आँधी के आमों पर दावत की तैयारी

व्ही.एस.भुल्ले/ जिस तरह से म.प्र. के अन्दर दोनों ही राजनैतिक दल तीसरी सशक्त राजनैतिक शक्ति आभाव में सत्ता का मुगालता पाल बेफिक्र मुद्रा में दिख रहे है। कहीं उनका यह मुगालता उनकी मुसीबत न बन जाए क्योंकि म.प्र. का आम मतदाता पूरी तरह शान्त हों पक्ष और विपक्ष को मेहसूस होता गुड फील फटी निगाहों से देख रहा है।

सदियों पुराने अपने स्वाभिमान की कीमत देख वह बौचक है। कि कोई भी सरकार जिन्दा रहने के लिए स्थाई साधन जुटाने के बजाए उसे सरकारों पर आश्रित रखना चाहती हैं। लेाकतंत्र के नाम तथा कथित लेाकतांत्रिक नव सामान्त बादियों ने बड़े बड़े धुरन्धर साम्राज्य वादी, सामन्त, साहूकारों को भी पीछे छोड़ दिया। हालात ये है कि विकेन्द्रीकरण के नाम पर केन्द्रीय करण ने छोटा मोटा धंधा रोजगार कर परिवार का पेट पालने वालों को या तो मजदूर की श्रेणी में ला खड़ा किया या फिर नकारा बना घर बैठाल दिया। जिसके परिणाम आज सामने है।

देखा जाये तो किसी भी देश या प्रदेश को चलाने में अर्थ व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है। जो या तो प्राकृतिक संसाधनों उदयोग मार्किटिंग या फिर विकास उन्मुख निर्माण कार्यो के सहारे चलती है। जिसमें भरण पोषण हेतु कृषि का अपना स्थान है। देखा जाए तो आज म.प्र. की बन या प्राकृतिक सम्पदा एवं अधोसरंचना निर्माण पर या तो सीधे सीधे सरकार का अधिपत्य है,या गिनी चुनी बड़ी बड़ी कम्पनियों का है। जो किसी न किसी राजनैतिक रसूख वाले व्यक्ति की है, या फिर सीधे तौर पर नेताओं की।

लगभग 80 फीसदी खुला रोजगार मुहैया कराने वाले इन क्षेत्रों पर सीधे सीधे कुछ गिने चुने लेागों का अधिपत्य हो चुका है। जिसमें मध्ययम वर्ग बंधा हुआ है। या फालतू है,और मजदूर बन्धी मजदूरी या फिर सरकार से सहायता के नाम बटने वाले बटोने पर जिन्दा है। रहा सवाल शिक्षित बेरोजगार युवकों का तो संविदा के नाम रोजगार देने वाली सरकार स्वयं इनके शोषण पर उतारु है। मजबूरन बेरोजगार युवक,युवती रोजगार के अच्छे अवसर न होने की स्थति या तो कम्पनियों द्वारा दिये जा रहे अल्प वेतन और हाड़ तोड़ मेहनत वाले रोजगार के सहारे अपनी जिन्दगी बिता रहे है। तो कुछ सरकारी रोजगार की तलाश में घर के बचे हुए धन को ठिकाने लगा या तो भ्रष्ट तंत्र के चक्कर लगा रहे है। या फिर संविदा आधार पर मिलने वाली नौकरियों में अपनी जवानी दांव पर लगा रहे है।

देखा जाए तो म.प्र. में रोजगार के जो प्राकृतिक संम्पदा क्षेत्र है,उनमें प्रमुख रुप से तेन्दु पžत्ता,बांस,जड़ी बूटी,एवं खदान क्षेत्र है। जिन पर या तो बड़ी बड़ी कम्पनियां काबिज है,या फिर बड़े बड़े ठेकेदार रहा सवाल इन्फ्रास्ट्रक्चर तो यहां भी छोटे मोटे ठेकेदारों का सफाया कर नेताओं एवं पूंजी पžतियों नौकरशाहों के नाते रिस्ते दारों तथा चैले छर्रो की कम्पनियां है। रहा सवाल औद्योगिक क्षेत्र का विगत 6 वर्षो से बड़े बड़े उघोग पžतियों को 5 सितारा होटलों में दावते देते देते सरकार के ही करोड़ों फुक गए मगर एक भी चुन्दिा कम्पनी या उघोगपžति अपना उघोग खड़ा कर पाया।

अब ऐसे में सत्ताधारी दल यह मुगालता पाले कि चंद योजनाओं के सहारे कुछ लेागों को बटोना बांट सरकार बनने वाली है,तो इससे बड़ी हास्यपद बात और क्या होगी। रहा सवाल विपक्ष का तो विगत कुछ वर्षो से उसे यह मुगालता है,कि अब कि सत्ता का आम पक्ते ही उसी के आगन में गिरेगा क्योकि लेाग शायद सरकार से ऊब चुके है।

हो सकता है,कि विपक्ष का सोचना ठीक हों क्योकि आज तक म.प्र में फैले फूटे छोटे मोटे दल एक हों। दोनों ही राजनैतिक दलों को सशक्त चुनौती नहीं दे पायें हो सकता है,के एक बार फिर से आंधी के आमों की दावत पर सत्ता पक्ष या विपक्ष की दावत उड़ जाये क्योकि वर्तमान परवेश में कांग्रेस के लगभग 66 विधायक है और सरकार में लगभग 30 अधिक मंत्री अगर कांग्रेस यह मान भी ले कि उसके 26 विधायक अगर चुनाव हारते है तो भी उसके पास 40 विधायक होंगे। अगर सरकार के आधे मंत्री हारते है,तो उसके पास 15 मंत्री जीत सकेंगे।

अगर शिवराज को छोड़ उनके विधायकों की इन्कम मैंकसी ले तो चर्चाओं के आधार पर अगर 40 फीसदी विधायक चुनाव हारते है तो जैसी कि संभावना है तो निश्चित ही कांग्रेस के मुंह में लड्डू फूटना स्वाभाविक है। मगर जनता का दर्द यह है,कि म.प्र. के अन्दर कोई तीसरी ताकत न होने के कारण भले ही वह अपने भविष्य और स्वाभिमान के साथ हुए छल का बदला ले ले मगर जो भी सत्ता में आयेगा जूझना तो उसे उससे भी पड़ेगा। क्योकि हालात इतने विपरित हैं,कि जिनके पास जड़ तक संगठन है,वह जनता की दुखति रग देखना नही चाहते जिन पर दल तो है,मगर जड़ तक संगठन नहीं वह एक होना नहीं चाहते। अब तो भगवान ही मालिक है,इस प्रदेश का देखना होगा। कि लेाग कितने और दिन इस आघोषित सामन्त बाद को झेल पायेंगे।


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