शिकायती आवेदनो से पटी जन आर्शीवाद यात्रा, मुख्यमंत्री को दिया आवेदनों का तोहफा

व्ही.एस.भुल्ले/ म.प्र. शिवपुरी। प्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्रों का भ्रमण कर गत दिनों पिछोर,करैरा,शिवपुरी विधानसभा क्षेत्रों मेें जन आर्शीवाद लेने पहुंचे प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को यूं तो 220 विधानसभा क्षेत्रों से जन आर्शीवाद मिलने की उम्मीद है जिससे वह 2013 में पुन: प्रदेश में अपनी सरकार बना सके।
हालाकि वह जन आर्शीवाद यात्रा के दौरान यह कहना और बताना नहीं भूलते कि उनकी सरकार द्वारा जनहित में लागू की गई योजनाओं के माध्ययम से।  15 लाख लाडली लक्ष्मी 95 हजार कि.मी. सड़को 25 लाख हेक्टेयर सिंचाई 18 के बजाये जीरो प्रतिशत व्याज पर किसानो को रिण,1 हॉसपावर मोटर पर 1200 रुपये तक का भुगतान,गरीबों को 1 रुपये किलो गेंहू,1 रुपये किलो चावल,नमक,शासकीय जमीन पर कŽजेधारियों को पट्टे,मुरैना,शिवपुरी,गुना में इन्डस्ट्रीयल कॉरोडोर छात्रो अध्यापको को समान वेतन छात्रो को उ"ा शिक्षा हेतु लॉन में सरकार की गारन्टी साथ ही शिवपुरी जिले में 20 करोड़ के शिलायन्स और भूमि पूजन और 1 लाख युवाओ को रोजगार देने का उद्देश्य इत्यादि है।

जबकि निर्वाचन आयोग दिसम्बर 2013 में चुनाव कराने की बात कह चुका है,ऐसे में म.प्र. के मुख्यमंत्री का सžाा में बने रहने इस तरह की यात्राये आव्हन लाजमी हो जाते है।

मगर मात्र कुछ किलो मीटर की यात्रा में दो कट्टो से अधिक आवेदनो की बाढ़ ने शिवराज सरकार के सुशासन में कुशासन का स्पष्ट इशारा किया है। वैसे भी आय दिन जन समस्या निवारण और जन शिकायतो में भी थोक बन्द आवेदनो का आना सुशासन की सत्यता का बखान करते  रहे है। मगर शिवपुरी जिले की 3 विधान सभा क्षेत्रों से गुजरी मुख्यमंत्री की जनआर्शीवाद यात्रा में मुख्यमंत्री को आमजन का कितना आर्शीवाद मिला यह तो भविष्य के गर्भ में है। मगर लेागों ने जिस तरह से थोक बन्द आवेदनो का आर्शीवाद दिया है। वह फिलहॉल चर्चा का विषय हो सकता है।

इसमें किसी कोई संदेह नहीें होना चाहिए कि सरकार की कुछ नीतियाँ और निर्णय अवश्य जनहितकारी हो सकते थे। मगर प्रशासनिक अर्कव्यता ने इसे फलीभूत नहीं होने दिया। सुशासन के मोर्चे पर विफल शिव सरकार सेवा प्रचार में अवश्य अŽबल रही जिसमें उसका इकला चलो की मानसिकता स्पष्ट झलकती है। जिसके चलते सरकार की वो योजनाये भी विफल होती रही जिनसे लेागों को कुछ लाभ मिल सकता था। नौकरशाही के सहारे सžाा तलाशती सरकार पूरे 5 वर्ष तक यही मुगालता पाल की नौकरशाही के बल सम्मेलन पंचायतो के माध्ययम से तीसरी मर्तवा सžाा हथिया लेगी, और सम्मेलनो सभा में ढोकर लाये जाने वाली पंच संरपंच कर्मचारियों की भीड़ पार घाट लगा देगी। अब वह मित्थक साबित हो रहा है।

सžाा की दम पर जनभावनाओं को रोधने वाले नेता कार्यकर्žाा वोट के नाम अब बंगले झांकते शिवराज की ओर देख रहे है। जनतंत्र के नाम विगत वर्षो में जन,धन, और तंत्र का सरकार ने जो उपयोग किया है, वह किसी से छिपा नहीं।

मगर हकीकत यह है कि प्रदेश में साफ हो चुकी प्रशासनिक दक्षता के चलते लेाग आज भी कलफ रहे है।

चाहे सड़क,पानी,स्वास्थ,शिक्षा,रोजगार हो या फिर जनकल्याण कारी योजनायें सभी दूर कोहराम मचा है। मगर मुख्यमंत्री की जन आर्शीवाद यात्रा निरन्तर जारी है। काश सरकार ने सुशासन पर ध्यान दिया होता तो मुख्यमंत्री के इस तरह गली मोहल्ले घूमने की जरुरत न होती।

लूट की छूट बन्द,होते ही भागे निवेशक,  खुले व्यापार के भंबर में फंसा देश

म.प्र. ग्वालियर। कहते जितना अ'छा अध्ययन डॉक्टर को मरीज की बीमारी के बारे में होगा। दवा का असर भी उतना ही सटीक होगा। मगर लगता है हमारे गांव गली मोहल्लों में ही नहीं देश की राजधानी में भी झोला छापों का बोलवाला है। नहीं तो गरीबी झेलते फटे हॉल देश में विकास के नाम इतनी बढ़ी लूटमार न होती जिसमें विदेशी ही नहीं देशी निवेशक भी बड़े पैमाने पर इस लूटमार के खेल में शामिल है।

चाहे वह प्राकृतिक संम्पदा हो या फिर देश कि नवरत्न कम्पनियां। या फिर बीमा,दूरसंचार,उरवरक इलेक्ट्रॉनिक,ऑटो मोबाईल, दवा उघोग रहा हो निवेश और खुले व्यापार के नाम जिस तरह की लूट विगत 10 वर्षो में हुइ्र्र। उसके पकड़े जाने के साथ ही निवेशक भाग खड़े हुये। आज देश घर का माल लुटा चौराहे पर तमास बीनो की मुद्रा में नजर आ रहा है। फिलहॉल तो विदेशी निवेश का ढंका ढोकने वाली सरकार को भी यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर वह करे भी तो क्या? ऐसे में आर.वी.आई. अवश्य कुछ सुधार की गुजांइस के साथ देश के  सामने खड़ा है। मगर लगता नहीं कि रुपये की स्थिति में बहुत कुछ अमूल चूक परिवर्तन होने वाला है।

नीति और क्रियान्वयन के मोर्चे पर फैल हो नंगी हो चुकी व्यवस्था फिलहॉल देश को मुंह दिखाने लायक नहीं बची। इसलिये कहते है निर्णय लेते वक्त व्यवस्था,वातावरण, को हमेशा ध्यान रखना चाहिए। जिस देश की व्यवस्था लेाकतंात्रिक हो जहां अपने अपने स्वार्थो के आधार पर कई दल बतौर हिस्सेदारी कर या सरकार से बाहर रह, सरकार बनाते और बिगाड़ते हों चाहे वह एन.डी.ए. या फिर यू.पी.ए. सरकार,सरकारों का संचालन हिस्सेदारी या फिर स्वार्थो के आधार पर ही होता है। जिस देश की प्रदेश सरकारे नीतियों का समर्थन व विरोध दलीय आधार पर करती हों जहां के 70 फीसदी नागरिक को खाने कमाने से फुरसत न हो ऐसे देश में इतने संवदेन शील मुद्दों पर नीति और क्रियान्वयन में अनदेखी ऐसे ही दिन दिखाती है।

इस निवेश के महाकुंभ में कम्पनियाँ जो भी रही है। वह देशी भी हो सकती है और विदेशी भी अगर ऐसे में डॉलर के मुकाबले रुपये के गिरते भाव के रुप में निर्णायक गन्दगी मौजूद है। जिसने इलेक्ट्रॉनिक ऑटो मोबाईल के क्षेत्र में आयी क्रान्ति के चलते जहां अपने देश वासियों की जेब को निचौड़ा हों, चाहे वह टी.वी.,फ्रिज,वांशिंग मशीन,मोबाईल, रहा सवाल ऑटो मोबाईल का तो लग्झरी कारो से पटी देश की सड़के और टू व्हीलर से पटे घर गली मोहल्ले जिन्हें खरीदने प्रायवेट कम्पनी बैंको ने खूब फायनेन्स दिया न कि आवास,व्यापार, और शिक्षा क्षेत्र में एक और फायनेन्स से बैंको का पैसा लग्झरी उपयोग के लिये आया वहीं बीमा क्षेत्र का इकट्टा जनता का पैसा भी फायनेन्स में गया। जिसके चलते देश में पैट्रोल की खपत कई गुना बढ़ गयी। अगर पैट्रोल और सोना क्षेत्र को ले तो 45 प्रतिशत भुगतान तो इसी क्षेत्र का है।

जिस तरह से बगैर किसी स्थापित नीति के तहत प्राकृतिक संपदाओं को दिया गया। जिसको लेकर आज उगलियां उठ रही है। चाहे वह स्पैक्ट्रम का मामला रहा हो या फिर कोल Žलॉक,इस्पात एल्यूमीनियम की खदाने बगैर किसी सर्वमान्य नीति के चलते आवंटन ने भगोड़े निवेशकों को तो भगा ही दिया वहीं जो सही निवेशक थे उन्हें भी कहीं का नहीं छोड़ा जिसके चलते सरकार की स्थिति आज यह है कि हलुआ मिले न माड़े दोई दीन से गये पाड़े।

मगर जिस तरह का खेल विदेशी निवेश के नाम पर हुआ उसमें सबसे बड़ा फायदा दवा कम्पनियों और उरवरक कम्पनियों का रहा।

विदेशी कम्पनियों ने जहां लग्झरी ऑटो मोबाईल्स क्षेत्र पैसा लगा अ'छा पैसा कमाया वहींं विलसिता में डूबती बहुत बड़ी जनरेशन को मरीज भी बनाया। जिससे अधिक से अधिक मंहगी दवा भारतीय बाजार बिचे। आज व्यायाम,मनोरंजन के नाम अधिकांश जनरेशन टी.वी.के सामने होती है। किसी को स्कूल,कॉलेज या पड़ोस में जाना है तो वह टू व्हीलर या फॉरव्हीलर्स से जायेगा। जबकि किसी मानव शरीर के लिये फिजीकल वर्क जरुरी है। जिसे अनियंत्रित हमारी व्यापार नीति ने आम व्यक्ति को तन और धन दोनेा से खोखला कर दिया है।

जिसमें बीमा क्षेत्र में 30-40 प्रतिशत कमीशन देकर देश के आम लेागों का पैसा उठाने वाली कम्पनियों की तेा कोई चर्चा ही नहीं कर्žाा जिन्होंने लाखों करोड़ रुपया आम देश वासियों से बीमा के नाम इक_ा किया और औने पौने पैसे चुका अपने लग्झरी ऑफिस बन्द कर बैठी है।

यहीं हॉल दूरसंचार क्षेत्र में है भारत की इकलौती धनवान कम्पनी बी.एस.एन.एल. का भट्टा भी हमारे यह निवेशक बैठाल चुके है।

अगर इन सरकारों और नेतृत्व कर्žााओं में जरा भी गैरत होती तो देश को यह दिन नहीं देखना पड़ता। काश सरकार ने टू व्हीलर फॉर व्हीलर अगर हम विभिन्न क्षैत्रों में उत्पादन निर्धारित कर अधिक से अधिक मानवीय ऊर्जा को देश के विकाश में झौका होता तो जितनी सŽिसटी अभी तक भारत सरकार पैट्रोल गैस में दे चुकी उसका 10 फीसदी भाग सायकल उघोग को सŽिसडी बतौर दिया होता तो पैट्रोल और दवा कम्पनियों को जाता लाखो करोड़  भारतीय रुपया रुक जाता है। नस्ल भी स्वस्थ रहती। और विदेशी वोझ भी न बढ़ता। न ही यह दिन देखना पड़ता।

भारत में बड़े गैर उपयोगी वाहनो का आलम यह है कि देश में सड़के न होने के कारण बड़े शहर ही नहीं छोटे शहरों में भी चीटियों की तरह रैगते दिख जायेगें। जिन पर सरकारों की आज भी कोई स्पष्ट नीति नहीं।

बेहतर हो कि सरकार मातम मनाने के बजाये ठोस कदम उठाये। और पारदर्शी स्पष्ट,राष्ट्र हित और उसके वातावरण के मद्देनजर धीरे-धीरे सुधार के रास्ते पर आये। और उन बिन्दुओं की हो सके तो पुर्नसमीक्षा हो जो राष्ट्र हित में नहीं। क्योकि रोजगार गारन्टी फूड बिल,मध्यायन भोजन,आंगनबाड़ी में रुपया झोकने से वोट भले ही मिल जायेगे।  मगर आर्थिक सुधार आने वाला नहीं।
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