फिर हादसा और कई निर्दाेश मौत, रतनगढ़ के रास्तें 100 से अधिक मौत, दोषी कौन

व्ही.एस.भुल्ले। म.प्र. ग्वालियर। प्रदेश में या देश में हादसा कहीं भी हों हादसों की भेंट हमेशा निर्दोश ही चढ़ते है। फिर चाहे वह रतनगढ़ में दूसरी मर्तवा हुये हादसे मौतों का आंकड़ा 100 से अधिक और घायलों की संख्या 100 ही क्यों न हों।
पिछली मर्तवा जब रतनगढ़ में हादसा हुआ था तब भी स्थान सिंध नदी ही था जहां तेज बहाव में श्रद्धालुओं वह अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। जिनकी संख्या ही 100 के करीब थी और आज जब इसी सिंध नदी के पुल पर हादसा हुआ है। तब भी मरने वालों की संख्या 100 से अधिक के करीब है। अब यहां यक्ष प्रश्र यह उठता है कि आखिर इन हादसों की भेंट चढ़ते निर्दोश लेागों की मौत का दोषी कौन है।

निश्चित ही जब इतने बड़े हादसे पर सवाल उठेंगें तो जबाव भी आना स्वाभाविक है,और उžार भी स्वाभाविक रुप में होगें। जैसे कि हादसे के बाद से आ रहे है। कि हादसे के पीछे अफवाह रही या फिर व्यवस्थागत चूंक। उžार दोनों तरफ से मुनासिफ हो सकते है और होने वाली न्यायिक जांच में कुछ तथ्य भी सामने आ सकते है। और जो प्रक्रिया प्रशासनिक होगी उसके तहत कुछ लेाग निलंबित और हटाये भी जा सकते है। जैसा कि हर हादसों के बाद होता आया है।

देखा जाये तो इन हादसों और मैातों के पीछे मूल कारण दो ही एक शासन जिसके ऊपर अपने नागरिकों के जान माल की रक्षा की संवैधानिक जबावदेही है वहीं दूसरी ओर महत्वपूर्ण जबावदेंही उस समाज की है जिस समाज से हादसों मरने वाले निर्दोश लेाग आते है। चूंकि जब किसी राष्ट्र की सामाजिक संस्कृति,परम्परायें तार-तार होती है। और आने वाले पीढ़ी उस संस्कृति परम्पराओं से अनभिग्य तो इस तरह के हादसे और निर्दोश लेागों की मौतें होना स्वाभाविक है।

जब किसी भी राष्ट्र के सžाासीन या समाज के मुखिया स्वयं स्वार्थो या विवसता से घिर जाते है। ऐसे में ऐसे हादसों को रोक पाना असंभव ही नहीं न मुमकिन है। बेहतर हो कि शासन जिसके पास सारी संवैधानिक शक्तियाँ है। एक बेहतर व्यवस्था कायम करने वह उनका पूरी जबावदेही से भरपूर इस्तेमाल करे। रहा समाज जो छोटे-छोटे या बड़े-बड़े परिवारों का निहितार्थ होता है। उस समाज को परिवार से ही सुधार की शुरुआत स्वयं के स्वार्थो को छोड़ अपने परिवार में संस्कृति परम्पराओं का कड़ाई से पालन करे तो स्वत: ही पहले समाज फिर समाजों को मिलकर बना राष्ट्र में समझबूझ का संचार स्वत: ही होने लगेगा और तब फिर हमें तब हमें त्याहौरों पर इस तरह के दुखत हादसे नहीं देखने पड़ेगें। और न ही किसी मां को अपने लाल और न ही किसी लाल को अपनी माँ बहन से इस तरह बिछडऩा और बिलखना पड़ेगा। हादसा इतना दर्दनाक और बड़ा होगा शायद ही किसी श्रद्धालु या राष्ट्रवासी ने कभी सोचा होगा। हमें प्रयास करना होगा कि अब कभी भविष्य में ऐसे हादसे न हो तभी हम स"ो और अ'छे इन्सान कहला सकते है।

कैसे मिलेगी फतह, कैसा रहेंगा समर

म.प्र.ग्वालियर शिवपुरी। जिस तरह की चुनावी तैयारियाँ राजनैतिक दलों के बीच म.प्र. में चल रही है। भले ही वह सन्नी पात हो मगर जमे मजमें से इतना तो तय है,कि मुख्य मुकाबला सारे प्रदेश में दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलो के बीच रहने वाला है। ये अलग बात है कि म.प्र. के 230 विधानसभा क्षेत्रों में से कुछ विधानसभा क्षेत्र ऐसे भी हो सकते है। जहां मुख्य मुकाबले में प्रमुख राजनैतिक दलो के अलावा अन्य दल भी ताल ठोकते नजर आये। फिलहॉल तो सबसे बड़ा खुलासा कांग्रेस के असलम शेर खां का है,जिन्होंने मीडिया में बड़ी ही वेबाकी सी कहां कि कांग्रेस की तैयारियों को देख लगता है,कि उसकी 60-70 सीटें ही आ सकेगंी। क्योकि कुछ वर्गो को छोड़ समुची कांग्रेंस 5-6 लेाग ही चला रहे है। खां साहब की दलील में कितना दम है,यह तो कांगे्रस ही जाने। मगर मंचो से सम्बोधित करने वाले कांग्रेसी तो यहीं कहते नहीं थकते कि सरकार कांग्रेस की ही बनेगी। तो कुछ यह भी कहने से नहीं चूकते कि अगर हमारी सरकार बनी तो वह क्या-क्या करेगें। रहा सवाल मुख्य सžाा धारी दल का तो उसको लेकर भी मीडिया में यह खबर जोरो पर है,कि किन-किन वर्तमान विधायक और मंत्रियों के टिकिट कटने वाली लिस्ट में सुमार है।

देखा जाये तो जिस तरह की सभाऐं प्रदेश भर में कांग्रेस के इकट्टे नेता ले रहे है,और मतदान का समय जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। उस पर से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की साभाओं को सफल बनाने कांग्रेसियों को पोंलिग छोड़ जुटा रखा है। और जो हॉल प्रदेश कांग्रेस कार्यालय का कांग्रेसी बताते नहीं थकते उसे सुनकर ऐसा नहीं लगता कि कांग्रेस और भाजपा के बीच कोई जबरदस्त मुकाबला होने वाला है। मायूस कांग्रेसी फिलहॉल तो किसी ईश्वरीय चमत्कार के इन्तजार में है। वहीं पिछले कई वर्षो से विभिन्न कार्यक्रमों के माध्ययम से और म.प्र के मुख्यमंत्री के प्रादेशिक दौरो से काफी कुछ तैयारी भाजपा ने 2013 फतह करने कर रखी है। वहीं कुछ क्षेत्रों में बा.स.पा,स.पा.लो.स.पा.अन्य इत्यादि दल भी कड़ी टक्कर देने का मन बना ऐड़ी चोटी का जोर लगाने में जुटे है। मगर सर्वाधिक दिक्कत कांग्रेसी कार्यकर्žााओं एवं भाजपा के कार्यकर्žााओं के बीच है। कुछ क्षेत्रों में भाजपा कार्यकर्žाा इस बात को लेकर हैरान है,कि अगर टिकिटों पुर्नाव्रति हुई या सही उम्मीदवारों तक टिकिट नहीं पहुंचा तो पांसे उल्टे भी पड़ सकते है। ऐसा ही हॉल कांग्रेसियों का भी कि अगर कुछ टिकिट दौराये गये जिन क्षेत्रों में दो-या तीन मर्तवा से अधिक जो विधायक है,उन्हें टिकिट मिले  और वर्तमान हॉलात कांग्रेस के ऐसे ही रहे तो कोई संशय नहीं कि कांग्रेस को भी खासा नुकशान उठाना पड़े। फिलहाल तो समुचे प्रदेश में चुनावों को लेकर रस्सा कसी का दौर जारी है। 
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