खुले साड़ खेत चौपट, धड़ाम अर्थव्यवस्था, सवालो के बजाये सम्हलने की जरुरत

व्ही.एस.भुल्ले/ गलती जिसकी भी हों मगर भयानक परिणाम फिलहॉल देश वासियों के सामने है। देश में बढ़ती मंहगाई और अनियंत्रित दामों ने देश वासियो का दीवाला निकाल रखा है डॉलर के मुकाबले गिरते रुपये की तो बात अलग गिरते निर्यात और बढ़ते आयात का आलम यह है कि आज हम खुली अर्थव्यवस्था में फसकर रह गये है।
खुले व्यापार ने न तो हमारी अर्थ व्यवस्था को ही कहीं का छोड़ा न ही देश को फिलहॉल सरकार भी मायूस हो हाथ ऊपर किये बैठी है जिसके पीछे देश में बढ़ती गठबन्धन सरकारों की प्रवृति और सबल होते क्षेत्रीय दल है। जिनकी क्षेत्रीय सोच के चलते राष्ट्रीय निर्णय या तो हो नहीं पाते या फिर स्वार्थो में उलझ कर रह जाते है।

दूसरा प्रमुख कारण छितड़े लोकतंत्र में सपाट नीतियों की बाढ़ जिस देश में नागारिको को जिन्दगी मौत के बारे में समझाने सरकारों को अरबों रुपये विज्ञापन पर खर्च करना पड़ता हों ऐसे देश मे खुला व्यापार खुली अर्थ व्यवस्था का संचालन सिवाय मूर्खता के कुछ नही। किसी परम्परावादी ,भावुक देश में प्रोफेशनल व्यवस्था का समागम कहा कि ईमानदारी है। मगर विगत 20 वर्षो से ऐसा ही कुछ चल रहा है। देश के विकास के नाम विनाश की ओर अर्थ व्यवस्था को धकेल देना कहा की ईमानदारी है। जिस देश में लेाकतंत्र आजादी के 65 वर्ष बाद भी विकलांगता का दंश लिये घसिट रहा है। वहां खुली व्यापार नीति कैसे सफल हो सकती है।

जिन उघोग पžिायों को सक्षम बना देश की अर्थव्यवस्था को दौड़ाने का दम भरने वाले शायद भूल गये कि व्यापार और व्यापारी मुनाफे के लिये व्यापार करते है न कि नुकशान के लिये इतनी सी बात देश की सरकारों और राजनैतिक दलो ने स्वयं के स्वार्थ छोड़ सोची होती तो देश को ये दिन नहीं देखना पड़ता। दूध की आस में विदेशी साड़ों को चारा खिलाने वाले मातहत भूल गये कि दूध गाय देती है न कि साड़ जिन्होंने संचार,बीमा उरबरक,दवा,इलेक्ट्रॉनिक,ऑटो मोबाईल क्षेत्र में कूद खूब मोटा मुनाफा कमाया देश के बीमा,बैकिंग एवं उपभोक्ताओं की तो जैबे खाली की ही देश के आम किसान और गरीबों के धन को भी नहीं छोड़। 

आज जब देश में जबरदस्त धन की लूटपाट के बाद जब देश में आम व्यक्ति के जागरुक होते बहुत कुछ नहीं बचा तो हमारे देशी न विदेशी निवेशक भाग खड़े हुये। अगर सीधे शŽदों में यो कहें कि विदेशी निवेश के सबज बाग दिखा विश्व के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजार में पैठ जमा निवेशक अपनी मुद्रा निकलने में सफल रहे। तो सफल व्यापारी वह देश है। जो निवेश के नाम हमारे देशी उघोगों बाजार को चट कर अपनी जड़े जमा चुके है। चाहे वह दवा,उरवरक,इलेक्ट्रॉनिक,पैट्रोल,डीजल ,ऑटो मोबाईल जैसे बाजार हो। अपना बाजार जमा उस्तादी से अपने निवेश को वापस ले जाना ही तो व्यापार है जो पूंजीवादी लेागों ने भारत में किया। पहले अग्रेजों ने 200 वर्ष भारत में व्यापार किया अब यूरोपियन कम्पनियाँ कर रही है। वो भी मुंह मांगी कीमतो पर।

देखा जाये तो हमारे देश के बेरोजगार शिक्षित युवा ही नहीं छोटे-छोटे रिटेलर डीलर सी.एन्ड. एफ को विदेशी यात्रायें गुप्त मोटा मुनाफा और तकनीशियनो, विशेषज्ञों को बड़े बड़े होटलो में भोजन गिफट कलचर ने क्या मजदूर,किसान,गरीब सभी को कमीशन खोर बना बैईमान बना दिया। जिसमें ऑटो मोबाईल,दवा,उरवरक,इलेक्ट्रॉनिक,सीमेन्ट क्षेत्र अŽबल है। इन क्षेत्रों में कम्पनी से लेकर आम उपभोक्ता तक कई कमीशन खोर छिपे लाभ वाले सेलर,डीलर सम्मलित है।

बहरहॉल यहां अब सवाल यह नहीं कि कैसे क्या हुआ सवाल ये है कैसे ठीक होगा।

इसके लिये जरुरी है सरकार तत्काल खुली अर्थव्यवस्था और व्यापार नीति की समीक्षा करे। समीक्षा उपरान्त आयात होने वाली ऐसी वस्तुओ को नियंत्रित करे जो देश में ही उपलŽध हो सकती है। साथ ही विलासिता हेतु आयात होने वाली वस्तुओ को हतोत्साहित करे जिनमें विदेशी दवा,कारे,मोटर सायकल,इलेक्ट्रॉनिक आयटम,बीमा,संचार क्षेत्र रहा सवाल पैट्रोल,डीजल का तो रा'य केन्द्र सरकार बैठ कर तय करे और मोटा कार, व्हीकल एकट में संसोधन कर अति अवश्यक स्थति में ही समीक्षा उपरान्त नवीन उघोग एवं उपभोकतओं का वाहन रजिष्टर्ड किया जाये। साथ ही सायकल उघोग को देश भर में बढ़ावा दिया जाये जिससे पैट्रोल की खपत तो कम होगी ही साथ दवाओं  की खपत भी कम होगी। 

दीर्घकालिक कदम के रुप में सरकार देश भर में अधिक से अधिक कौशल शिक्षा,एवं कौशल युक्त युवाओं को तैयार करे शिल्प और लघु उघोगों को बढ़ावा साथ ही माल भाड़ा रेल मार्गो का विस्तार हो अधिक से अधिक रेल मार्ग,जल मार्गो के माध्ययम से ढुलाई व्यवस्था हो साथ ही विद्या सरंक्षण और प्रयोगो के क्षेत्र में लेागों को आर्थिक एवं तकनीकी सरंक्षण बहरहॉल हमें यह नही भूलना चाहिए कि अर्थव्यवस्था लेाकतंात्रिक देश में तभी सुरक्षित है जब उसे सरकार का संरक्षण प्राकृतिक रुप से प्राप्त हो क्योंकि व्यापार और व्यापारी अधिक से अधिक मुनाफे के लिये हेाते है। न कि देश की जनता पाल सरकार चलाने के लिये, यह व्यापार और व्यापारी की नैसर्गिक प्रकृति है इसी को कन्ट्रोल करने सरकारे होती है। जब भी जिस भी देश में व्यापार के भेडिय़े को खुल्ला छोड़ा गया है, वह देश की अर्थ व्यवस्था उस जंगल की तरह हो जाती है जहां भेडिय़ों के शिकार के सड़े मास के लेाथरे बदबू मारते है।

बेंहतर हो हम अपने स्वार्थ छोड़ देश को गढऩे का काम करे न कि एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप कर उसे उजाडऩे का काम करे। अभी भी बहुत कुछ नहीं बिगड़ा है अगर सरकार की ही माने तो देश के 81 करोड़ लेाग आज भी सस्ते अनाज के मददगार है। 


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