राजनीति की हदे ,पार करती राजनीति, खतरे में इतिहास

व्ही.एस.भुल्ले। जिस तरह से देश के दो प्रमुख राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के बीच वाक युद्ध छिड़ा है,उन्हें सुनकर तो यहीं लगता है,कि देश की राजनीति आज उस मुकाम तक जा पहुंची है, जहां न तो सुनहरे इतिहास को ही तब'जों दी जा रही है, और न ही इस दुनिया में रहे नेताओं को वख्शा जा रहा है।

देश की डेढ़ अरब आवाम के प्रमुख मुद्दो से इतर भारतीय राजनीति में एक ऐसी भाषा का सूत्रपात किया जा रहा है,जो न तो देश न ही उसके इतिहास और न ही द्विवगंत नेताओं की प्रतिष्ठा और लेाकतंत्र के लिये उचित है। मगर सžाा के माध्ययम से देश और देश की आवाम की सेवा करने को उतारु दोनो ही राजनैतिक दल अब भारतीय राजनीति को शर्मसार कर वाक युद्ध के मल युद्ध में कूंद पड़े है।

हाल ही में भाजपा से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार जहां इतिहास को खगाल द्विवगंत देश के नेताओं को आज की मौजूद व्यवस्था के लिये खलनायक ठहराने में लगे है,वहीं कांग्रेस की ओर से कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी छžाीसगढ़ की रायगढ़ सभा में भाजपा को चोरो की पार्टी तक कह डाला। इन्हीं बातों से आरोप-प्रत्यारोपों  से अंदाज लगाया जा सकता है कि भारतीय राजनीति किस हद तक जा पहुंची है।

देखा जाये तो इतिहास में दर्ज हर एक वाक्य तत्कालीन समय परिस्थितियों के अनुसार है। और जो व्यवस्था आज देश के सामने है वह भी समय और परिस्थितियों की गुनेहगार है। जिसके लिये किसी भी द्विवगंत नेता को खासकर जो देश के आतंकवाद से लड़ते हुये शहीद हुये हों चाहे वह स्वर्गीय इन्दिरा गांधी हों,या फिर स्वर्गीय राजीव गांधी अगर राजनीति ही देश के अन्दर, देश के भविष्यो को देश के शहीद नेताओं को दोषी ठेहरायेगी तो निश्चित ही देश में इतिहास बताने की एक नई परम्परा बन जायेगी।

तब देश के बच्चे युवा किसका अनुशरण कर अपना लक्ष्य तय करेगें। कौन देश के लिये कुर्बानी देगा। यह यक्ष प्रश्न देश के हर नेता के मन में और राजनैतिक दलो के मस्तिष्क में होना चाहिए। ये अलग बात है कि लेाकतंत्र में दलो पर आरोप-प्रत्यारोप हो सकते है। मगर व्यक्तिगत आरोप बिल्कुल भी उचित नहीं और न ही हमारी संस्कृति,परम्परायें इसकी इजाजत देती मगर बावजूद सबकुछ चल रहा है।

अगर सत्ता के लिये घटिया भाषा और तथ्य विहीन आरोप-प्रत्यारोपों का दौर इसी तरह चलता रहा तो न तो भविष्य में कोई सर्वमान्य मार्गदर्शक सम्मान जनक नेता भारतीय राजनीति के इतिहास में बचेगा और न ही लेाग उन्हें सम्मान की द्रष्टि से देख सकेगें। तब क्या होगा हमारे महान लेाकतंत्र और देश का क्योकि जो इतिहास मंचो से देश के भावी प्रधानमंत्री बच्चों और युवाओं को बताने में लगे है,और जिस तरह के पलट बार उनके दल पर हो रहे है उससे तो यहीं लगता है कि राजनीति अब सत्ता के लिये वो सभी हदें पार करने पर उतारु है,जिससे बहुत ही भयावह भविष्य देश के नेताओं का दिखाई देता है। बेहतर होता देश के नेता देश भविष्यो को बताते कि देश में पांच-दस के सिक्कों की जगह अब प्रचलन में दस के नेाट और पचास के नोट है।

आज सैंकडो में कम्यूटर पर बैठ कोई भी जानकारी लेाग ले सकते है। जिन शहरों में या स्थानों पर जाना लेाग सपना समझते थे वहां लेाग पहुंच रहे है। जहां लेाग वर्षो से अपनो से  मिलने तरसते थे आज लेाग मेाबाईल के माध्ययम से सैंकडो में आमने-सामने बैठ बाते कर रहे है। जो परिवार कभी हजारों के सपने बुनते थे आज वह लाखों,करोड़ों में खेल रहे है। जो समाज कभी शासन और सžाा से भय खा दूरी बना दूर रहने में ही भला समझते थे। आज वह गांवों-गांवों गली-मोहल्ले सžाा चला रहे है। कहने को बहुत कुछ है और मुद्दे भी बहुत भगवान सद बुद्धि दे,देश का नेतृत्व करने वाले उन नेताओं को जो सžाा को माई-बाप समझ इस देश के स्र्णीयम इतिहास का सत्यानाश कर राजनीति में घटिया भाषा कि परम्परा डाल रहे है। जिसके लिये हो सकता है,देश कभी उन्हें माफ न करें। बेहतर हों कि देश में मूल्य सिद्धान्तों के साथ मुद्दों की राजनीति हो।

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