ऐतिहासिक सच्चाई से छेड़छाड़,अन्याय विनाश की ओर बढ़ती बहस

व्ही.एस.भुल्ले/ लोकतंत्र में विचारों, कार्यप्रणाली में सहमति असहमति किसी भी लेाकतंत्र में लेागों के बीच होना स्वाभाविक है। मगर सत्ता के लिये मद्दो से इतर इतिहास से छेड़छाड़ कदापि उचित नहीं।

राजनीति विचार उपलब्धियों और योजनाओं के बेहतर क्रियान्यन तथा सार्थक परिणामों के साथ भविष्य की योजनाओं पर होना चाहिए। मगर इसके उलट जिस तरह से देश में सत्ता के लिये कुछ मुद्दे और आरोप उछाले जा रहे है। वह देश के महान लेाकतंत्र के लिये नासूर ही नहीं खतरनाक है। क्योकि व्यक्ति की पहचान उसके द्वारा किये गये अच्छे बुरे कार्याे से होती है न कि किसी परिवार की पृष्ठ भूमि और उसके इतिहास से आज जितने भी बयान वीरो की पहचान देश में वह उनके द्वारा देश,देश की जनता के लिये किये गये कार्यो से है, न कि उनके परिवार से।

लेाकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में इतिहास से छेड़छाड़ कर जो नये सब्ज बाग दिखाये जा रहे है और सारा दोष किसी परिवार विशेष को निशाना बना गिनाये जा रहे हो। यह लेाकतंत्र में गलत ही नहीं किसी भी परिवार विशेष के साथ अन्याय है। खासकर वो परिवार जिसने देश व देश की एकता अखण्डता धर्म निर्पेक्षता की खातिर कुर्बानियाँ दी हो। चाहे वह आजादी की लड़ाई की 1962 का चीन युद्ध जो दोस्ती की बिना पर थोपा गया चाहे वह 1971 का युद्ध हो जो भारत को अंग भंग करने को रचा गया हो। 

मगर उस परिवार ने जिसे लेाग सरेयाम आरोपित कर रहे है। उस परिवार ने नेहरु समय से लेकर आज तक डट कर सामना किया है और हर कीमत पर देश का प्रतिष्ठा बढ़ा विश्व में पहचान बना धाक जमाई इतना ही नहीं कभी राष्ट्र हित में सूत खोरी खत्म कर और जनसं या नियंत्रण हेतु देश के अन्दर परिवार नियोजन जैसे कार्यक्रम चलाये जो व्यवस्थागत त्रुटि के चलते सारा दोष इसी परिवार पर मड़ा गया ऐसे ही लेागों द्वारा जो सरकार की नीति और योजना क्रियान्वयन से सहमत नहीं थे। जिसका परिणाम भी इसी परिवार ने 1977 में सत्ता से हाथ धो भोगा और अपमानित ही नहीं जेल जाने तक का मार्ग तय किया। 

इतना ही नहीं पुन: जनता का आर्शीवाद मिलने के बाद सत्ता में रहते हुये अखण्ड भारत की खातिर सिद्धान्तों के चलते घर में ही धधकती गोलियों का शिकार अपने ही देश में अपने घर की चार दीवारी में होना पढ़ा। क्या गलनी थी उस नेक दिल इन्सान की जो अपनी जीवन्त जिन्दगी त्याग अपने देश और अपनी मां की इच्छा के कारण राजनीति जैसे दल दल में कूद गया अपने हमसफर की इच्छा के विरुद्ध, वह सच्चा दिल इन्सान जिसने देश में व्यवस्थागत भ्रष्टाचार को पहली मर्तवा मंच से उजागर किया। 

कि हम एक रुपया भेजते है। लोंंगों तक 15 पैसा पहुंच पाता है। देश में टूव्हीलर,4 व्हीलर के लिये लाइन लगा ब्लैक में वाहन खरीदने वाले देश वासियों और दुनिया की टेक्नोलॉजी से अनभिग्य आम गरीब लेागों के लिये नीतियां बना उनका हक इन्सान दिलाने वाले नेक दिल इन्सान की हमारे ही देश में बम से मौत, हम देश वासियों पर कलंक है। वह और कोई नहीं देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्व.श्रीमती इन्दिरा का वह पुत्र ही था जिसने देश में 73,74 वे संसोधन के साथ आम गरीब मजदूर हर वर्ग और महिलाओं को सीधे सत्ता में भागीदारी दी। इतना ही नहीं,सूचना प्रौघौगिकी और संचार क्रान्ति सहित ऑटों मोबाईल्स ही नहीं कई क्षेत्रों में क्रान्ति की।
 
मगर उन्होंने कभी मूल सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। बल्कि देश की खातिर आज जैसे भ्रामक प्रचार के बजाये सत्ता से बाहर विपक्ष में बैठ अलग-अलग नेतृत्व वाली सरकारों को सरकार चलाने बिना शर्त समर्थन दिया। ये अलग बात है कि उनके असमय जाने के बाद उनकी धर्म पत्नि ने देश के जि मेदार परिवार की मुखिया, बहु और एक माँ होने के नाते भारतीय पर पराओं को अंगीकार करते हुये कभी सत्ता को महत्व नहीं दिया। बल्कि उन्होंने जब भी देश की जैसी भी स्थिति रही आम भारत वासी और देश के लिये पूरी निष्ठा ईमानदारी से तमाम आरोप-प्रत्यारोपों के बावजूद सेवा का कार्य किया। 

जो विगत 20 वर्षो से निरन्तर जारी है। मगर कहते है कि माँ जैसी भी हों,जिस भी स्थिति में हों,अपने बच्चों के लिये कुछ भी कर सकती है। अगर आज राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के बजाये देश भर में घूम देश के लोगों से स पर्क कर देश के लिये कुछ करना चाहते है। तो यह एक माँ की बेहतर परवरिश और उसकी शिक्षा ही है। बरना सत्ता और पद लालची,स्वार्थियों की राजनीति मेें कोई कमी नहीं है। अगर अन्य राजनेताओं की तरह उन्होने पारवारिक पर पराओं और सिद्धान्तों का पालन न किया होता तो आज राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री होते।

इसलिये इतिहास को झूठला सत्ता के लिये बयान बाजी करने वालो को समझना होगा कि भारत एक स यता,संस्कार,मूल्य, सिद्धान्तों वाला स्वाभिमानी राष्ट्र है। इनसे जो भी खेलेगा उसे आज नहीं तो कल परिणाम भुगतना ही पड़ेगा। जिस परिवार को लेाग कोसते नहीं थक रहे अगर उस परिवार में सत्ता और स्वार्थ सर्वोपरि होता तो देश में चरण सिंह,वीपी सिंह,देवे गोड़ा,चन्द्रशेखर,गुजराल,पीवी नरसिंह राव,डॉ.मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री न होते। 

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