संस्कारो से खिलवाड़ खतरनाक, आचरण के उलट अनुशासित लोग

व्ही.एस.भुल्ले। बेवजह का बखेड़ा जिस तरह से देश के सबसे बड़े अनुशासित केडर वेश दल में मचा है,यह या तो किसी का सुनियोजित षडय़ंत्र है। या फिर इस दल को सत्ता से दूर रखने की रणनीति, नेतृत्व के नाम पर जिस तरह से संस्कारों से जिस तरह का खुला खिलवाड़ खतरनाक ही नहीं आचरण के विपरीत अनुशासित लोगों की न समझी भी है।

क्योकि जो राजनैतिक दल हिन्दुत्व के कन्धों पर बैठ राष्ट्र सेवा का दम भरते नहीं थकता था। वह कैसे अपने सम्मानित बुजुर्गो को दरकिनार कर नेतृत्व का ऐलान कर सकता। वह हिन्दु संस्कार कैसे भूल सकता है। मगर ऐसा सभी राष्ट्र भक्तों की छत्र छाया में खुलेयाम हो रहा है। एक लोकप्रिय कार्यकर्ता ऐसे समय में अपने बुजुर्ग नेता को चुनौती दे रहा है। जिसने अपना समुचा जीवन पार्टी को फर्स से लेकर अर्स तक पहुंचाने में गला दिया हों वो भी अपने दल और उन भविष्यों की खातिर जो दल के अन्दर ही खुलेयाम चुनौती देने से नहीं चूक रहे।

कई अपमान सहने के बाद भी कभी उफ तक न करने वाले शीर्ष नेता की आज उम्र की गणना जो भी हो,और समय का तकाजा जो भी हो। मगर उस दल में एक कद्दावर नेता की अहमियत संस्कारों से इतर कम आकना गलत ही नहीं बड़ी भूल है। किसको नहीं पता कि केन्द्र में एन.डी.ए. का भविष्य उज्जवल है,आखिर क्यों आज एक अनुशासित दल बेवजह की बातों पर छिन्न भिन्न नजर आ रहा है। ऐसे में सत्ताधारी दल के षडय़ंत्र से निकले सवालों का एक ही जबाव माकूल हो सकता है। जो न जाने क्यों नहीं दिया जा रहा कि यह एक केडर वेश पार्टी है। न कि कोई प्रायवेट लिमिटेड जहां निर्णय लेाकतांत्रिक और केडर वेश किये जाते है। न कि आलाकमान सी.ई.ओ. अध्यक्ष पर छोड़े जाते है।

जब चुनावों की तारीख कोसों दूर हों उससे पहले मुखिया की घोषणा जबकि सžाा पाने सहयोगी दलों की संख्या अनेक हों ऐसे में कैसे किसी प्रमुख पद की घोषणा किसी भी दल द्वारा की जा सकती है।

बेहतर हों कि दल के अन्दर चुनाव से पहले कैम्पैन मुखियाओं की घोषणा हों। फिर संसदीय दल में मुखिया की घोषणा उसके बाद गठबन्धन में मुखिया की घोषणा हों तब जाकर नेतृत्व की बात हों। यहीं हमारे संस्कार सभ्यता और स्वस्थ परम्परा, लेाकतांत्रिक व्यवस्था है। मगर लेाग न जाने क्यों बेसर पैर की बातों पर जबरन ही ल_म ल_ा हुये जा रहे है। ऐसे  में न तो वह संस्कार न सभ्यता आचरण की बात कर पा रहे है उलट इसके अहम की खातिर अपने शीर्ष पुरुष पर ही सवाल खड़े कर एक केडर बेश दल की लुटिया डुबा रहे है।

वैसे भी हिन्दु धर्म में मरने वाले की इ'छा पूछने और बुजुर्ग की सेवा सम्मान का प्रावधान है। मगर यहां तो उसको भी तिलाजंली दी जा रही है। केन्द्र पर कई राज्यों में खासा दम खम रख सžाा में लौटने वालो का यह हर्ष होगा किसी ने सोचा भी न था।

मगर जो परिस्थितियाँ सामने है। उसे देखकर तेा यहीं लगता है कि सत्ता के आगे सब नतमस्तक है तभी तो लोहपुरुष का सवाल आज भी अव्यवस्थित है।

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