क्या वाक्य में, मर चुका है जमीर......? जो मोहताज है,मेरा देश

व्ही.एस.भुल्ले. किसी भी राष्ट्र के निर्माण में सभ्यता भू-भाग संस्कारों की अहम भूमिका होती है। जिसे गति देने का भार उस राष्ट्र के युवाओं के कन्धो पर होता है। मगर जब कुछ युवा पीढ़ी ही राष्ट्र के सामने पथ भ्रष्ट हो स्वयं के स्वार्थो में उलझ जाये तो उम्मीद किससे की जाये?

बहुत कुछ हालात प्रस्तावना अनुसार देश के सामने है,राजनैतिक दल जहां हमारे महान लेाकतंत्र में वोट के गुलाम है वहीं व्यवस्था दोनेां हाथो से देश वासियों को लूटने में मशगूल है रहा सवाल समाज और धर्म का तो समाज भी आज की चकाचौंध में बहुत कुछ पथ भ्रष्ट हो झूठी वाह वाही बटौर अपने अस्तित्व के लिये संघर्षरत है। वहीं धर्म सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे से आगे से निकलने की दौड़ में छट पटा स्वयं से बाहर नहीं निकल पा रहा रहै है।

अगर यो कहे कि अर्थ युग में सब कुछ नंगा हो चुका है,तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी।

आखिर किससे छिपी है पूना महाराष्ट्र और गुडग़ांव की सेक्स और हुक्का पार्टी पूना का जो हुआ सो हुआ मगर गुडग़ांव के पफ में सेक्स और हुक्का पार्टी में पूरे एक सेकड़ा से अधिक छात्र छात्राओं को पुलिस द्वारा गिरफतार कर भटके इन छात्र छात्राओं को समझाइस दे पालको के सुर्पुद करना भले ही सराहनीय कदम कहा जा सकता है। मगर इस घटना ने देश और देश के उन करोड़ों लेागों को नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। जो देश के युवाओं के हाथ देश का बेहतर सपना गढऩे में लगे है, ये सच है कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति देश के युवा ही होते है। मगर जिस देश की युवा नस्ल सेक्स और हुक्का पार्टी की गुलाम होने तैयार हो। टी.वी. या फिल्मों में होने वाले नाच गानों में अपना भविष्य तलाशती हो तो अन्दाजा लगाया जा सकता।

अविभावक भी अपने ब"ाों के बेहतर भविष्य के लिये इस हद तक पागल है। कि वह क्या नैतिक क्या अनैतिक सभी रास्तो से गुजर अपने ब"ाों का भविष्य बेहतर बनाना चाहते है। जहां एक ओर स्वछन्द लेाकतंत्र में ब'चें भी उम्र अनुसार बावले है। जो वाजिब भी है वहीं दूसरी ओर अविभावक भी पागलों जैसी हालात में बेचाहते है कि कैसे भी हो उनका ब"ाा ऐश्वर्य हासिल कर सुखी रह उनका नाम रोशन करे। जिसके लिये वह दिन रात हाड़  तोड़ मेहनत ही नहीं नैतिक अनैतिक में भी फर्क भूल गये है। ऐसे मेंं इन युवाओं से देश को उम्मीद चन्द राष्ट्र भक्तों की समझ से परे है।

मगर आज भी कुछ राष्ट्र,भक्त,भारत मां के लाल बगैर किसी स्वार्थ के युवाओं को जगाने देश के भ्रमण और संषर्ष जगाने में लगे है। जिनमें नीव का पत्थर बने। रघु भाई ठाकुर जिन्होंने राजनीति में रहते हुए कभी सिद्धान्तों से समझौता नहीं किया और फकक्ड़ों की स्थति में देश सेवा में वर्षो जुटे है। दूसरा नाम आता है अन्ना हजारे और वी.के. सिंह का जो युवाओं को जगाने फिलहॉल भारत भ्रमण पर है।

जिन्हें सुनने व देखने देश में हुजूम भी उमड़ रहा है मगर कितने कामयाब होगें ये भारत मां के लाल लेाकतंत्र को हायर कर चुकी उन शक्तियों के आगे जो सžाासीन है। जिन्होंने नैतिकžाा व स्थापित मूल्य सिद्धान्तों को दर किनार कर स्वाभिमान को गुलाम बना रखा है।

ऐसे में जब जनतंत्र व्यवस्था का गुलाम और युवा स्वयं के स्वार्थो में लिप्त हो, पालको की महात्वकांक्षाओं को दरकिनार करने पर उतारु हों, ऐसे में किससे उम्मीद की जा सकती है। आज राष्ट्र जिस मुहाने में खड़ा है ऐसे में उम्मीद बस शेष रह जाती है। उन करोड़ेां देश भक्त, गरीब और किसानों से जिनकी नस्ल ही अब इस लेाकतंत्र और देश का कल्याण कर सकती है।


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