वे वजह की बहस दिल्ली में

व्ही.एस.भुल्ले/नई दिल्ली। दिल्ली में विभिन्न दलो को मिले मतो के मद्दे नजर सरकार बनाने मिले अल्प मत ने बयानी जंग ाले ही तेज कर दी हों,मगर दिल्ली में किसी भी दल की सरकार बनेगी,यह कह पाना बड़ा ही मुश्किल है। मगर सरकार बनाने न बनाने को लेकर राजनीति अवश्य चरम पर है।

जहां भाजपा जोड़-तोड़ की सरकार से तौबा कर विपक्ष में बैठने का मन बना चुकी है वहीं कांगे्रस अर्स से लेकर फर्स पर पहुंच बिना शर्त समर्थन आप पार्टी को देने बात बता चुकी है। मगर आप पार्टी ने भी नेहले पर देहला फैंक अपनी शर्ते उनकी सरकार को समर्थन देने वालो को बिजवा चुकी है।

कारण साफ है,कि देश की राजनीति में नैतिकता को फुटबॉल बनाकर राजनीति करने वाले दलो को विधानसभा चुनाव 2013 में विभिन्न दलो को मिले मतों ने सीधा संदेश दे दिया है,कि नीति सिंद्धान्त,नैतिकता से देश के अन्दर जो भी दल खिलवाड़ करेगा उसका अंजाम कांग्रेस की तरह होगा। जैसा मतदाताओं ने दिल्ली,राजस्थान और मध्यप्रदेश सहित छत्तीसगढ़ में किया है।

इसी भय के चलते न तो भाजपा,कांग्रेस और न ही हाल ही में जन्मी आप पार्टी किसी तरह का जौखिम उठाना चाहती है। क्योकि तीन महीना बाद ही लेाकसभा चुनाव होने वाले है जिनकों लेकर सभी को चिन्ता है कि कोई ऐसा कारण शेष न रह जाये जिसकी कालिख उन्हें धोना पड़े। बेहतर हो कि तीनो ही प्रमुख राजनैतिक दल सरकार बनाने को लेकर लेाकतंत्र का खुलेआम मजाक उड़ाने के बजाये लेाकतांत्रिक पर पराओं का पालन करते हुये उन्हें मिले जनमत के आधार पर अपना-अपना दावा सरकार बनाने उपराज्यपाल के सामने प्रस्तुत करते भले ही वह अल्प मत में ही क्यों न हो? लेाकतंत्र में आस्था रखने वालो को समझना चाहिए कि सरकारे विधानसभा सदस्य से मिले मत के आधार पर बनती है। 

न कि दलो के मत आधार पर तो फिर दल या उन दलो के विधायक दल के मुखिया विधानसभा में खड़े हों,जीत हार से क्यों डर रहे है। जब किसी भी दल के सदस्य विधानसभा सदस्य बनने बगैर हार जीत के डर से जनता के बीच चुनाव लड़ते है,तो फिर लेाकतंत्र की रक्षा और लेाकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन करने विधानसभा में बहुमत हासिल करने का सामना करने से क्यों कतरा रहे है। बहरहॉल जो भी फिलहॉल दिल्ली के हालातों के मद्दे नजर साफ है,कि राजनीति वाक्य में ही राजनीति होती है। न कि उस लेाकतंत्र के प्रति जबावदेही जिसका ढिंडोरा पीटतें कोई भी दल नहीं थकता।

मीडिऐशन द्वारा शीघ्र सस्ता एवं सुलभ न्याय - राजीव मेहरा

दतिया। मीडिऐशन एण्ड कंसीलेशन प्रोजेक्ट कमेटी सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली एवं राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर के तत्वाधान में जिला न्यायालय दतिया कॉन्फ्रेंस हॉल में दो दिवसीय मीडियेशन जागरूकता शिविर का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजीव शर्मा, मास्टर टेनर्स मीडिऐशन न्यायिक अधिकारी राजीव मेहरा नई दिल्ली, मास्टर टेनर एडवोकेट नई दिल्ली सीजे गुप्ता, विशेष न्यायाधीश बीएस औहरिया, सीजेएम आरबी यादव, वार एसोसियेशन के अध्यक्ष राघवेन्द्र समाधिया, जिला रजिस्ट्रार आरपी मिश्रा, जेएमएफसी पंकज चतुर्वेदी, जेएमएफसी गिर्राज प्रसाद गर्ग, जेएमएफसी विकास शुक्ला, जेएमएफसी रंजना चतुर्वेदी, सहित अन्य न्यायिक सेवा के अधिकारीगण, दतिया, शिवपुरी, भिण्ड के अधिवक्तागण, पत्रकारगण, विधि छात्र आदि उपस्थित रहे।

कार्यशाला के शुभारंभ अवसर पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश राजीव शर्मा ने कहा कि मीडिऐशन के द्वारा झगड़ों का निपटारा आदि काल से चला आ रहा है। रावण से समझौता करने हेतु भगवान राम ने हनुमान दूत बनाकर लंका भेजा था। राजाओं के यहां भी युद्ध के पहले दूत भेजकर बातचीत की जाती है। कानूनी दाव पेंच में उलझने से अच्छा है कि मीडिऐशन अर्थात मध्यस्त के माध्यम से झगड़े को आपसी समझौते के द्वारा निपटाया जाए। मास्टर टेनर श्री राजीव मेहरा ने कहा कि धारा ८९ के तहत् वर्ष २००२ में मीडिऐशन का प्रावधान किया गया। दिल्ली में २००६ में इसकी व्यापक रूप से शुरूआत की गई। मीडिऐशन के द्वारा जो प्रकरण निराकृत होते है उनमें शीघ्र सस्ता और सुलभ न्याय मिलता है समय की भी बचत होती है और समाधान स्थाई होता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में निचली अदालतों में सवा तीन करोड़ मुकद्में प्रचलित है। यदि मीडिऐशन के द्वारा आपसी सहमति से मुकदमें को निपटाया जाये तो पति पत्नि मकान, किरायेदार, लेनदेन, सिविल विवाद, भाई-भाई के विवाद जैसे मुकदमें इस माध्यम से निराकृत हो सकते है। उन्होंने कहा कि मीडिऐशन मैं मीडिऐटर की योग्यता, निष्पक्षता वाकपटता आदि विशेष महत्व रखती है।


मण्डी शुल्क की शिवपुरी में जबरदस्त लूट

म.प्र. शिवपुरी। सूत्रो से मिली जानकारी अनुसार विधानसभा चुनाव 2013 के दौरान शिवपुरी मण्डी शुल्क की जबरदस्त लूट हुई है। आय का आंकड़ा फसल उत्पादन की पिछले वर्ष की तुलना में बड़ी कीमत के बावजूद विगत वर्ष हुई आय से खिसक कर काफी नीचे आ गया है। जबकि जिले की अन्य मण्डियों की आय गत वर्ष की तुलना में बढ़ी है। हालात ये है,कि कर्मचारियों को वेतन तक समय से नसीब नहीं हो रहा है। मगर मण्डी प्रबंधन का तर्क है। कि आवाक ठीक से न होने चलते आय में कमी आई है। मगर हकीकत इसके उलट है,जैसा कि सूत्र बताते है।

सूत्रों की माने तो सोयाबीन,मूंगफली की तुलाई मण्डी में न होकर बड़े पैमाने पर औद्यौगिक क्षेत्र एवं शिवपुरी को आने वाली सड़को पर किनारे या फिर सीधे किसान के खेत से गोदामों तक फसल लाई जा रही है। मगर तमाम अमला होने के बावजूद भी मण्डी प्रशासन हाथ पर हाथ रखे बैठा है। जिसमें निर्वाचन के दौरान तो जमकर मण्डी शुल्क की चेारी हुई है। जो तत्काल जांच की बांट ज्यो रही है।

सूत्रों ने बताया कि शिवपुरी मण्डी में कुछ चुनिन्दा व्यापारी सामूहिक रुप से सक्रीय है जो मण्डी शुल्क चेारी तो करते ही है साथ ही आपस में अघोषित सामजस्य बैठा किसानों का उत्पादन भी ओने-पोने दाम खरीद लेते है। जिसकेे लिये किसान भी या तो स्वयं के खेत सड़क किनारे औद्यौगिक क्षेत्र या व्यापारियो को मजबूरी में बेचते है। जिससे दोनो ही हालातों में मण्डी शुल्क की चपत लग रही है।

जिस तरह से जिले के बाहर सोयाबीन प्लान्टों के लिये सोयाबीन खरीदा जाता है मण्डी प्रशासन के संरक्षण में उस पर किसानों के सवाल यक्ष है। जिनका जबाव न तो मण्डी प्रशासन पर है न ही जिला प्रशासन पर। अगर जिला प्रशासन विगत दो महीने में आय मण्डी शुल्क की जांच अपने अधिनश अधिकारियों से कराता है,तो बड़े पैमाने पर मण्डी शुल्क की चेारी का मामला उजागर हो सकता है।


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