ईश्वर में मेरी गहरी आस्था है, जो भी हूं जहां भी हूं,ये प्रभु की ही कृपा है: लखबीर सिंह

म.प्र. शिवपुरी। स्कूली जीवन से गायकी की शुरुआत करने वाले भजनों की दुनिया के बेताजबादशाह यूं तो बहुत सरल और सहृदय इन्सान है जिन्होंने भजन गायन की दुनिया में ही अपना स्थान नहीं बनाया बल्कि आज वह फिल्मी दुनिया में ही गायन का कार्य वखूबी कर रहे है।
उन्होंने विलेज टाईम्स सम्पादक वीरेन्द्र शर्मा अनौपचारिक चर्चा के दौरान कहां कि ईश्वर हर जगह है,जरुरत है,उससे स"ो दिल से याद करने की। जब श्री लक्खा से पूछा गया कि जब समाज में स्वार्थ सर्वोपरि है। ऐसे में लक्खा अपने आपको कहां पाते है। इस पर उन्होंने बड़े ही सरलता कहां कि ईश्वर में मेरी स'ची और गहरी आस्था है। मैं जो भी हूं जहां भी हूं,उसमें प्रभु की बड़ी कृपा है। मैनें संगीत की दुनिया में जो यात्रा गायन में जमशेदपुर से जो शुरु की उसका परिणाम कि मैं आज मुम्बई में गायन का कार्य बड़ी निष्ठा और ईमानदारी से कर रहा हूं। जहां तक मेरे गायन का सवाल है,जिन शŽदों को लेकर मेरी अन्तर आत्मा मुझे इजाजत नहीं देती मैं उस गाने को नहीं गाता। 

उसमें फिर जो भी नफानुकशान हों। उन्होंने कुछ अन्य सवालों के जबाव में कहां कि कलाकार की सोच ही उसे आगे बढ़ाती है मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ मैंने हमेशा आगे बढऩे की सोच रखी और गायन कलाकार के क्षेत्र में आया मुझे याद है जब मेरी पहली एलबम बेटा बुलाए झट दौड़ी चली आए मॉं... से मैंने इस क्षेत्र में इतनी ख्याति पाई कि आज मैं सब मॉं की कृपा से ही हॅंू इसके लिए मुझे यदि किसी का सहयोग मिला तो वह थे गुलशन कुमार जिन्होंने हर पल मुझे अपना सहयोग दिया और आगे बढ़ान में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी, टाटा स्टील में सिक्योरिटी ऑफिसर के रूप में काम करने वाला लख्खा आज जो है मॉं की देन से ही है और मैं मॉं के ही गीत गाता हॅंू। इस अवसर पर मध्यदेशीय अग्रवाल समाज के अध्यक्ष चौधरी रीतेश जैन, ट्रस्ट अध्यक्ष अजीत जैन, सुनील गर्ग मामू, राजेश गोयल रजत व अन्य अग्रवाल समाज के प्रतिनिधि मौजूद थे।

प्रेसवार्ता में पत्रकारों के बीच अपने बात कहते हुए भजन गायक लखवीर सिंह लख्खा कहते है कि गुलशन कुमार ने मुझे हर समय इतना सपोर्ट किया कि मैं उनका आज तक ऋणी हूं और 1992 के बाद 1998 के आते-आते मेरी प्रसिद्धी इतनी बढ़ गई कि देश तो छोड़  विदेशों में भी मेरा नाम हो गया। श्री लक्खा बताते हैं कि संगीत के क्षेत्र में उन्हें 'यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा और जीवन में उन्हें संघर्ष ही संघर्ष करने पड़े। उनका पहला एलबम प्यार सजा है तेरा द्वार भावनी जब बाजार में आया तो उन्हें इतनी प्रसिद्धी मिली कि  वह उसका अंदाजा ही नहीं लगा सकते। वहीं मातारानी की मुझ पर इतनी कृपा है कि बिन मांगे मुझे इतना कुछ मिल गया है कि अब कुछ बांकी ही नहीं रहा। 

मैंने छोटे-छोटे मंचों पर अपनी प्रस्तुतियां दीं और आज इन छोटे मंचों से सफर पूरा करता हुआ मैं बड़े मंचों की तरफ बढ़ता चला जा रहा हूं। आज मुझे किसी मुझे मेरे मंच के आगे भीड़ की परवाह इसलिए नहीं रहती क्योंकि मेरी आवाज ही भीड़ को अपने आप खींच लाती है। मेरे अपने शुरूआती दौर में जमशेदपुर की टाटा कंपनी में सिक्योरिटी ऑफीसर के पद पर रहकर नौकरी की और टाटा कंपनी के चेयरमैन रूसी मोदी ने उन्हें नौकरी दी, लेकिन जब मुझे प्रसिद्धी प्राप्त हुई तो व्यस्तता के कारण मैंने नौकरी छोड़ दी।

 श्री लक्खा ने बताया कि वह साल में चार महीने विदेशों अपनी प्रस्तुतियों देते हैं और छह महीने भारत में अपनी आवाज का जादू बिखेरते हैं और 26 अक्टूबर को वह चायना में वह अपनी प्रस्तुति देने के लिए भारत से रवाना होंगे। शिवपुरी में इन दो दिनों में जब मैंने शिवपुरी की छटा देखी तो मैं स्तŽध रह गया कि देश में शिवपुरी जैसा छोटा शहर प्राकृतिक छटाओं के बावजूद उभरकर भारत के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों में शुमार क्यों नहीं हुआ। शिवपुरी को प्रकृति ने इतना कुछ दिया है कि मैं उसको बयां भी  नहीं कर सकता।


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