मूल्य सिद्धान्तों के लिये राहुल की हुंकार

व्ही.एसभुल्ले/ भले ही देश के राजनैतिक परिदृश्य में राहुल अहम मुद्दों पर अडिग कभी कबार ही दिखे हों मगर उनकी कार्यप्रणाली एक ऐसे युवा नेता की रही जिसने देश और देश में मौजूद लोकतंत्र  की खातिर कभी अपने मूल्य और सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया।
अŽवल जब भी उन्हें राजनीति में मौका मिला बगैर किसी नफानुकशान को देखे हमेशा कड़ा और स्थायी निर्णय लिया। जिसमें उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली। उनका यह गुण निश्चित ही उनके परिवारिक विरासत की देन हों मगर जिस हलके में देश के राजनैतिक दल एक युवा की क्रान्तिकारी विचार धारा को ले रहे है। उससे देश में लेाकतंत्र तो मजबूत होगा ही साथ ही मूल्य और सिद्धान्तों की राजनीति का भी सूत्रपात होगा जिसकी देश को सक्त जरुरत है।

राहुल की राजनीति का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब कांग्रेस के छत्रप भी राहुल के मंसूवो को समझ यह समझाने को मजबूर है कि चुनाव सर पर है और संगठन के संचालन और तौर तरीके में बदलाव का समय नहीं। निश्चित ही यह एक कटु सत्य है किसी भी लेाकतंत्र में संक्रिय भागीदारी के लिये सžाा का होना जरुरी है। मगर ऐसी सत्ता जो मूल्य सिद्धान्तों की कीमत पर हासिल होती हों जिसके चलते किसी राजनैतिक दल की पहचान ही खत्म होने के कगार पर हो, ऐसी सžाा से तो विपक्ष में बैठना ही उचित होगा।

ऐसा नहीं कि देश के सबसे बड़े राजनैतिक दल के नेतृत्व स्तर पर इस तरह की उथल पुथल कोई पहली मर्तवा हों इससे पूर्व ही स्वर्गीय इन्दिरा जी और स्वर्गीय राजीव जी तथा वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया जी के नेतृत्व में भी कांग्रेस में हुआ है। मगर कभी भी कांग्रेस नेतृत्व ने कांग्रेस के मूल्य और सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया। अगर राहुल भी देश और देश की लेाकतंत्र की खातिर संठनात्मक तौर पर वैसा ही कुछ कर रहे तो इसमें नेताओं को हर्ज ही क्या? कांग्रेस में जो लेाग ऐसा समझते है कि लोकतंत्र में सžाा ही देश के गरीबों की सेवा की पहली सीढ़ी है तो उन्होंने अभी तक राजनीति में वो फार्मूला क्यों नहीं खोजा? जिससे राहुल प्रधानमंत्री बन देश का नेतृत्व कर सकते है। क्या कांग्रेस के महापण्डितो को यह नहीं मालूम कि जो राजनैतिक दल कांग्रेस का ही खून पीकर फल फूल रहे है और कांग्रेंस को खून पसीने से सीचने वाले उस परिवार को प्रधानमंत्री पद के नाम पर आंखे दिखा प्रधानमंत्री पद से रोक रहे है। उनके अन्दर यह सहमति सžाा के लिये सžाा के भूखे दलो के बीच क्यों नहीं बना पाये जो दस वर्ष से यूपीए सरकार में नेतृत्व के अन्दर सžाा भोग रहे है? क्या कांग्रेस के महापण्डितों को यूपीए सरकार के सहयोगी दलो और कांग्रेस के अन्दर सžाा के माध्ययम से सेवा का फार्मूला लिये डीगे मारने वालो को यह बताना पड़ेगा कि मीठा-मीठा हप्प और कड़वा-कड़वा थू।

देखा जाये तो विगत 20-25 वर्ष में कांग्रेस ने संगठनात्मक और वैचारिक तौर पर जो खोया है अगर राहुल के द्वारा उठाये जाने वाले कदमों से कुछ पूर्ति होती है तो वह कांग्रेस देश और देश के लेाकतंत्र तथा देश की सवा अरब जनता के हित में ही होगा। 

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