हल्की राजनीति से हलाक लोग, क्या होगा हमारे महान लोकतंत्र का?

व्ही.एस.भुल्ले/ जिस तरह के घटनाक्रम  देश वासियों के साक्षी है उन्हें देखकर तो यहीं लगता है कि आजादी के 65 वर्ष बीत जाने के बावजूद भी कितनी हल्की हों गयी है राजनीति।

क्या होगा आखिर हमारे महान लोकतंत्र का? जहां लोकतंत्र की आढ़ में सामंत, साम्राज्यवाद, आतंकवाद, नक्शलबाद, धर्माधिता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार,चरित्र हीनता सहित स्वार्थ का नंगा नाच चल रहा है। वहीं जनता वेवस देश वासियों की बेवसी ये है। कि वह लोकतंत्र का  यह नंगा नाच नग्न आंखों से देखने पर आज भी मजबूर है। क्योकि आज भारत का आम नागरिक हमारे महान लोकतंत्र में सिर्फ वोट देने भर की मशीन बनकर जो रह गया है।


आखिर देश का भविष्य उम्मीद करे भी तो किससे? कभी पथ प्रदर्शन मार्ग दर्शन के लिये लेाकतंत्र में मौजूद संस्थायें चाहे वह राजनैतिक सामाजिक,धार्मिक हो या फिर इन संस्थाओं से निकले वो महान व्यक्तित्व  जिनके नाम की चर्चा स्वयं स्वार्थ सिद्धी के लिये लेाग करना तो चाहते है। मगर उनके बताये रास्ते पर चलना नहीं।

देश में वर्तमान हालात ये है कि हर क्षेत्र में कई कुर्बानियों और सेकड़ों वर्षो के कड़े संघर्ष के बाद मिली आजादी को लेाकतंत्र में मौजूद प्रमुख संस्थाओं के कर्णधार पूरी आजादी से भोगने में जुटी है।

देश और देश का भविष्य भले ही गर्त में हों लेाकतंत्र भले ही नेतृत्व,संस्कार विहीन हो मगर निहित स्वार्थो की पूर्ति लेाकतंत्र में होती रहना चाहिए। क्या हंसते हंसते कुर्बानी दे देश को आजाद कराने वाले हमारे पूर्वजों ने ऐसी ही आजादी का  सपना देखा था।

आज सžाा को रखेल समझने वाले देश के चंद कर्žाा धर्žाा जो शेर की खाल में राष्ट्र की अहम संस्थाओं में बैठ भेडिय़ाओं जैसा व्यवहार देश के साथ कर रहे हो। ऐसे में देश और देश के भविष्य की हालात निरीह हिरनो की तरह हों तो अन्दाजा लगाया जा सकता है कि हमारा महान लेाकतंत्र किस दौर से गुजर रहा है।

क्या हुआ है हमारे स्वाभिमानी भारत महान को जो राजनैतिक,धार्मिक,सामाजिक,आस्थाओं और स्थापित सिद्धान्त संस्कारों को तिलाजंली दे अर्थ वाद का गुलाम बनकर रह गया है। एक महान राष्ट्र चंद स्वर्थियों और धन लिप्सा तथा सžाा की अन्धी भूख के चलते संस्कार विहीन हो चला है। आजादी के 65 वर्ष बाद न तो देश में राजनीति में ऐसा कोई मोडल बचा है न ही धार्मिक,सामाजिक,संस्थाओं में ऐसा कोई महा पुरुष निकला है जो देश की राजनीति को सही दिशा दे देश की सभ्यता और संस्कारों की रक्षा कर सके। ऐसे में शेष बचे लोग इस र्दुव्यवस्था को देख स्वयं को सीमित कर अपना कर्म बचाने में लगे है। जो देश के प्रति अपना कर्žाव्य निभाना चाहते है। उन्हें चंद लेाग अपने स्वार्थो की खातिर साम नाम दंण्ड भेद की नीति अपना उनकी बोलती तक बंद रखना चाहते।

आज राजनैतिक संस्थाओं में धन सžाा लेाभियों,स्वार्थियों,सामंत,और साम्रा'यवादियों की लम्बी चौड़ी फौज मौजूद है। ऐसे में सुधार की बाते स्वत: ही शून्य नजर आती है। धार्मिक,सामाजिक,संस्थाओं के प्रति आस्था गत जो बदलाव देखने आ रहा है वह बड़ा ही खतरनाक है। कुछ लेाग अगर देश को दिशा देना भी चाहते है तो तथा कथित लेाग उन्हें अपराधी मान लिया जाता है। और घोषित भी कर दिया जाता है।

मगर अवसोस जिस युवा पीढ़ी पर किसी भी देश समाज को नाज होता है उस युवा पीढ़ी की दुर्दशा देख नहीं लगता कि देश का भविष्य कितना उ''ावल होगा। चमत्कारिक मंथन में लगी युवा पीढ़ी जिस तरह से आजादी भोग रही है या भोगना पर मजबूर है वह किसी भी देश के लिये आत्मघाती ही नहीं खतरनाक भी है। मगर जो माहौल देश की युवा पीढ़ी के सामने उससे बहुत कुछ उम्मीद करना वेमानी ही होगी।

आखिर क्या हुआ है हम भारतवंशियों को जिस भारत महान का निर्माण हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई की मजबूत इमारत के रुप हुआ आज वहीं इमारत बुलंद होने के बावजूद आय दिन दरकने की खबरे हर भारत वासी को हलाक करती नहीं थकती। बहरहॉल जो भी हो वर्तमान हॉलात में देश की बेहतर तस्वीर के उम्मीद बेमानी के अलावा कुछ भी नहीं काश भारतवंशियों की रगो का सिथिल खून दौड़ जाये और देश और देश की युवा पीढ़ी स्वयं के स्वार्थ को छोड़ देश के अनमेाल स्वाभिमान और संस्कारों की रक्षा करने संकल्पित हो जाये तो कोई कारण नहीं जो हम हमारे महान नेताओं धर्म गुरुओं समाज सेवियों के द्वारा दिखाये मार्गो पर चल भारत देश को एक शसक्त और महान संस्कारिेक स्वाभिामानी राष्ट्र बनाने से चूक जाये।
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