकलवाया। जिससे म.प्र. की जनता के पुजारी मुख्यमंत्री इस फोटो को देख सके और वह यह अहसास कर सके कि गणतंत्र के असली मायने क्या होते है?

आज जिस राष्ट्र प्रेम का धीरे धीरे टोटा पड़ता जा रहा है। उसके पीछे यही छोटे-छोटे कारण है माननीय मुख्यमंत्री जी अगर राष्ट्रीय समारोह या त्यौहारों पर 1-2 करोड़ और ज्यादा खर्च हो जाये तो म.प्र. कंगाल नहीं हो जायेगा क्योकि वैसे भी म.प्र. में 50 के लगभग जिले है और आपकी शासकीय योजनाओं के आयोजनो स मेलनों का विभिन्न वर्ग समाजों की पंचायतों का खर्चा करोड़ों मे है।

अगर 15 अगस्त,26 जनवरी को क्रमश: स्वतंत्रता दिवस,गणतंत्र दिवस पर बच्चों को स्कूलों में मिष्ठान वितरण ओर समारोह स्थलों पर सिर्फ बच्चों और माता-बहिनों को बैठने की समुचित व्यवस्था हो जाये तो क्या फर्क पढ़ेगा प्रदेश को? क्योकि जिस भाव से जमीन पर मिट्टी में बैठ या घन्टों खड़े रह मेरे जिले या अन्या जिलों के बच्चे-बच्यिाँ,ंयुवा प्रदेश में गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस मनाते रहे है। यही भविष्य में प्रदेश के गण और तंत्र बनेगें।

बहरहॉल मेरा ऐसा मानना है हमारा भूत,वर्तमान हमारे राष्ट्रीय त्यौहारों को लेकर जो भी रहा हो कम से कम भविष्य ऐसा न रहे ऐसी अपेक्षा हमें रखनी चाहिए।


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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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मुख्यमंत्री जी ये कैसा गणतंत्र: गण घन्टों खड़े रहे, तंत्र सोफो पर जमा रहा
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